आलिया दर्शकों को 'हाईवे' पर कहाँ तक ले जा पाईं

  • 21 फरवरी 2014
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रेटिंग:**1/2

नाडियाडवाला ग्रैंडसन और विंडो सीट फ़िल्म्स की हाईवे कहानी है एक ऐसी लड़की की जिसका अपहरण हो जाता है और वो अपने ही अपहरणकर्ता से प्यार करने लगती है.

वीरा(आलिया भट्ट) की विनय(अर्जुन मल्होत्रा) से सगाई हो जाती है. लेकिन शादी से ठीक एक दिन पहले ही कुख्यात अपराधी महाबीर भाटी (रणदीप हुडा) उसको अग़वा कर लेता है.

(रिव्यू: 'गुंडे')

पहले तो वीरा बहुत डर जाती है लेकिन जल्द ही उसे एहसास हो जाता है कि महाबीर उसे शारीरिक तौर पर कोई नुक़सान नहीं पहुंचाएगा और उसने उसका अपहरण सिर्फ़ पैसों के लिए किया है.

महाबीर के साथ रहने के दौरान वो धीरे-धीरे उसे पसंद करने लगती है. महाबीर भी वीरा की मासूमियत और चंचलता से प्रभावित हो जाता है. बल्कि वो महाबीर से बताती है कि अग़वा होने के बाद वो कितना आज़ाद महसूस कर रही है और वो सब कुछ कर पा रही है जो अपने अमीर मां-बाप के साथ रहते हुए वो नहीं कर पा रही थी.

(रिव्यू: 'हंसी तो फंसी')

वीरा के साथ समय गुज़ारते हुए महाबीर का भी दिल बदल जाता है और वो वीरा को एक पुलिस स्टेशन के नज़दीक छोड़ देता है ताकि वो अपने परिवार वालों से मिल सके.

लेकिन तब तक वीरा, उससे प्यार करने लगती है और उसे छोड़कर अपने मां-बाप के पास जाना ही नहीं चाहती. आगे क्या होता है ? यही फ़िल्म की कहानी है.

पुरानी कहानी, ताज़ा स्क्रीनप्ले

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इम्तियाज़ अली की कहानी बिलकुल मौलिक तो नहीं है. हम ये सब दूसरी कुछ फ़िल्मों में भी देख चुके हैं, लेकिन फ़िल्म का स्क्रीनप्ले (इम्तियाज़ अली) बिलकुल ताज़ा है.

वीरा और महाबीर के बीच फ़िल्माए दृश्य ताज़गी का एहसास देते हैं और मनोरंजनक भी हैं. वीरा के किरदार में आलिया भट्ट की मासूमियत फ़िल्म का सबसे मज़बूत पहलू है.

(रिव्यू: 'वन बाय टू')

महाबीर और उसके साथियों की हरकतें और वीरा की सहज स्वाभाविक चंचलता फ़िल्म में आवश्यक कंट्रास्ट लाने में कामयाब होते हैं और यही बात दर्शकों को पसंद आएगी.

हालांकि कहानी में गंभीर मोड़ तब आता है जब वीरा अपने बचपन के एक सदमे के बारे में महाबीर को बताती है. लेकिन जल्द ही निर्देशक फ़िल्म में वापस हल्के फुल्का माहौल लाने में कामयाब होता है.

कमियां

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हालांकि स्क्रीनप्ले में कुछ कमियां भी हैं. जैसे वीरा के अपहरण के बाद निर्देशक ने लंबे समय तक ये दिखाने की ज़हमत ही नहीं उठाई कि उसके मां-बाप पर क्या बीत रही है और वो क्या क़दम उठा रहे हैं.

साथ ही महाबीर का वीरा के प्रति लगाव होना और उसका दिल पिघलना भी बड़ी जल्दबाज़ी में दिखा दिया गया. साथ ही पहली बार आज़ादी का स्वाद चख रही वीरा का अपने अमीर मां-बाप के प्रति ग़ुस्सा भी बहुत सारे दर्शकों के गले नहीं उतरेगा.

(रिव्यू: 'जय हो')

फ़िल्म का हास्य सीमित दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगा. सिंगल स्क्रीन थिएटर्स के दर्शक शायद फ़िल्म को उतना प्यार ना दें.

इंटरवल से पहले फ़िल्म ज़्यादा मनोरंजक है. इंटरवल के बाद फ़िल्म में मनोरंजन की कमी है. साथ ही ये हिस्सा खींचा गया और अवास्तविक सा लगता है. फ़िल्म की गति धीमी है. इम्तियाज़ अली के लिखे संवादों में दम है.

रणदीप अच्छे, आलिया बेहतरीन

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महाबीर भाटी के किरदार में रणदीप हुडा ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है. उन्होंने एक ऐसे अपराधी का रोल बख़ूबी निभाया है जिसका ह्रदय परिवर्तन हो जाता है.

आलिया भट्ट ने तो कमाल का अभिनय किया है. वो अपने किरदार में पूरी तरह से घुस गई हैं. बाकी कलाकारों ने भी उम्दा अभिनय किया है.

(रिव्यू: 'मिस लवली')

इम्तियाज़ अली का निर्देशन अच्छा है. उनकी सबसे बड़ी कामयाबी ये रही कि उन्होंने अपने कलाकारों से बेहतरीन काम निकलवाया.

एआर रहमान का संगीत अच्छा है लेकिन उनसे इससे कहीं बेहतर काम की उम्मीद थी. 'आली-आली' गाना पहले ही सुपरहिट हो चुका है लेकिन बाकी गानों में वो माद्दा नहीं है जो लोगों की ज़ुबां पर चढ़ जाएं.

कुल-मिलाकर हाईवे एक अच्छी फ़िल्म है लेकिन सिर्फ़ बड़े शहर के युवाओं को ही अपील कर पाएगी.

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