फ़िल्म रिव्यूः देख तमाशा देख

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स्टार रेटिंग: *1/2

बॉक्स ऑफ़िस रेटिंग: 1/2

"देख तमाशा देख (ए)" भारत के सामाजिक-राजनीतिक चरित्र पर एक तंज है. यह एक राजनेता के विशाल कटआउट के वज़न तले दबकर मर गए एक ग़रीब आदमी की धार्मिक पहचान ढूंढने के इर्द-गिर्द घूमती है.

एक ग़रीब आदमी राजनेता मुथा सेठ (सतीश कौशिक) के विशाल कटआउट के नीचे दबकर मारा जाता है. कुछ मुसलमान उसके शव को दफ़नाने लगते हैं तो हिंदुओं का एक समूह आकर इस पर आपत्ति करता है और शव को उन्हें सौंप देने की मांग करता है.

मुसलमान कहते हैं मृतक मुस्लिम था तो हिंदू दावा करते हैं कि वह उनमें से एक था. मामला पुलिस और फिर अदालत तक पहुंच जाता है. इस दौरान शव मुर्दाघर में रखा रहता है और मृतक के भाई लक्ष्मण (हृदयनाथ राणे) को भी नहीं सौंपा जाता.

कहानी

इस विवाद और क़ानूनी ड्रामे में राजनेताओं के शामिल होने से मामला भड़क जाता है और सांप्रदायिक दंगे भी शुरू हो जाते हैं. अदालत शव को मृतक के भाई लक्ष्मण को सौंपने का आदेश देती है.

उधर मृतक की बीवी फ़ातिमा (तन्वी आज़मी) नहीं चाहती कि यह विवाद आगे बढ़े और उसे न तो शव के दाह संस्कार को लेकर कोई आपत्ति है न ही दफ़नाए जाने को लेकर.

एक स्थानीय अख़बार दुर्घटना से हुई इस मौत से जुड़ी अफ़वाहों की रस लेकर रिपोर्टिंग करता रहता है जबकि नेता इस दुर्भाग्यजनक विवाद का फ़ायदा उठाते हैं. अंततः होता क्या है?

शफ़त ख़ान की कहानी देश के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य पर व्यंग्य है और अपनी प्रवृत्ति के कारण बहुत व्यावसायिक नहीं है.

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Image caption सतीश कौशिक फ़िल्म में एक राजनेता के किरदार में हैं

उन्होंने एक ऐसा स्क्रीनप्ले लिखा है जो एक ख़ास तबक़े को ही पसंद आएगा और दर्शकों के बड़े वर्ग को बोरिंग और बेमतलब लगेगा.

चूंकि पूरी कहानी एक मृत शरीर के इर्द-गिर्द घूमती है इसलिए पारंपरिक मनोरंजन चाहने वाले जल्द ही फ़िल्म से उकता जाएंगे. मनोरंजन के नाम पर फ़िल्म में सिर्फ़ व्यंग्य है और यह सिर्फ़ एक विशिष्ट वर्ग को ही समझ आएगा.

शायद फ़िल्म का सबसे मनोरंजक भाग कोर्टरूम ड्रामा है जो कुछ ही मिनट चलता है. शफ़त ख़ान के डायलॉग विषय के अनुरूप हैं और फ़िल्म के मूड के साथ ठीक रहते हैं.

अभिनय

सतीश कौशिक ने बढ़िया ढंग से अवसरवादी राजनेता की भूमिका निभाई है. तन्वी आज़मी मृतक की विधवा के रूप में ठीक हैं. विनय जैन पुलिस अधिकारी विश्वासराव के रूप में जमे हैं. पुलिस इंस्पेक्टर सावंत के रूप में गणेश यादव सहज हैं.

हिंदू नेता बांडेकर के रोल में शरद पोंक्शे बढ़िया हैं. प्रोफ़ेसर शास्त्री के रूप में सतीश अलेकर प्रभावशाली हैं. शब्बो के रूप में अपूर्वा अरोड़ा और प्रशांत के रूप में आलोक राजवाड़े अपनी छाप छोड़ जाते हैं. मौलाना बने सुधीर पांडे का असर महसूस होता है.

फ़िरोज़ अब्बास ख़ान का निर्देशन संवेदनशील है लेकिन स्क्रिप्ट की तरह एक ख़ास दर्शक वर्ग को ही पसंद आएगी. हेमंत चतुर्वेदी की सिनेमेटोग्राफ़ी अच्छी है. कौशल-मोज़ेज़ के एक्शन सीन ठीक बने हैं. खली का सेट असली सा है. स्रीकर प्रसाद की एडिटिंग अच्छी है.

कुल मिलाकर 'देख तमाशा देख' एक व्यंग्य है जिसमें व्यावसायिक तड़का नहीं है.

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