फ़िल्म रिव्यू: 'क्या दिल्ली क्या लाहौर'

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रेटिंग: *

गुलज़ार, वेव सिनेमा, पिक्चर ऑर्ट्स और हाई ग्राऊंड एंटरटेनमेंट की फ़िल्म 'क्या दिल्ली क्या लाहौर' कहानी है एक भारतीय सैनिक और एक पाकिस्तानी सैनिक की जिनकी शुरुआती दुश्मनी बाद में दोस्ती में तब्दील हो जाती है.

(रिव्यू:'कांची')

रहमत अली (विजय राज़) एक पाकिस्तानी सैनिक है. जो भारत-पाकिस्तान युद्ध संघर्ष के बाद ज़िंदा बच जाता है. इस लड़ाई में दोनों ओर से कई सैनिक मारे जाते हैं.

रहमत अली को उसका कैप्टन (विश्वजीत प्रधान) आदेश देता है कि वो चुपके से भारतीय सेना के दफ़्तर जाकर एक फ़ाइल हासिल करे जिसमें भारत से पाकिस्तान तक की एक गुप्त सुरंग का ब्यौरा है.

(रिव्यू:'रिवॉल्वर रानी')

रहमत अपने कैप्टन का आदेश मानकर ऐसा ही करता है.

भारतीय सेना के दफ़्तर में उसकी मुलाक़ात होती है समर्थ प्रताप शास्त्री (मनु ऋषि) से जो वहां पर बावर्ची है. शास्त्री के पूर्वज पाकिस्तान में रहते थे.

दोनों एक दूसरे को मारने की कोशिश करते हैं लेकिन बाद में शास्त्री एक घड़ी और कुछ क़ीमती तोहफ़ों के एवज़ में रहमत को वो फ़ाइल देने के लिए तैयार हो जाता है.

दोनों फ़ाइल लेकर पाकिस्तान की ओर रवाना हो जाते हैं. इसके आगे क्या होता है ? दोनों को किस तरह की मुश्किलें पेश आती हैं ?

समर्थ और रहमत की दोस्ती क्या फिर से दुश्मनी में बदल जाती है ? यही फ़िल्म की कहानी है.

कहानी

असीम अरोरा की कहानी काफ़ी अलग है. हालांकि उन्होंने कहानी के ज़रिए ये संदेश देने की कोशिश की है कि चाहे सैनिक चाहे भारत के हों या पाकिस्तान के, इंसान ही हैं और उनकी भावनाएं भी एक जैसी ही होती हैं लेकिन फ़िल्म लोगों के दिलों तक नहीं पहुंच पाती.

(रिव्यू:'मैं तेरा हीरो')

फ़िल्म के स्क्रीनप्ले में भी शुरुआत की कुछ रील के बाद दोहराव साफ़ नज़र आने लगता है.

पूरी फ़िल्म, एक फ़िल्म ना होकर स्टेज ड्रामा नज़र आती है. फ़िल्म में चंद किरदार ही हैं इसलिए एक सीमा के बाद बोरियत होने लगती है.

फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ामी यही है कि ये दर्शकों के दिलों तक ही नहीं पहुंच पाती. फ़िल्म के संवाद दमदार नहीं है जिसकी वजह से वो असर नहीं छोड़ पाते.

अभिनय

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Image caption 'क्या दिल्ली क्या लाहौर', अपना असर नहीं छोड़ पाई है.

विजय राज़ ने रहमत अली के रोल को ज़बरदस्त तरीक़े से निभाया है. मनु ऋषि भी अपने रोल में जमे हैं.

(रिव्यू:'टू स्टेट्स')

राज जुत्शी और विश्वजीत प्रधान भी अपने रोल में ठीक रहे हैं. लेकिन सिर्फ़ इतना काफ़ी नहीं है दर्शकों को फ़िल्म से बांधे रखने के लिए.

विजय राज़ का निर्देशन फ़िल्म के बजाय ड्रामा सरीखा है.

संदेश शांडिल्य के संगीत में लोकप्रिय होने की गुंजाइश ही नहीं है. हां उनका बैकग्राउंड म्यूज़िक ठीक है.

कुल मिलाकर 'क्या दिल्ली क्या लाहौर' अपना असर छोड़ने में विफल रही है.

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