'उम्र के साथ बेहतर शायर, अच्छे पिता बने जाँनिसार अख़्तर'

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उनके बारे में बात करने में एक परेशानी तो यह होती है कि उनको एक शायर या कवि के रूप में बयान करूं या एक पिता के रूप में. मैं दोनों के रूप में एक-दो बात कह सकता हूं.

पूरी बातचीत सुनें: 'जीना आया मुझे तो मरते वक्त'

जब वह पिता बने तो उनकी उम्र रही होगी करीब 27-28 साल. उस ज़माने में पिता की भूमिका कोई साफ़ नहीं थी कि पिता को क्या करना चाहिए और क्या नहीं.

इसके अलावा उनके अपने पिता की भी मृत्यु तब हो गई थी जब वह 10-11 साल के रहे होंगे. तो उनके पास कोई रोल मॉडल नहीं था.

तीसरे उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी उस वक़्त. तो वह मेरे या मेरे भाई के लिए बहुत आदर्श पिता नहीं रहे.

लेकिन जब उनकी उम्र बढ़ी, ज़िंदगी का तजुर्बा बढ़ा, आर्थिक स्थिति ठीक हुई, रहने का नया घर बना जिसमें कुछ सुविधाएं मिलीं, रोज़ाना की ज़िंदगी का एक ढांचा बना तो फिर वह काफ़ी ज़िम्मेदार आदमी बने.

सच तो यह है कि अपने लिखने में, अपने काग़जात रखने में बहुत ही ज़िम्मेदार, बहुत ही ख़्याल रखने वाले आदमी थे.

ख़ूबसूरती था मज़हब

स्वभाव से काफ़ी शर्मीले थे, ज़्यादा बोलते नहीं थे. अगर वह कहीं किसी दावत में हों और कोई उनके हाथ में प्लेट न पकड़ा दे तो वह खाना भी नहीं खाते, भूखे रह जाते.

पैसों के मामले में भी ऐसा ही था. जो गाना लिख दिया- लिख दिया. पैसा आएगा तो आएगा, मांगते नहीं थे.

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उस शर्म में पुराने लखनऊ की रवायत भी थी जिसे कुछ लोग कमज़ोरी भी समझ सकते हैं. अब यह इस पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं.

लेकिन शाम को एक-दो पैग लगाने के बाद और दो-एक जवान दोस्तों के साथ बैठने पर- जिनमें निदा फ़ाज़ली थे, साबिर दत्त थे, साबिर कमाल, अज़ीज़ कैसी (वह ज़्यादा छोटे नहीं थे, लेकिन थे छोटे) पांच-छह लोग होते थे- वह खुलकर बात करते थे. फिर लतीफ़े सुनाना, पुराने क़िस्से सुनाना, शेरो-शायरी सुनना और सुनाना.

कमाल क्या है कि उनकी शायरी के कई दौर गुज़रे हैं. पहले जवानी में रूमानी शायरी, फिर समाज से जुड़ी शायरी. तो लोगों ने कहा कि ख़त्म हो गए यह अब, भूल जाओ इनको.

लेकिन एकदम से 70 के दशक में जो अचानक यह नई उर्दू शायरी शुरू हुई- जिसमें आसान ज़ुबां, जिस्म का भी ज़िक्र और मन की, समाज की उलझनों का ज़िक्र नहीं- उसमें भी वह मिल गए.

उनका एक शेर है, "फ़िक्र ओ फ़न की सजी है नई अंजुमन, हम भी बैठे हैं कुछ नौजवानों के बीच."

बहुत सादा आदमी थे. मेरे ख़्याल से उन्होंने कभी कलाई घड़ी नहीं पहनी, न उनके पास कभी कोई बटुआ था. जब-जब पैसे हुए, जेब में हुए, कभी नहीं भी हुए.

उनकी ज़रूरतें बेहद कम थीं. ज़रूरतें बस इतनी ही थीं कि चीज़ें ख़ूबसूरत हों उनके इर्द-गिर्द, लोग ख़ूबसूरत हों, बातें ख़ूबसूरत हों, ज़ुबान ख़ूबसूरत हो.

मेरा ख़्याल है ख़ूबसूरती उनका एक मज़हब था. न वह हिंदू थे, न मुसलमान. बुनियादी तौर पर ख़ूबसूरती उनका एक मज़हब था.

लखनऊ के रहे ताउम्र

लेकिन दुनिया तो ख़ूबसूरत होती नहीं है हमेशा, वह तो चोट पहुंचाएगी. तो जब चोट पहुंचती है तो या तो आप बागी बन जाएं- विद्रोह करें या फिर अपने में सिमट जाएं और अपने अंदर डूब कर उसमें से निकाल कर शायरी करें. तो वह दूसरी क़िस्म के शायर थे.

जैसे उनका एक शेर है, "सुबह की आस किसी लम्हा जो घट जाती है, ज़िंदगी सहम के ख़्वाबों से लिपट जाती है."

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Image caption जां निसार अख़्तर के बेटे सलमान अख़्तर मानते हैं कि अपने आख़िरी वक्त में उन्होंने बेहतरीन शायरी की.

तो वह इस तरह के पुराने लखनवी आदमी थे. बंबई में रहे वह ज़रूर 30-32 साल लेकिन बंबई के कभी हुए नहीं, न ही फ़िल्म इंडस्ट्री के हुए.

गाने रिकॉर्ड होते थे, तो कभी-कभी गानों की रिकॉर्डिंग में नहीं जाते थे. इस वजह से एक दो मज़ेदार ग़लतियां भी हो गईं.

जैसे उनका एक मशहूर गाना है "ग़रीब जान के तुम हमको न भुला देना, तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना."

तो उसको गीता दत्त ने गा दिया "तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दबा देना." यह ग़लती ठीक हो सकती थी, अगर वह वहां मौजूद रहते.

तो बंबई में रहकर भी बंबई से बेनियाज़ ही रहे. बुनियादी तौर पर लखनऊ में ही रहते रहे वह ज़िंदगी भर.

दिलचस्प, ख़ामोश, शर्मीले

आमतौर पर उर्दू के शायर उम्र के मध्य में अच्छी शायरी करते हैं. जवानी में कुछ कमज़ोर, जब 30-35 के होते हैं तब बेहतरीन शायरी और फिर 50-60-70 हल्के-हल्के उनकी शायरी कम होती जाती है.

लेकिन कमाल की बात यह है कि जवानी की उनकी दो-तीन नज़्में अच्छी हैं, ख़ासतौर पर जब हमारी मां की मौत हुई तब की. लेकिन उनकी बेहतरीन नज़्में हैं- बुढ़ापे की.

हालांकि वह बुढ़ापा भी कोई बुढ़ापा नहीं था, करीब 64-65 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई थी.

उन्होंने आखिरी उम्र में जो शायरी की है वह बेहतरीन है. ग़ज़ल, नज़्म- घर के बारे में, बीवी के बारे में- वह बेहतरीन हैं.

कुल मिलाकर मेरी राय यह है कि वह एक दिलचस्प आदमी थे जो अपने समाज के नुमाइंदे थे. दिलचस्प, ख़ामोश, शर्मीले आदमी थे.

अमीर परिवार में पले थे, पिता की मौत जल्द हो गई थी, मां थीं जो बहुत प्रोटक्टिव थीं. इससे उनमें उलझनें पैदा हुईं जो कभी अच्छे ढंग से बाहर निकलीं, कभी ख़राब ढंग से. कभी यह अपनी ज़िम्मेदारी से भागने, शराब से बाहर आईँ तो कभी शायरी से, रचनात्मकता से.

सलमान अख़्तर जाँनिसार अख़्तर के छोटे बेटे हैं. पिछले चार दशकों से अमरीका में रह रहे सलमान पेशे से मनोचिकित्सक हैं.

(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल से बातचीत पर आधारित)

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