सुरमयी दुनिया का 'सुर-असुर' संग्राम

  • 21 दिसंबर 2013

तमाम तरह की हलचलों से भरी इंसानी ज़िंदगी में सुकून के लम्हे ईजाद करने वाले संगीत की दुनिया में इन दिनो एक बेसुरे झगड़े ने ख़लल पैदा कर रखा है.

इस झगड़े की वजह है ‘रायल्टी’. मतलब संगीत की बिक्री से हुई मोटी कमाई से मिलने वाला एक हिस्सा. परंपरागत रूप से यह हिस्सा-बांट म्यूज़िक कम्पनी और फ़िल्म के निर्माता के बीच होता आया है.

इसे अन्यायपूर्ण बताकर इन गीतों को रचने वाले गीतकार,संगीतकार और गायक कभी-कभी विरोध में खड़े होकर न्याय मांगने लगते हैं. निर्माता और म्यूज़िक कम्पनी ऐसे तमाम मौकों पर फ़िल्मी गीतों की बिक्री से जमा हुई दौलत पर चारों हाथ रखकर जवाब में चिलाते हैं – ‘बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला.’

निशाने पर सोनू निगम

इस बार इन चार हाथ वालों के निशाने पर हैं गायक सोनू निगम, जिन्होंने बग़ावत का झंडा बुलंद करते हुए तमाम स्थापित गायकों को एकजुट कर लिया है.

इन लोगों ने म्यूज़िक कम्पनियों के उस एग्रीमेंट पर दस्तख़त करने से इंकार कर दिया है, जो बकौल सोनू न सिर्फ इन गायकों को रायल्टी से बेदख़ल करता है बल्कि म्यूज़िक बेचने वाली कम्पनी का ‘ग़ुलाम’ भी बनाता है.

ताज़ा विवाद शुरू हुआ है शेखर सुमन की फ़िल्म ‘हार्टलेस’ के साथ. इस फ़िल्म के संगीत अधिकार टी सीरीज़ के भूषण कुमार ने खरीदे हैं. वह चाहते थे संगीत के रिलीज़ से पहले सोनू निगम और सुनिधि चौहान, जिन्होंने इस फ़िल्म के गीत गाए हैं, वे उनके बनाए हुए एग्रीमेंट पर दस्तख़्त करें अन्यथा वे इन गीतों को दूसरे गायकों की आवाज़ में डब करवाएंगे.

दस्तख़त से इंकार करते हुए सोनू ने कहा कि वे ऐसा ज़ालिमाना और अन्यायपूर्ण एग्रीमेंट साईन करने के बजाय गाना छोड़कर घर पर योगा करना पसंद करेंगे.

इस तमाम विवाद की जड़ें बहुत दूर उस दौर में छिपी हैं जहां पचास और साठ के दशक में लता मंगेशकर ने पार्श्व गायकों के साथ होने वाले इस अन्याय के ख़िलाफ उन्होने आवाज़ बुलंद की थी. सबसे पहली बात थी रिकार्ड पर गायक का नाम न होना.

1949 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘महल’ में संगीतकार खेमचंद प्रकाश के संगीत की एक महान रचना है ‘आयेगा...आयेगा...आयेगा, आयेगा आनेवाला, आयेगा’. इसे अक्सर लता मंगेशकर का गाया सर्वश्रेष्ठ गीत माना जाता है, लेकिन जिस समय इस गीत का रिकार्ड जारी हुआ तो उस पर गायक के स्थान पर नाम लिखा था – कामिनी.

दरअसल, इस फ़िल्म में हीरोइन मधुबाला का नाम कामिनी था. लता ने ग्रामोफ़ोन कम्पनी आफ इंडिया के साथ तब तक गाने से इंकार कर दिया जब तक वे रिकार्ड पर गायक का नाम नहीं देते. इस कम्पनी का एच.एम.वी लेबल सबसे ज़्यादा मशहूर था और एक अरसे तक लगभग उनकी मोनोपाली बनी रही थी. लेकिन,इस विवाद के बाद रिकार्ड पर बकायदा गायक का नाम भी आने लगा.

फ़िल्मफेयर अवार्ड्स

गायक की प्रतिष्ठा की लड़ाई का दूसरा मोर्चा था फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स. 1958 तक फ़िल्मफ़ेयर गायकों को कोई अवार्ड नहीं देता था. फ़िल्मफ़ेयर ने 1957 की फ़िल्म ‘चोरी चोरी’ में लता मंगेशकर के गाए गीत ‘रसिक बलमा’ के लिए बेस्ट संगीतकार का पुरस्कार शंकर जयकिशन को देने की घोषणा की.

रसमन विजेता संगीतकार को अवार्ड फंक्शन में इस गीत के साथ परफ़ॉर्म करना होता है. लता मंगेशकर ने गीत गाने से इंकार करते हुए संगीतकार जयकिशन को सीधे-सीधे कहा दिया कि फ़िल्मफ़ेयर अगर गायक को कोई मान्यता ही नहीं देता तो फिर आप भी उनके मंच से ‘अपने साज़ लेकर इस धुन को बजा लें.’

नतीजा यह हुआ कि फ़िल्मफ़ेयर को अगले ही साल से पार्श्व गायन के लिए पुरस्कार देने की शुरूआत करनी पड़ी.

इसके बाद आया मुद्दा रायल्टी का. लता मंगेशकर की ही पहल पर उस दौर के तमाम गायक जमा हुए ताकि पूरी ताकत और यकमुश्ती के साथ गीतों की रायल्टी में से हिस्सा मांगा जा सके.

इस बैठक में ही मुहम्मद रफ़ी और लता के बीच ऐसा विवाद हुआ जिससे दोनों ने एक-दूसरे से इस क़दर मुंह मोड़ा कि कई साल तक कोई गीत साथ नहीं गाया.

असल में रफ़ी बहुत ही सीधे-सादे और अल्लाह वाले इंसान थे. उनका ख़्याल था कि जब गायक गाने की फ़ीस ले लेता है तो फिर उसके बाद रायल्टी मांगना जायज़ नहीं है.

जबकि लता का मानना था कि गायक की आवाज़ ही गीत की आत्मा है और उसकी कमाई में उसका हक़ भी बनता है और यूं भी गायक को मिलने वाली फीस बहुत कम थी.

कलाकारों की बदतर हालत

यह बात एक हद तक बिल्कुल सही भी है. इतिहास इस बात का गवाह है कि बुढ़ापे में बिना काम के अनेक कलाकारों को या तो सड़कों पर भीख मांगने की नौबत आन पड़ी या फिर भूखे मरने की.

हिंदुस्तानी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म ‘आलमआरा’ का पहला गीत ‘दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे, गर ताकत है देने की’ गाने वाले डब्लूएम ख़ान अपने अंतिम दिनों में यही गीत गाते-गाते इस दुनिया-ए-फ़ानी से रवाना हुए.

फ़िल्म ‘शहीद’ (1948) के लिए मुहम्मद रफ़ी के साथ ‘वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो’ जैसे गीत गाने गायक-संगीत निदेशक ख़ान मस्ताना बम्बई के माहीम दरगाह के बाहर भीख मांगते हुए मरने की कहानी अब तक लोगों को याद है.

जीएम दुर्रानी जैसे गायक जिनकी गायकी के अंदाज़ को अपनाकर मोहम्मद रफ़ी ने अपना सफ़र शुरू किया, अपने अंतिम दिनों में बीमारी की हालत में इलाज के लिए भी औरों की तरफ ताकते रहते थे.

जयदेव जैसे संगीतकार ज़िंदगी भर न तो अपना एक घर बना पाए और न कोई बैंक बैलेंस. आखिरी दिनों में जब बीमार होकर बिस्तर पकड़ा तो एक संगीत प्रेमी अजीत सेठ ने ही उनके इलाज की ज़िमेदारी उठाई वरना कहानी कुछ और होती. संगीतकर खेमचंद प्रकाश की ‘दूसरी पत्नी’ तो आख़िर में एक फ़ुटपाथ पर बदहाली में जीती रहीं.

आमने-सामने

ये कितनी अजीब बात है कि करोड़ों रुपए कमाकर निर्माता और म्यूज़िक कम्पनी की तिजोरियां भरने वाले गीतों को रचने वाले गीतकार,संगीतकार और गायक के लिए कुछ भी नहीं है.

गीतकार जावेद अख़्तर ने जब कापीराईट एक्ट पर संशोधन के समय हुए विचार-विमर्श के दौरान गीतकार के लिए भी रायल्टी के प्रावधान की बात उठाई तो आमिर ख़ान जैसे अभिनेता-निर्माता से सामना करना पड़ा.

नतीजा यह है कि जावेद अख़्तर जैसे गीतकार के पास कोई काम नहीं है. निर्माता उनसे कन्नी काटने लगे हैं. ग़नीमत है कि वे इसा सबके बावजूद अपने स्टेंड पर आज भी कायम हैं. इसी तरह संगीतकार सलीम-सुलेमान को भी रायल्टी में हिस्सा मांगने पर यशराज और करन जौहर की फ़िल्मों से हाथ धोना पड़ा है.

पचासों बरस पुरानी इस लड़ाई में दोनो पक्षों की हार-जीत होती रही है. लता मंगेशकर को बाक़ायदा उनके गीतों की भरपूर रायल्टी आज भी मिलती है. आज के संगीतकारों में एआर रहमान तो बाकायदा मुनाफ़े में से अपना हिस्सा लेते हैं. जब आमिर ख़ान ने ‘तारे ज़मीन पर’ के लिए इस शर्त से इंकार किया तो रहमान ने फ़िल्म में संगीत देने से ही इंकार कर दिया.

'द इंडियन सिंगर्स राईट्स एसोसिएशन'

आज इस संघर्ष के घनीभूत होने की वजह है जून 2012 में पारित वह कापीराईट एक्ट जिसमें सभी रचनात्मक योगदान देने वाले कलाकारों – गीतकार, संगीतकार, गायक के लिए रॉयल्टी का प्रवाधान है.

इस कानून को म्यूज़िक कंपनियों ने अदालत में चुनौती देकर रोक रखा है. हैरान करने वाली बात यह है कि कलाकारों के विरुद्ध इस लड़ाई में टी सीरीज़ के मालिक भूषण कुमार और उनके पिता गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी टिप्स कम्पनी के मालिक रमेश तौरानी एक साथ खड़े नज़र आ रहे हैं.ज़ाहिर है हमेशा की तरह यहां भी दौलत वाले दौलत के लिए साथ-साथ हैं.

ताज़ा एग्रीमेंट असल में इसी एक्ट के प्रावधानों से बचे रहने की कवायद है, जिसे गायकों ने अपना एक नया संगठन 'द इंडियन सिंगर्स राईट्स एसोसिएशन' बनाकर चुनौती दे रखी है. सोनू निगम इस लड़ाई में सबसे आगे खड़े हैं लिहाज़ा सारे वार भी उन्हीं पर हो रहे हैं.

इस लड़ाई के बीच एक और चीज़ है जो म्यूज़िक कंपनियों के हाथ में एक ब्रह्मास्त्र की तरह मौजूद है, वह है नए कलाकार. मौका पाने की गरज़ से ये नए कलाकार हर शर्त मानकर अपना रास्ता बनाना चाहते हैं.

वे किसी भी एग्रीमेंट पर दस्तखत करने को तैयार हैं. ऐसे वक़्त में जब मशीनें बेसुरों को भी सुर दे देती हैं, ऐसे में सुर वालों की परवाह कौन करे.

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