पाकिस्तान में फंसी ‘हंसी तो फंसी’ और ‘गुंडे’

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पाकिस्तान में मल्टीप्लेक्स दर्शकों में भारतीय फ़िल्मों को लेकर ख़ासा रूझान है लेकिन फ़िलहाल दो ताज़ा भारतीय फ़िल्में देखना उनके लिए मुमकिन नहीं हो पाया.

पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से इन दोनों फ़िल्मों को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दिया गया है.

पाकिस्तान में वरिष्ठ स्तंभकार और मांडीवाला ऐंटरटेनमेंट कंपनी में वितरण निदेशक नवाज़ हसन सिद्दीक़ी ने बताया कि कुछ पुराने फ़िल्मकारों ने कथित तौर पर ग़ैरक़ानूनी ढंग से दिखाई जाने वाली भारतीय फ़िल्मों पर रोक लगाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

इसके बाद ही भारतीय फ़िल्मों को मिलने वाली एनओसी पर रोक लग गई है. नतीजतन 'हंसी तो फंसी' और 'गुंडे' सिनेमा हॉल तक नहीं पहुंच पाई हैं.

असर

फ़िल्में ना रिलीज़ होने से पड़ने वाले असर पर बात करते हुए नवाब हसन कहते हैं, ‘‘बिज़नेस पर बहुत असर पड़ता है. सिनेमा हॉल ख़ाली पड़े हैं. ये सिर्फ़ सिनेमा का मामला नही है. एक मल्टीप्लेक्स के अंदर और बहुत सी चीज़ें जुड़ी होती हैं. मिसाल के तौर पर फ़ूड कोर्ट के व्यवसाय पर बहुत असर पड़ता है. सैकड़ों लोग वहां काम करते हैं.’’

साथ ही नवाज़ हसन ये भी जोड़ते हैं कि इस तरह सिनेमा हॉल में रिलीज़ पर रोक लगाने से क्या फ़ायदा जब फ़िल्में डीवीडी और केबिल पर भी दिखाई जा सकती हैं. नुकसान तो सिर्फ़ फ़िल्में दिखाने वाले थियेटर और वितरण चेन ही झेलती हैं.

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पाकिस्तानी फ़िल्में

पाकिस्तान में लंबे समय से फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूशन में लगी कंपनी एवरेडी ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़ के महाप्रबंधक अज़ीज़ पाशा बताते हैं कि ,‘‘70-80 फ़ीसदी तक बिज़नेस प्रभावित हुआ है. अंग्रेज़ी फ़िल्मों से भी हमें थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती है मगर वो इस नुक़सान की भरपाई नहीं कर पातीं. हमें पता चला है कि इस बीच तकरीबन 40 पाकिस्तानी फ़िल्मों के प्रोडक्शन का काम शुरू हो चुका है. देखिए क्या होता है.’’

क्या भारतीय फ़िल्मों पर रोक लगने से पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग को कुछ फ़ायदा होने की उम्मीद है. इस सवाल के जवाब में अज़ीज़ पाशा कहते हैं,‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता. फ़िल्मों की गुणवत्ता मायने रखती है और गुणवत्ता वहीं होती है जहां प्रतियोगिता होती है.’’

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