जिसने रचा 'कौन बनेगा करोड़पति'

  • 30 दिसंबर 2013

दूरदर्शन पर 'क्विज़-टाइम' और बीबीसी वर्ल्ड टीवी पर 'यूनिवर्सिटी चैलेंज' जैसे क्विज़ प्रोग्राम के क्विज़-मास्टर, सिद्धार्थ बसु ने कैसे शुरूआत की अपने सवाल-जवाब वाले करियर की और 'कौन बनेगा करोड़पति' शुरू करते वक्त, वो ख़ुद क्यों नहीं बने उसके क्विज़मास्टर?

ऐसे कई सवाल मेरे मन में थे जब मैं उनसे मिली बीबीसी मीडिया ऐक्शन के कार्यक्रम में, जहां वो एक ऐसे बड़े विचारों के बारे में बोलने आए थे जो बदलाव की ताक़त रखता हो.

ठीक समझा आपने - 'कौन बनेगा करोड़पति' - साल 2000 में उनके प्रोडक्शन हाउस का ऐसा आइडिया, जिसने उनकी और सैंकड़ों दर्शकों की ज़िन्दगी बदल दी.

ज़ाहिर है, हमारी बातचीत जितनी उनके जीवन के बारे में थी, उतनी ही 'कौन बनेगा करोड़पति' पर भी, और सवालों की झड़ी लगी तो जवाबों में निकलीं कुछ अनजानी बातें.

भारत के सबसे जाने-माने क्विज़मास्टर होने के बावजूद जब आपने 'कौन बनेगा करोड़पति' शुरू किया तो उसकी मेज़बानी के लिए ख़ुद को क्यों नहीं चुना?

मैंने बहुत से क्विज़ शो किए, लेकिन ये सब अंग्रेज़ी में थे. हिन्दी में मेरा हाथ तंग है, और लोगों से जुड़ने के लिए इस शो का हिन्दी में होना ज़रूरी था.

अमित जी को उस वक्त किसी ने टीवी पर नहीं देखा था, ये हमारे लिए बहुत बड़ा फ़ैक्टर बना. मैं उनका शुक्रगुज़ार हूं और इसे अपनी अच्छी किस्मत समझता हूं कि वो ये शो करने को राज़ी हुए.

उनकी जगह भी शाहरुख खान ही ले पाए, जो बेहद हाज़िर जवाब शख्सियत हैं. वैसे भी मैं आईने में खुद को देखना पसंद नहीं करता हूं, बल्कि दूसरों को निर्देशित करना और उनके साथ काम करना अच्छा लगता है.

बतौर निर्माता-निर्देशक मेरे लिए सबसे रोमांचक अनुभव वो था, जब साल 2000 में केबीसी शुरू हुआ था, हम रात को सड़क पर निकलते थे, सन्नाटा रहता था, रास्ते खाली हो जाती थी, रेस्तरां का बिज़नेस कम हो जाता था, फ़िल्मों के नाइट शो में लोग कम जाते थे.

बस नौ बजते ही कई घरों से केबीसी की सिग्नेचर ट्यून सुनाई पड़ती थी. वो अनुभव कुछ और ही था.

'कौन बनेगा करोड़पति' लोगों से जुड़ा कार्यक्रम है, इनटरैक्टिव है, पर इसमें प्रतियोगियों की ज़िन्दगी पर बने वीडियो का इस्तेमाल करने का फ़ैसला किस सोच के तहत लिया गया?

दरअसल ये एक ऐसा शो था जो आपकी ज़िन्दगी बदल सकता था और इसीलिए भारत में इतना मशहूर भी हुआ. 'कौन बनेगा करोड़पति' की इस सफलता पर ही विकास स्वरूप ने किताब लिखी.

जब उस किताब पर फ़िल्म (स्लमडॉग मिलियनेयर) बनी, तब ये ज़िन्दगी बदलने वाली बात, एक झोंपड़ पट्टी में रहने वाले शख़्स के अमीर बनने की संभावना और भी बहुत रोमांचक लगने लगी.

दुनियाभर में इस भावना को किसी ना किसी तरह से इस्तेमाल किया गया. पर हमने ये सबसे ज़्यादा किया केबीसी में. लोगों की कहानियों से ये खेल श्रोताओं के और नज़दीक आ गया.

ये केबीसी का पुनर्जन्म था और इस शो को लंबे समय तक रोचक बनाए रखने के लिए हमें बदलाव करते रहना ज़रूरी भी है.

पर केबीसी, 'दस का दम' और 'सच का सामना' जैसे शो ने क्या क्विज़ के स्तर को हल्का कर दिया है?

सभी तरह के शो को देखने वाले लोग हैं. मैं जैसे क्विज़ करवाता था, चाहे वो 'क्विज़-टाइम' हो या 'यूनिवर्सिटी चैलेंज', उसे देखने वाले कुछ लोग हैं, पर केबीसी को देखने वाले करोड़ों हैं.

वो क्विज़ शो करवाने में कोई पैसा लगाना चाहे तो ज़रूर वो बनाए जाएंगे, पर इसमें कमाने के लिए पैसा नहीं है, यानी वापस कुछ नहीं मिलेगा, बस एक अच्छी और सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिलेगा.

उदाहरण के तौर पर ऐसे समझें कि किसी ख़ास क्विज़ शो को देखने वाले लोगों की तादाद या व्यूरशिप का अनुमान होता है 30,000 जबकि केबीसी का व्यूरशिप तीन करोड़ होता है.

आप समझते हैं कि आपकी हिन्दी अच्छी नहीं है, पर 'मद्रास कैफ़े' और 'बॉम्बे वेलवेट' के निर्देशक ऐसा नहीं सोचते. 58 साल की उम्र में आपने बड़े पर्दे का रुख कैसे किया?

'मद्रास कैफ़े' पर शूजीत लंबे समय से काम कर रहे थे. उन्हें एक ऐसे शख़्स की तलाश थी जो क़रीब मेरी उम्र का दिखता हो और बाल उड़ गए हों. वो मेरे दोस्त भी हैं.

शायद उन्हें ये भी लगता था कि मैं जिस अंदाज़ में क्विज़ में सवाल पूछता था, वो रौब या अंदाज़ उस पात्र के लिए सही था. वो एक नया चेहरा चाहते थे और डॉयलॉग्स में हिन्दी भी कम थी.

तो बस वो कर लिया. और उसकी डबिंग ख़त्म ही की थी कि अनुराग कश्यप का फ़ोन आया कि मैं उनकी अगली फ़िल्म में हूं और आकर स्क्रिप्ट देखूं-सुनूं.

'बॉम्बे वेलवेट' में मेरा रोल बहुत छोटा है, एक वकील का, पर उस फ़िल्म का कैनवस बहुत बड़ा है, पीरियड फ़िल्म है और 11 गानों के साथ एक म्यूज़िकल भी.

आपने नाटकों में काम किया, क्विज़-मास्टर बने, निर्माता-निर्देशक और अब अभिनेता, इसमें से क्या करने में आपकी सबसे ज़्यादा रुचि थी?

सबसे ज़्यादा जुड़ाव रहा थिएटर से, लेकिन उसमें जीविका नहीं थी. मेरे पीछे परिवार की कोई पुश्तैनी जायदाद भी नहीं थी. एक साल तक कोशिश की सिर्फ नाटक करने की पर गुज़ारा नहीं हुआ.

दिल्ली के सेंट स्टीफन्स कॉलेज में पढ़ाई करते हुए मैंने नाटक किए. बैरी जॉन के साथ काम किया. फिर कुछ डॉक्यूमेंट्री बनाईं.

आखिरकार एक होटल में काम किया. ये मेरी एकमात्र नौकरी थी, दो साल के लिए, इवेंट्स मैनेजर के तौर पर. उसी दौर में कभी कोई बीमार पड़ जाता था, तो मुझे बुला लेते थे अनाउंसमेंट करने के लिए.

ऐसे ही लोगों ने एनाउंसर के तौर पर मेरा काम जाना और फिर एक दिन फोन आया कि दूरदर्शन मुझसे एक क्विज़ शो होस्ट कराना चाहते थे. तो कभी सोचा नहीं था, पर वहीं से सवालों के सफर की शुरुआत हो गई.

और अब आपका अगला पड़ाव क्या होगा? कोई ऐसा काम जिसे करने की इच्छा हमेशा रही हो.

मैं प्रश्न चिन्ह से आगे बढ़ना चाहता हूं. एक ज़िन्दगी जिसमें सवालों के लिए कोई जगह ना हो.

वो क्या होगा ये मैं नहीं जानता, पर मैं उस अनुभव के रोमांच के लिए तैयार हूं.

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