पाक में शूटिंग के लिए सुरक्षा बड़ी समस्या: मीरा नायर

रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट के कलाकारों के साथ मीरा नायर इमेज कॉपीरइट Getty

जानी मानी फ़िल्मकार मीरा नायर इन दिनों लाहौर में हैं जहां वो लेखकों के सालाना समारोह में हिस्सा ले रही हैं.

वो पाकिस्तान के जाने माने लेखक मोहसिन हामिद की चर्चित किताब 'रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट' पर फ़िल्म बना चुकी हैं जो पाकिस्तान में फैले चरमपंथ के बारे में है.

इस फ़िल्म में पाकिस्तान के अदाकारों के साथ-साथ गीत-संगीतकारों ने भी अपना योगदान दिया है.

मीरा नायर से लाहौर में बीबीसी उर्दू सेवा की नुख़बत मलिक ने बातचीत की. पढ़ें बाचतीच के चुनिंदा अंश.

आपने अपनी पूरी फ़िल्म की शूटिंग पाकिस्तान में क्यों नहीं की?

मेरी चाहत है कि मैं अपनी पूरी फ़िल्म लाहौर में बना सकूं लेकिन अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों में जिस तरह की सुरक्षा भावना की ज़रूरत होती है, केवल कलाकारों के लिए नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म क्रू के लिए, वह यहाँ पाकिस्तान में नहीं मिल पाती है. पाकिस्तान के नाम को लेकर लोगों में काफ़ी असुक्षा का बोध है. हमें कोई आश्वस्त भी नहीं कर पाता है. इसका मुझे बहुत दुख है. इस वजह से यहाँ के दृश्यों को मैंने दिल्ली में शूट किया.

आपकी फ़िल्म को लेकर कहा जा रहा है कि इसमें रेमंड डेविस के चरित्र को दिखाया गया है?

हमने रेमंड डेविस (पूर्व अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंट) को सीधे-सीधे नहीं दिखाया है. लेकिन मेरी इच्छा थी कि हम उसे याद करें. उसे भूले नहीं कि रेमंड डेविस था यहाँ. मैं उसे भूलना नहीं चाहती. उसने जो किया, उसे मैं भूलना नहीं चाहती. उसके बारे में अख़बारों में छपा. इसलिए उसके बारे में हम जानते हैं. लेकिन उसके जैसे बहुत से लोग हैं यहां.

दी 'रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट' के बारे में यह भी कहा जाता है कि किताब में जो लिखा है, यह फ़िल्म उससे अलग है?

देखिए, फ़िल्म और किताब, दोनों अलग-अलग माध्यम हैं. मुझे यह किताब बहुत पसंद आई थी. इस किताब की जो आत्मा है कि 'कौन हैं हम'. हम फंडामेंटलिस्ट हैं या कुछ और. ये अमेरिकन कौन हैं. किताब में अमरीकी और पाकिस्तानी के बीच जो संवाद है, वह बहुत महत्वपूर्ण है. फ़िल्म और किताब में जो संवाद होता है, उसे हम कभी फ़िल्मों में नहीं सुनते हैं.

इस तरह की फ़िल्मों का जो बजट होता, क्या वह सीमित होता है, या पैसा लगाने वाले लोग वाकई इस तरह की फ़िल्मों में दिलचस्पी रखते हैं ?

'रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट' की फंडिंग की कहानी रामकथा है. यह फ़िल्म तीन बार शुरू हुई और बंद हुई. बहुत मुश्किल थी इस फ़िल्म की फ़ंडिंग. लेकिन अंत में एक ही निवेशक रह गए जो शुरू से इसमें दिलस्चपी दिखा रहे थे, वह था दोहा फ़िल्म इंस्टीट्यूट.

भारत के युवा फ़िल्मकार किस विषय पर फ़िल्में बना रहे हैं?

भारत के युवा फ़िल्मकार बहुत अच्छी फ़िल्में बना रहे हैं. ज़ोया अख़्तर की फ़िल्में मुझे बहुत पसंद आती हैं. उनकी पहली फ़िल्म 'लक बाई चांस' मुझे बहुत पसंद आई. किरण राव की फ़िल्म 'धोबीघाट' भी मुझे बहुत पसंद आई. एक और फ़िल्म मैंने जो अभी देखी है और वह अभी रिलीज़ नहीं हुई है, वह है, 'किस्सा'. यह एक पंजाबी फ़िल्म है, जो विभाजन पर आधारित है. एक पंजाबी परिवार पाकिस्तान से भारत आता है, उसकी तीन बेटियां हैं. उसी पर आधारित है यह फ़िल्म.

पाकिस्तान में पिछले साल 26 फ़िल्में रिलीज हुई. ये फ़िल्में अलग-अलग विषय पर थीं. कराची के विषय पर फ़िल्में बनी. युद्ध पर फ़िल्में बनीं. ऐसे में आपको पाकिस्तान का सिनेमा कहाँ नज़र आता है?

मुझे लगता है पाकिस्तान का सिनेमा बहुत ही अच्छे मोड़ पर है. पूरी दुनिया में पाकिस्तान को लेकर बहुत दिलचस्पी है. लोग जानना चाहते हैं कि वहाँ क्या हो रहा है. मुझे 'बोल' बहुत पसंद आई. लेकिन इसके बाद भी यहाँ अभी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.

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