फ़िल्म समीक्षा: कैसी है 'मिस्टर जो बी करवाल्हो'?

मिस्टर जो भी कारवाल्हो

रेटिंग: *1/2

बीआर एंटरटेनमेंट की "मिस्टर जो बी करवाल्हो" एक कॉमेडी फ़िल्म है.

जो बी करवाल्हो (अरशद वारसी) एक जासूस है.एक रईस बिज़नेसमैन खुराना (शक्ति कपूर) उसे अपनी बेटी, नीना (कृष्णा कोटक), पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त करता है.

नीना एक खानसामे, रामलाल (विशाल सिंह) के साथ भाग गई है और वे दोनों शादी करने वाले हैं जिसे खुराना रोकना चाहता है.

एक और शादी है जिसे रोका जाना है.

गोपा (स्नेहल दाभी), एक खूंखार अपराधी है और गहना (गीता बसरा) से प्यार रहता है लेकिन वह लोहेश (असीम मर्चेंट) से प्यार करती है.

गहना और लोहेश शादी करने वाले हैं और गोपा इस शादी को रोकना चाहता है.

वह एक दूसरे अपराधी, कार्लोस (जावेद जाफ़री) से किसी भी तरह यह शादी रोकने और गहना को उस तक लाने को कहता है.

एक और कुख्यात अपराधी, एमके (विजय राज) कार्लोस को यह काम मिलने पर आग-बबूला हो जाता है क्योंकि वह खुद यह काम करना चाहता था.

गोपा एमके को कार्लोस के सहायक के रूप में काम करने को कहता है. चूंकि एम के चेले (वीराजेश हीरजी और राजेश बलवानी) कार्लोस को पहचानते नहीं हैं इसलिए वह ग़लती से जो बी करवाल्हो को कार्लोस समझ लेते हैं. अब जो और कार्लोस एक ही मौके पर इसलिए पाए जाते हैं क्योंकि गहना और नीना सहेलियां हैं और वह शादी करने से पहने अक्सर मिलती हैं.

Image caption अरशद और सोहा ने अच्छी कोशिश की है.

जो का अपनी गर्लफ़्रेंड, शांतिप्रिया (सोहा अली ख़ान), से ब्रेकअप हो गया है. वह एक पुलिस इंस्पेक्टर है. चूंकि पुलिस कार्लोस के पीछे पड़ी है इसलिए शांति प्रिया भी अक्सर जो और कार्लोस से टकरा जाती है. जल्द ही शांतिप्रिया को पता चलता है कि जो अब भी उससे प्यार करता है इसलिए उन दोनों को फिर प्यार हो जाता है.

इसके बाद क्या होता है? क्या वह दोनों शादियां रुक जाती हैं या नहीं? क्या जो और शांतिप्रिया सुख से रहते हैं?

बचकानी स्क्रिप्ट

अरशद सैयद और महेश रामचंदानी की लिखी कहानी बचकानी है और खीझ पैदा करती है. तर्क को जैसे खिड़की से बाहर फेंक दिया गया है और पूरी कहानी इतनी अविश्वसनीय लगती है कि दर्शक इससे जुड़ाव महसूस ही नहीं कर पाते.

महेश रामचंदानी का स्क्रीनप्ले ऐसा है कि पहले ही पता चल जाता है कि कहां हंसाने की कोशिश की जा रही है. घटनाएं इतनी मूर्खतापूर्ण हैं कि हंसाने की कोशिशें बार-बार मुंह के बल गिरती हुई लगती हैं.

कहीं-कहीं पर फ़िल्म गुदगुदाती ज़रूर है लेकिन यह मौके इतने कम हैं, यह याद रखना मुश्किल हो जाता है कि यह एक कॉमेडी फ़िल्म है.

जो और शांतिप्रिया के ब्रेकअप की वजह बकवास है. इसके अलावा कार्लोस अलग-अलग भेस में क्यों आता है यह साफ़ नहीं है और इसकी वजह से फ़िल्म का ट्रैक बचकाना लगता है.

और भी कई चीज़ें ऐसी होती हैं कि दर्शक यह समझ ही नहीं पाता कि क्या हो रहा है? महेश रामचंदानी के डायलॉग कहीं-कहीं तो मज़ेदार हैं लेकिन ज़्यादातर फ़िल्म में वह बचकाने और बेहूदा हैं.

क्लाइमैक्स में जब गोपा आसमान में जाता और अचानक हवा में से प्रकट हो जाता है इतना बेमतलब और खिजाने वाला है कि यह दर्शकों के सब्र का बांध तोड़ता लगता है.

अरशद वारसी ने अपने रोल में बहुत मेहनत की है और अच्छी फ़िल्म देने की कोशिश की है लेकिन बचकानी स्क्रिप्ट के चलते वह बहुत ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते थे.

Image caption अरशद वारसी ने माइंड ब्लास्टेड गाने की कोरियोग्राफ़ी भी की है.

सोहा अली ख़ान ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है. जावेद जाफ़री ने कमाल का काम किया है लेकिन उनका किरदार अजीब लगता है. शक्ति कपूर को कुछ अच्छे सीन मिले हैं.

अरशद की कोरियोग्राफ़ी

विजय राज प्रशंसनीय सहजता से अभिनय करते हैं. स्नेहल दाभी बहुत लाउड हो गए हैं. विरजेश हीरजी को भी कुछ अच्छे मौके मिले हैं. गीता बसरा ठीक हैं. असीम मर्चेंट के पास करने को कुछ था ही हनीं. करिश्मा कोटक औसत हैं. विशाल सिंह दिखने में तो सुंदर हैं लेकिन ऐक्टिंग उनके बस का काम नहीं.

राजेश बलवानी, वीरेंद्र सक्सेना, नवीन परिहार और बाबुल सुप्रियो ने ठीक-ठाक काम किया है. छोटे से रोल में रंजीत अपनी छाप छोड़ जाते हैं. एमके की बीवी के रूप में चित्रा शिनॉए बहुत साधारण रहीं. कुणाल खेमू बहुत हल्के से नज़र आते हैं.

समीर तिवारी का निर्देशन ठीक है लेकिन वह दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब नहीं हो पाते, वैसे यह बेहद ख़राब स्क्रिप्ट की वजह से है.

अमर्त्य राहुल का संगीत साधारण है. 'माइंड ब्लास्टेड' गाना ठीक ठीक है. अमिताभ भट्टाचार्य के लिखे गीत फ़िल्म के लिहाज से तो ठीक हैं लेकिन उनमें कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है. 'माइंड ब्लास्टेड' गाने में अरशद वारसी की कोरियोग्राफ़ी अच्छी लगती है.

गानों का पिक्चराइज़ेशन (राजू खान और जास्मिन का किया हुआ) रूटीन लगता है. अमर्त्य राहुल का बैकग्राउंड म्यूज़िक उल्लेखनीय है. असीम बजाज की कोरियोग्राफ़ी अच्छी है.वर्धराज कामत के सेट ठीक हैं. रवि वर्मा का एक्शन और स्टंट कामचलाऊ हैं. धर्मेंद्र शर्मा की एडिटिंग को और थोड़ा बेहतर होने की ज़रूरत है.

कुल मिलाकर "मिस्टर जो बी करवाल्हो" बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ नहीं कर पाएगी क्योंकि इसकी कॉमेडी मनोरंजन नहीं करती. बॉक्स ऑफ़िस पर इसका हश्र भयानक होने वाला है.

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