जिसने रची 2013 की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म

शिप ऑफ़ थीसस का एक दृश्य इमेज कॉपीरइट ship of thseus

“सदियों पुराना एक जहाज़ जिसे एक देश से दूसरे देश लाया गया. कुछ समय बीतने पर उस जहाज़ के कुछ हिस्से गलने लगे तो उन्हें बदल दिया गया. धीरे धीरे उस जहाज़ के सभी हिस्सों को बदलना पड़ा लेकिन लोग उसे आज भी उसी पुराने नाम से पहचानते थे, लेकिन क्या वो वही जहाज़ रहा ? ”

यही फ़लसफ़ा है ग्रीक़ दार्शनिक प्लूटार्क के दर्शन ‘शिप ऑफ़ थीसिस’ का जो मनुष्य के जीवन और इसे जीने के तरीके पर ही सवाल बन जाता है.

हम कौन हैं? इसी दर्शन के इर्द गिर्द बुनी गई फ़िल्म है ‘शिप ऑफ़ थीसिस’ जिसे 61वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में साल 2013 की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुना गया है.

फ़िल्म के निर्देशक आनंद गांधी की ये पहली फ़ीचर फ़िल्म है और अपने दोस्तों खुशबू रांका, पंकज कुमार के साथ मिल कर उन्होंने ही इसे लिखा भी है.

बीबीसी से हुई एक ख़ास बातचीत में उन्होने इस फ़िल्म से जुड़े कई पहलुओं पर बात की.

चेहरे पर न जाना

आनंद से बात करने से पहले उनके बारे में जान लेना मुझे ठीक लगा तो मैंने उनके बारे में जानकारी ढूढ़नी शुरू की.

मुझे मालूम था कि जिस शख़्स से हम बात करने वाले हैं वो बड़ी गहरी, गंभीर सोच रखता है, दर्शन में भरोसा रखता है, जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझना चाहता है. लेकिन यक़ीन मानिए जब मैनें आनंद की तस्वीर देखी तो लगा कि ये ऐसा नहीं हो सकते.

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बढ़े हुए बाल, बेतरतीब बिखरे हुए से और उस पर बढ़ी हुई दाढी - ये तो कोई आम लड़का है जो कॉलेज जाता होगा, थोड़ा बहुत सुरा–बेसुरा गिटार बजाता होगा , इंगलिश नॉवल पढ़ता होगा और लाइफ़ को लेकर कन्फ़यूज़ होगा. लेकिन हैरानी की बात ये है कि यही वो लड़का है जिसने जिंदगी के सुलझे–अनसुलझे सवालों को बड़ी खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है और वो फ़िल्म बनाई है जिसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला है.

लेकिन जब बातचीत शुरु हुई तो मालूम चला कि इस बेतरतीब सी वेषभूषा के पीछे कहीं एक दार्शनिक छिपा बैठा है

अपनी ज़िंदगी से सीखा

जिंदगी क्या है? हमारा अस्तित्व क्या है? आंनद ने यूं तो ऐसे गूढ़ दर्शन को लेकर फ़िल्म बनाई लेकिन दर्शन की बात करने में वो थोड़ा झिझक जाते हैं. वो एक लेखक रहे हैं और जितना बेहतरीन तरीके से वो अपनी बात को लिख पाते हैं उसी बात को ज़ुबानी समझाने में उन्हें थोड़ी तकलीफ़ पेश आती है.

लेकिन कुछ देर बात करने के बाद वो सहज हुए और फिर उन्होंने बताया कि इस फ़िल्म की प्रेरणा कैसे आई, “मैं मेरी नानी के इलाज के लिए हॉस्पिटल में था. वो काफ़ी तकलीफ़ में थी और डॉक्टर जवाब दे चुके थे. मेरी हालत उस डूबती नाव पर सवार उस साधु के जैसी थी जिसने वेद पढ़े थे लेकिन तैरना नहीं सीखा था. सारी दुनिया की दवाएं उन्हें ठीक नहीं कर सकती थी और तब जीवन और मृत्यु के इस खेल को मैंने समझना शुरू किया.”

जीवन को लेकर अपनी समझ को अभी आनंद और बढ़ाना चाहते हैं. वो कहते हैं,”शिप ऑफ़ थीसिस मेरे प्रयासों कि एक छोटी सी कड़ी है जिसके आगे अभी बहुत सफ़र बाकी है.” लेकिन ये सफ़र आसान नहीं है ऐसा मानना है आनंद का. आनंद संसाधनों की कमी की शिकायत भी करते है.

किरण राव से मिली मदद

Image caption फ़िल्म शिप ऑफ़ थीसस के भारत में वितरण में किरण राव ने आनंद गांधी की काफी मदद की

राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिल गया लेकिन इससे ज़्यादा जरूरी होता है फ़िल्म को बनाना और आज भी हमारे यहां फ़िल्म मेकर्स को इतने संसाधन नहीं मिल पाते कि वो अपनी फ़िल्म को बना सकें या उसे वितरित कर सकें.

आनंद कहते हैं, “भारत में फ़िल्म रिलीज़ करने के लिए हम वितरक ढूंढ रहे थे और फ़िल्म से कोई बड़ा नाम न जुड़ा होने के कारण ये मुश्किल था."

वो बताते हैं, "आज भी कुछ ही लोगों के हाथ में है कि वो अपनी फ़िल्म बना कर तुरंत रिलीज़ कर लें. ऐसे में किरण (राव) ने हमारी फ़िल्म को भारत में पेश किया. वो हमारा चेहरा थीं. जिनके बिना इतने बड़े स्तर पर रिलीज़ मुश्किल थी”

कभी किसी जमाने में ‘कहानी घर घर की’ और ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ सरीखे टेलीविज़न शोज़ के लिए संवाद लिखने वाले आनंद अब अर्थपूर्ण कला को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

टीवी पर वापसी पर वो बोले, “मैं ‘शिप ऑफ़ थीसिस’ से शुरू हुए संवाद को जारी रखना चाहता हूं. टीवी के माध्यम के लिए भी कुछ जरूर करूंगा पर कुछ वक़्त बाद.”

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