क्या लगेगा सनी लियोनी का 'जैकपॉट'

  • 13 दिसंबर 2013
'जैकपॉट'

रेटिंग: *

'जैकपॉट' एक सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म है. ये कहानी है दोस्ती की, लालच की, धोखे की, कपट की.

बॉस (नसीरुद्दीन शाह) गोवा में एक कसीनो का मालिक है. वो फ्रांसिस (सचिन जोशी), माया (सनी लियोनी), एंथनी (भरत निवास) और कीर्ति (एल्विस) के साथ अपने ही कसीनो में ग़लत तरीक़े से पांच करोड़ रुपए का जैकपॉट जीते की साज़िश रचता है.

(अपनी छवि पर सनी लियोनी)

वो अपनी साज़िश में कामयाब भी हो जाता है लेकिन फिर साज़िश में शामिल लोग ही एक दूसरे पर रुपए हड़पने का आरोप लगाने लगते हैं. जिससे वो एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं.

उलझा स्क्रीनप्ले

कैज़ाद गुस्ताद ने बहुत ही उलझा हुआ स्क्रीनप्ले लिखा है. फ़िल्म बार-बार फ़्लैशबैक में चली जाती है जिससे दर्शकों की उलझन बढ़ती ही चली जाती है. फ़िल्म एक सस्पेंस थ्रिलर है लेकिन कभी भी सस्पेंस उस स्तर तक नहीं पहुंच पाता कि दर्शकों को दांतो तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर दे.

(रिव्यू: 'आर.राजकुमार')

फ़िल्म के कई सीन बड़े बचकाने हैं, जैसे फ्रांसिस (सचिन जोशी) को मारने के लिए बॉस (नसीरुद्दीन शाह) का बोट में ड्रिल करके छेद करना, जबकि वो ख़ुद उसी बोट में सवार है.

फ़िल्म की कहानी इसी तरह के बेतुके दृश्यों से भरी पड़ी है. अमोल पराशर और कैज़ाद गुस्ताद के लिखे संवादों में भी दम नहीं है.

अभिनय

नसीरुद्दीन शाह जैसे उम्दा कलाकार को ऐसा बेहूदा रोल करते देखना बड़ा तक़लीफ़देह रहा. सचिन जोशी साधारण रहे हैं.

सनी लियोनी अपने रोल में ठीक रही हैं. उनके रोल में अभिनय का स्कोप ही नहीं था और उन्होंने उसकी जहमत उठाई भी नहीं है. उन्होंने अपने ग्लैमर का ज़रूर भरपूर इस्तेमाल किया है. बाकी कलाकार भी ठीक-ठाक ही रहे हैं.

स्क्रीनप्ले की तरह कैज़ाद गुस्ताद का निर्देशन भी बचकाना रहा है. वो लोगों को रोमांचित करने में नाकामयाब रहे हैं. कभी तो बादल बरसे गाने को छोड़कर बाकी के गाने औसत हैं.

कुल मिलाकर जैकपॉट एक बेकार फ़िल्म है. और बॉक्स ऑफ़िस पर इसका जैकपॉट लगना नामुमकिन है.

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