बदले-बदले से भूत नज़र आते हैं

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'वीराना', 'दो गज़ ज़मीन के नीचे', और 'तहख़ाना' कुछ ऐसी हॉरर फ़िल्में हैं जिनका नाम सुनकर आज भी लोगों को डर लगता है.

इन फ़िल्मों के भूत शायद अब भी आपको रात में बत्ती जलाकर सोने पर मजबूर कर सकते हैं. एक ज़माना था जब भूतिया फ़िल्म देखने से पहले ही डर का माहौल बन जाया करता था.

सफ़ेद लिबास में लिपटा, मोमबत्ती हाथ में लिए इधर से उधर घूमता भूत, डर पैदा करता संगीत और चीख़ें डराने के लिए काफ़ी थीं.

मुँह से टपकता ख़ून, सफ़ेद आँखें, 360 डिग्री पर घूमता हुआ सिर और भयानक चेहरे वाले भूत हॉरर फ़िल्मों में आम थे.

लेकिन अब वो तरीक़े कारगर नहीं रह गए हैं. इस बात का सुबूत हैं वो फ़िल्में जिनमें भूत तो हैं लेकिन डराने के लिए नहीं, हंसाने के लिए.

पिछले कुछ सालों में ऐसी फ़िल्में आ रही हैं जिनमें भूतों का कुछ बदला हुआ रूप नज़र आ रहा है.

बदल गए भूत

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मगर 21वीं सदी में भूतिया फ़िल्मों का नज़ारा बदल चुका है. हॉरर फ़िल्मों ने अब एक नई राह पकड़ ली है और इन्हें नया नाम दिया गया है “घोस्ट कॉमेडी”.

इस सूची में कुछ नाम हैं “भूल भुलैया”, “भूतनाथ” और “भूतनाथ रिटर्न्स”. और अब इस कड़ी में फ़िल्म “गैंग ऑफ़ घोस्ट्स” भी जुड़ गई है.“गैंग ऑफ़ घोस्ट्स” के निर्देशक सतीश कौशिक ने दावा किया है कि ये भारत की पहली घोस्ट कॉमेडी है.

उनका कहना है कि, इस फ़िल्म में 10-11 भूत हैं, और इससे पहले इतने सारे भूत किसी एक हिन्दी फ़िल्म में कभी नहीं आए हैं. इस फ़िल्म में भूतों की दुनिया काफ़ी असली है और ये भूत समुद्र के किनारे पार्टी करने भी जाते हैं.

निर्माता-निर्देशक विक्रम भट्ट ने राज़, 1920 और हॉरर स्टोरी जैसी फ़िल्में बनाकर भूतों का आधुनिकीकरण किया है. विक्रम भट्ट के मुताबिक लोग हँसना पसंद करते हैं, रोना पसंद करते हैं लेकिन लोग थोड़ा बहुत डरना भी पसंद करते हैं.

उनका कहना है कि दर्शकों के लिए हॉरर फ़िल्म एक“अम्यूज़मेंट पार्क” की तरह है और लोगों को डरने में मज़ा आता है. विक्रम भट्ट इस बात को मानते हैं कि जो डरना चाहेगा वो हॉरर फ़िल्म देखने ज़रूर जाएगा.

राम गोपल वर्मा के निर्देशन में बनी फ़िल्म फूंक में मधु का किरदार निभाने वाली नायिका अश्विनी कल्सेकर का कहना है कि घोस्ट कॉमेडी हॉरर नहीं एक “फैमिली ड्रामा” है.

अश्विनी को लगता है कि ''अगर भूतनाथ जैसी फ़िल्में घोस्ट कॉमेडी हैं तो रागिनी एमएमएस एक रूमानी हॉरर है. उन्हें ख़ुद हॉरर फ़िल्मों से डर लगता है और अश्विनी मानती हैं कि इतना पैसा खर्च करके फ़िल्म देखने जाने का मक्सद दिमाग को आराम देना होता है डरना नहीं.''

कहां गए वो भूत

सोचने वाली बात ये है कि अब डराने वाले भूतों का क्या होगा. क्या लोग अब भी इन्हें देखना चाहते हैं. 80 और 90 के दशक में भूतिया फ़िल्में बनाने में रामसे ब्रदर्स का बोल बाला था.

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इन्होंने होटल, पुराना मंदिर, बंद दरवाज़ा जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया था. इस निर्माता-निर्देशक जोड़ी के श्याम रामसे का कहना है कि भूतिया फ़िल्में युवा पीढ़ी को सबसे ज़्यादा पसंद आती हैं.

उनका कहना है कि ,''पुरानी हॉरर फ़िल्मों में भूतों का जैसा मेक-अप किया जाता था अब वो लोगों को नकली लगता है. श्याम रामसे कहते हैं कि हॉरर फ़िल्मों का भूत अब काफ़ी बदल गया है और उसे आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके बनाया जाता है. मेक-अप करके भूत बनाने का चलन अब लगभग ख़त्म हो चुका है.''

श्याम रामसे मानते हैं कि ''फ़िल्म के हर रूप की अपनी ख़ूबसूरती है और जो लोग ज़्यादा डराने वाली फ़िल्में नहीं देख सकते,वो हंसाने वाली भूतों को देखने जाते हैं. दर्शक हॉरर के भी हैं और हॉरर कॉमे़डी के भी.''

बॉलीवुड के भूत अब अपना डराने का काम छोड़कर हँसाने लगे हैं तो कॉमेडी फ़िल्में और कॉमेडियन्स का क्या होगा. अभी तक नहीं सोचा था तो अब सोचना शुरू कर दो.

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