मैं इंटरव्यू नहीं देता, क्यों पीछे पड़े हो: असरानी

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एक दिन मैं मुंबई डायरी लिखने बैठा ही था कि मेरी नज़र अखबार में छपे एक विज्ञापन पर गई. विज्ञापन एक नाटक का था. इसमें मशहूर कॉमेडियन असरानी अभिनय कर रह थे.

असरानी को मैंने आजतक केवल फ़िल्मों में ही कॉमेडी करते देखा था. नाटक में तो उनका जोश कमाल का होगा, यह सोचते ही मेरे अंदर का पत्रकार जाग उठा. मैंने विज्ञापन के नीचे दिए नंबर पर फ़ोन घुमा दिया.

फ़ोन नंबर था, नाटक के निर्माता नवीन बावा का. उन्होंने इस नाटक में असरानी के साथ अभिनय किया है. बावा से मैंने असरानी से मिलने की इच्छा जताई. उन्होंने कहा,''बहुत मुश्किल है असरानी साहब का इंटरव्यू मिलना. आजकल वो नाटक के अभ्यास में व्यस्त हैं, लेकिन मैं कोशिश करुंगा.''

कमाल की ऊर्जा

असरानी के इंटरव्यू की व्यग्रता कुछ ऐसी थी कि तीन घंटे बाद मैंने फिर बावा को फ़ोन मिला दिया और एक बार फिर असरानी के इंटरव्यू के लिए उनसे बात की. इस पर उन्होंने कहा,''उनके मूड पर है आप शाम को रिहर्सल के समय आ जाओ, देखते हैं.''

मैं रिहर्सल के दौरान पहुँचा. स्टेज पर असरानी अपने डॉयलाग दोहरा रहे थे. कमाल की ऊर्जा थी. दो घंटे के इस कॉमेडी नाटक में असरानी पिता की भूमिका निभा रहे थे, जो अपने बेटे का विवाह करवाना चाहता है.

मंच पर असरानी साहब सबसे बड़े और रियल एक्टर लग रहे थे. इस नाटक में उन्होंने डांस, गाना और मज़ाक सब किया. असरानी साहब का उत्साह देख मेरे होश उड़ गए. इस उम्र में इतनी ऊर्जा, मैंने पहले किसी और में नहीं देखी थी.

रिहर्सल ख़त्म होते ही मैं असरानी साहब के मेकअप रूम में जा पंहुचा और अपनी इच्छा बताई. इस पर वो बोले, ''तो मैं क्या करुं भाई, मैं नहीं देता इंटरव्यू मुझे जाना है.''

इस पर मैंने कहा, असरानी साहब, इस नाटक में आपके किरदार पर बात करनी है. यह सुनकर वो बोले, भाई मुझे जाना है, रहने दो.

पहली मुलाक़ात

मैंने फिर सिर खुजलाया और कहा, असरानी साहब यह बीबीसी से आपकी पहली मुलाकात है. मेरी इस बात पर पता नहीं क्या हुआ कि वो दरवाज़े की ओर चल पड़े, मैं घबरा गया कि अब क्या हुआ. लेकिन असरानी साहब दरवाज़े की चिटकनी लगाने गए थे. वापस आकर कुर्सी खींचते हुए बोले शुरू करो भाई. मुझे जल्दी है.

उन्होंने अपने बैग से तीन डिब्बियां निकालीं, एक में इलायची, एक में सौंफ और एक में सूखी पान सुपारी. उन्होंने मुझसे भी पान के बारे में पूछा. मैंने कहा, नहीं सर इंटरव्यू शुरू करते हैं.

इस पर मुंह में मसाला भर कर असरानी मेरे सामने बैठ गए. मैंने एक लंबी सांस भरी और पूछा, असरानी साहब आज आपकी उम्र के अभिनेता बाबू जी या घर के बुज़ुर्ग की भूमिका करते हैं, लेकिन आप आज भी कॉमेडियन, कैसे? ये जोश कहां से आया?

उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, ''देखो भाई ये सब अभ्यास से आता है. मुंबई के संघर्ष ने हमें सब सिखा दिया. मैं पूना के फिल्म स्कूल में एक्टिंग सीख रहा था. पूना से मुंबई चक्कर लगाने पड़ते थे, कभी किसी डायरेक्टर के पास तो कभी प्रोड्यूसर से मिलने के लिए. कभी सफलता मिली कभी नहीं मिली, पर हम ख़ुद को हमेशा ट्यून रखते थे.''

इससे पहले नाटक करने के सवाल पर उन्होंने कहा, '' मैंने कभी नाटक लगातार नहीं किया. बस कॉलेज में ही एक दो किए. जब फ़िल्मो में आए तो किसी ने पूछा ही नहीं की भाई तुम थिएटर से हो क्या? न हमने कभी नाटक किया न किसी ने हमसे पूछा.''

पर अब जब निर्माता मेरे पास एक अच्छे पात्र की कहानी लेकर आए तो मैंने हाँ कर दी. पुराने दौर में ऋषिकेश मुख़र्जी, गुलज़ार, एलवी प्रसाद ऐसे लोग अच्छे रोल देते थे तो कभी थिएटर की ओर कैरेक्टर ढूँढने जाना ही नहीं पड़ा.

फ़िल्मों का काम मुश्किल

फिल्म और रंगमंच में से फिल्म को मुश्किल माध्यम बताते हुए असरानी ने कहा,'' फिल्में ज्यादा मुश्किल हैं, उसमें कैमरे से बात करनी पड़ती है. वहां आपको लाखों का सामना करना है. सबका मनोरंजन करना है. थिएटर में तो कुछ ही लोग सामने हैं ना.''

असरानी का फिल्म में होना मतलब कॉमेडी. मैंने उनसे पूछा, असरानी साहब आपको केवल कॉमेडियन कहा गया, इस तरह कहीं आपके साथ भेदभाव तो नहीं हुआ?

इस पर उन्होंने कहा, ''ये मेरा सौभाग्य था की मुझे गुलज़ार, ऋषिकेश मुख़र्जी जैसे निर्देशक मिले जिन्होंने मुझे अलग-अलग रूप से इस्तेमाल किया. मैंने एक फिल्म ख़ुद बनाई ''चला मुरारी हीरो बनने'', उसमे मैंने खूब इमोशनल सीन किए. इसके अलावा मुझे कई गुजराती फ़िल्मों में लीड रोल भी मिले. मैंने सब किया.''

उस दौर के निर्देशकों को मैच्योर बताते हुए असरानी ने कहा, ''उस समय के फ़िल्मकारों ने विमल रॉय के फ़िल्मिंग स्टाइल से खूब सीखा जिसने मुझे एक बेहतर अभिनेता बनाया.''

आज के लेखकों पर निशाना साधते हुए असरानी ने कहा, ''आज सब हॉलीवुड से उठा रहे हैं. इसलिए लेखकों के संवाद में वह मज़ा नहीं आता. जब एक एक्टर उसे फिल्म में उतारने की कोशिश करता है तो वो सीधे मुंह गिर जाती है. हमारे टाइम में छह-सात लेखक होते थे. वो एक एक सीन लिखते थे. कॉमेडी के लिए लेखन और अच्छे लेखन दोनों पर ख़ूब ध्यान होना चाहिए.

अनुभव से आता है व्यंग्य

इतनी बातचीत के बाद असरानी कुर्सी छोड़ने का इशारा करने लगे. लेकिन मैंने हड़बडाते हुए एक और सावाल पूछ लिया. मैंने उनसे पूछा कि लेखक के अलावा एक अभिनेता का सेंस ऑफ़ ह्यूमर कैसे तैयार होता है?

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इस पर उन्होंने कहा, ''अच्छे निर्देशक, अच्छी कहानी और इतने सालो के अनुभव से यह व्यंग्य उत्पन होता है. हमने अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया. कॉमेडी की टाइमिंग उनसे सीखी.''

इसके बाद अपने हाथ में झूलती हुई घड़ी की ओर देखते हुए उन्होंने कहा,''मैं निकलता हूँ मुझे बस अब देरी हो रही है.''

मैंने उनका धन्यवाद किया और उनसे विदा ली.

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