फ़िल्म रिव्यू: 'कांची' का जादू चला या नहीं

  • 26 अप्रैल 2014
'कांची'

रेटिंग: **

मुक्ता आर्ट्स की 'कांची' कहानी है एक ख़ूबसूरत लड़की 'कांची' की जो उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में रहती है.

वो एक तेज तर्रार लेकिन दिल की सच्ची है और गांव के ही एक लड़के बिंदा से प्यार करती है.

(रिव्यू : 'टू स्टेट्स')

श्याम ककड़ा (मिथुन चक्रवर्ती) और झूमर ककड़ा (ऋषि कपूर) राजनेता हैं जो मुंबई में रहते हैं. उनकी नज़र कांची के गांव पर पड़ती है. वो वहां औद्योगिकरण करना चाहते हैं और इसके लिए वो उस गांव के निवासियों को वहां से विस्थापित करना चाहते हैं.

श्याम ककड़ा अपने बेटे सुशांत (ऋषभ सिन्हा) को इसके लिए गांव भेजता है. ऋषभ, कांची से दोस्ती कर लेता है. वो कांची से प्यार करने लगता है और उससे शादी करना चाहता है.

लेकिन कांची को जब ये पता लगता है तो वो उससे दूर चली जाती है. जल्द ही कांची और बिंदा की शादी तय हो जाती है.

लेकिन सुशांत, बिंदा की हत्या कर देता है ताकि वो ख़ुद कांची को पा सके. उसके धनवान होने की वजह से पुलिस भी उससे मिल जाती है और बिंदा के हत्या के केस की फ़ाइल बंद कर दी जाती है.

(रिव्यू : 'देख तमाशा देख')

लेकिन कांची, बिंदा के हत्यारों को किसी क़ीमत पर नहीं छोड़ना चाहती.

वो ककड़ा परिवार से बदला लेने के लिए मुंबई रवाना हो जाती है.

वो मुंबई में सिर्फ़ एक ही शख़्स को जानती है जिसका नाम है बगुला (चंदन रॉय सान्याल). बगुला उसी के गांव का रहने वाला होता है और एक पुलिस अफ़सर होता है. लेकिन वो भी ककड़ा परिवार का एक तरह से ग़ुलाम होता है.

आगे क्या होता है. क्या कांची अपने मक़सद में कामयाब होती है. बदला लेने के लिए उसे क्या करना पड़ता है. यही फ़िल्म की कहानी है.

कहानी में नयापन नहीं

सुभाष घई की इस कहानी में कुछ नयापन नहीं है. उन्होंने वही पुराना फॉर्मूला इस्तेमाल किया है जिसमें धनी और ताकतवर लोग एक कमज़ोर लड़की को सताते हैं.

(रिव्यू : 'मैं तेरा हीरो')

स्क्रीनप्ले में भी कुछ मौलिक नहीं है लेकिन हां किरदारों का चरित्र चित्रण थोड़ा अलग तरीके से किया गया है.

कांची और बिंदा की प्रेम कहानी प्यारी है और लोगों को वो पसंद आएगी. इस वजह से दर्शक कांची के किरदार से जुड़ाव महसूस करते हैं और चाहते हैं कि वो ककड़ा परिवार से बदला लेने में कामयाब हो.

कई जगह ड्रामा बोझिल सा लगता है लेकिन कुल मिलाकर कहानी में गति बनी रहती है.

कुछ असरदार दृश्य

फ़िल्म के कुछ दृश्य बड़े असरदार हैं. जैसे बिंदा की हत्या वाला सीन और कांची का गुस्से में अपने परिवार को छोड़कर मुंबई आने वाला सीन.

(रिव्यू : 'भूतनाथ रिटर्न्स')

साथ ही वो दृश्य जिसमें ककड़ा परिवार के गुंडे कांची का पीछा करते है.

सुभाष घई के लिखे संवाद सरल हैं लेकिन युवाओं को अपील करेंगे.

अभिनय

कांची के किरदार में मिश्टी ने बॉलीवुड करियर की शानदार शुरुआत की है. वो बहुत ख़ूबसूरत लगी हैं, कैमरे के सामने आत्मविश्वास से भरी हुई लगती हैं और अभिनय भी अच्छा किया है.

छोटे से रोल में कार्तिक आर्यन भी अच्छे हैं. सुशांत के किरदार को ऋषभ सिन्हा ने प्रभावी तरीके से निभाया है.

(रिव्यू : 'ओ तेरी')

ऋषि कपूर अपने रोल में जमे हैं. ख़ासतौर से इंटरवल के बाद वाले उनके कुछ सींस कमाल के हैं. मिथुन चक्रवर्ती ने भी अपने रोल में अपनी छाप छोड़ी है. बाकी कलाकार भी अच्छे हैं.

निर्देशन

सुभाष घई का निर्देशन ठीक है. कई जगह फ़िल्म दिलचस्प बन पड़ी है.

हालांकि फ़िल्म का कोई भी गाना चार्टबस्टर नहीं बन पाया है, जो कि फ़िल्म की एक बड़ी कमी है क्योंकि सुभाष घई की फ़िल्में बेहतरीन संगीत के लिए जानी जाती हैं.

(रिव्यू : 'यंगिस्तान')

फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी बेहतरीन है. सुधीर के चौधरी ने नैनीताल और उत्तराखंड की ख़ूबसूरती को शानदार तरीके से कैमरे में क़ैद किया है.

कुल मिलाकर 'कांची' एक ठीक-ठाक फ़िल्म है लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर इसे बड़ा धीमा स्टार्ट मिला है जिसके आगे ठीक होने की कोई संभावना नहीं दिखती क्योंकि फ़िल्म में ना तो कोई बड़ा स्टार है, ना ही फ़िल्म के गानों में दम है और ना ही फ़िल्म की कहानी मौलिक है.

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