श्रीराम: बाल सुधार गृह से नेशनल अवॉर्ड तक

द लॉस्ट बहरूपिया, 61वां राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार इमेज कॉपीरइट Holybull Entertainment
Image caption फ़िल्म 'द लॉस्ट बहुरूपिया' में मुख्य भूमिका अभिनेता अशराफ़-उल हक़ ने निभाई है

श्रीराम डाल्टन को मात्र साढ़े चौदह साल की उम्र में 'बलात्कार के प्रयास' के लिए छह महीने के लिए बाल सुधार गृह में रहना पड़ा था. उस घटना ने उनकी ज़िंदगी को उस राह पर डाल दिया जिस पर चलकर उन्होंने बीते शनिवार को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से राष्ट्रीय पुरस्कार लिया.

श्रीराम को ये पुरस्कार अपनी शॉर्ट फ़िल्म 'द लॉस्ट बहुरूपिया' के लिए सर्वश्रेष्ठ कला/संस्कृति श्रेणी में दिया गया है.

आज श्रीराम को लगता है कि अगर 'सिस्टम' को समझना है तो 'जेल' ज़रूर जाना चाहिए.

श्रीराम की फ़िल्म 'द लॉस्ट बहुरूपिया' एक बहुरूपिया कलाकार की कहानी है. यह फ़िल्म विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुकी बहुरूपिया कला और उसके बचे-खुचे कलाकारों की कहानी कहती है.

फ़िल्म के बारे में श्रीराम बताते हैं, "यह एक ऐसे बहुरूपिया कलाकार की कहानी है जो बारह तरह के रूप बनाने में माहिर है. और इन्हीं बहुरूपों के सहारे ही अपनी जीविका चलाना चाहता है. इस कलाकार की जो परिणति होती है, वही फ़िल्म की कहानी है."

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'एक भोगता है, एक देखता है'

फ़िल्म की कहानी के बाद मैंने श्रीराम की असल ज़िंदगी की कहानी जाननी चाही. श्रीराम ने अपनी कहानी बताई तो लेकिन उसमें दुख या भावुकता का कोई पुट नहीं था.

साढ़े चौदह साल के उस किशोर पर क्या गुज़री होगी यह तो अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है लेकिन आज श्रीराम में एक दृष्टा भाव ज़्यादा प्रबल है.

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Image caption फ़िल्मकार श्रीराम डाल्टन झारखंड के डाल्टनगंज के रहने वाले हैं.

उस घटना जिसकी वजह से उन्हें बाल सुधार गृह जाना पड़ा था, उसके बारे में पूछने पर वो कहते हैं, "सोसाइटी का एक ऐसा स्ट्रक्चर बन चुका है कि आपको प्रेम करने से रोके जाने के तमाम उपकरण, तमाम नियम, तथाकथित कल्चर जैसी बहुत सी चीज़ों को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि बचपन से आपको बताया जाता है कि आपको प्रेम से दूर रहना है."

वे कहते हैं, "बचपन से आपको बताया जाता है कि आपको लड़कियों से दूर रहना है. चौदह साल की उम्र में आप प्रेम कर रहे हैं. लड़की की लगभग वही उम्र है. आप दोनों में एक क्यूरियोसिटी है."

वे आगे कहते हैं, "आप उसे टच करना चाहते हैं, वो आपको टच करना चाहती है. आप एक-दूसरे को स्पर्श करें तभी माँ आकर हंगामा कर दे. यह हंगामा चर्चाएं आम हो जाए. फिर आप सोसाइटी की आटा चक्की में फंस जाते हैं और उस चक्की से आप एक 'प्रॉडक्ट' बनकर निकलते हैं. तो मैं इस समाज का चलता फिरता 'प्रॉडक्ट' हूँ."

अपने ही शहर में, तमाशा बन जाना

यह तो बहुत बौद्धिक किस्म का जवाब हो गया. हमने थोड़ा कुरेदा कि आख़िर उस किशोर को कैसा लगा था, तो श्रीराम ने ज़्यादा न खुलते हुए भी इशारों में ही अपनी बात कह दी.

वो कहते हैं, "जिस शहर में आपका बचपन बीता हो उसी शहर में पुलिस वाले 25 फीट लंबी रस्सी में बाँधकर आपको चौराहे-चौराहे घुमा रहे हैं...आख़िरकार एक चौदह साल के लड़के के साथ ये क्या किया जा रहा था? आख़िर आप उसे क्या बनाना चाहते थे?"

श्रीराम को जिस बाल सुधार गृह में रखा गया वो वयस्कों की जेल के ही एक हिस्से में स्थित था. वहाँ हुए अनुभवों के बारे में वो बड़े ही मुख़्तसर ढंग से कहते हैं, "मैंने देख लिया कि सिस्टम कैसी बेवकूफ़ी करता है. मैंने 'जेल' में हर तरह के कैरेक्टर देखे, अपने से कम उम्र के, अपने से ज़्यादा उम्र के बहुत तरह के लोगों से मिला. वहाँ मैंने समझा कि क्राइम क्या है, सिस्टम क्या है. ऐसी ही बहुत सी दूसरी बातें मैंने वहीं समझीं."

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Image caption भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से राष्ट्रीय पुरस्कार लेते हुए श्रीराम डाल्टन

बाल सुधार गृह से बाहर की दुनिया को श्रीराम 'दूसरी जेल' कहते हैं.

बाल सुधार गृह से बाहर आने के बाद के अनुभव के बारे में वो कहते हैं, "बाहर आने के बाद मैं हर जगह से बाहर कर दिया गया था. मैं समाज के हाशिए पर पहुँचा दिया गया था. लेकिन हाशिए पर कर दिए जाने से आप के अंदर एक दृष्टिकोण पैदा होता है. मैं एक 'जेल' से निकलकर 'दूसरी जेल' में आ गया था. मेरे लिए यह एक नए जन्म जैसा था."

कला की राह पर

बाल सुधार गृह से निकलने के बाद श्रीराम को पनाह मिली कला की दुनिया में. और कला की राह उन्हें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के फ़ाइन आर्ट्स विभाग तक ले आई. फ़ाइन आर्ट की पढ़ाई करते-करते ही उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी से प्यार हो गया.

अपने इस प्रेम के बारे में वो कहते हैं, "मैंने फ़ोटोग्राफ़ी सीख ली. देश में घूम-घूम कर फ़ोटो खींचने लगा. बड़े स्टूडियो में एक प्रदर्शनी की लेकिन उसके बाद ही समझ में आ गया कि गैलरी-वैलरी मेरे लिए नहीं है."

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वे कहते हैं, "मैं सड़कों पर, घाटों पर, फुटपाथ पर, जंगलों में, रेलवे स्टेशनों पर अपने खींचे फ़ोटो बेचने लगा." वो बताते हैं कि साल 2000 के आसपास वो 15 अगस्त और 26 जनवरी को दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अपने खींचे फ़ोटो बेच चुके हैं.

वो कहते हैं, "उस दौरान दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था का उतना मसला नहीं था."

लेकिन क्या सड़क किनारे फ़ोटो की दुकान लगाने पर उनकी तस्वीरें बिकती थीं. श्रीराम कहते हैं, "मेरी तस्वीरें ठीकठाक दामों में बिक जाती थीं. उससे जो पैसे मिल जाते थे उसी से मेरा ख़र्च निकलता था."

मुंबई का सफ़र

श्रीराम के फ़ोटोग्राफ़ी से अचानक फ़िल्म की तरफ़ मुड़ने की कहानी भी थोड़ी फ़िल्मी है. उनके किसी दोस्त ने कहा कि तुम फ़ाइन आर्ट्स के आदमी हो तो तुम्हें 'मोक्ष' फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए. इस फ़िल्म का निर्देशन किया था मशहूर सिनेमैटोग्राफर अशोक मेहता ने. फ़िल्म ने श्रीराम पर जादुई असर किया. उन्होंने फ़िल्म देखते ही तय कर लिया कि उन्हें सिनेमैटोग्राफ़र बनना है और इसके लिए अशोक मेहता को अपना गुरु बनाना है.

श्रीराम बताते हैं, "अशोक मेहता लिजेंड्री सिनेमैटोग्राफ़र हैं इसलिए दो साल लगातार स्ट्रगल करने के बाद मुझे उनका सहायक बनने का मौका मिला."

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Image caption इस फ़िल्म को बनाने में श्रीराम और उनके साथियों को तक़रीबन तीन साल लग गए.

फिर उन्होंने कई फ़िल्मों में अशोक मेहता के सहायक के रूप में काम किया. लेकिन धीरे-धीरे वो इस काम से भी असंतुष्ट रहने लगे.

वो कहते हैं, "मैंने अशोक मेहता के साथ कुछ बड़ी फ़िल्में कीं लेकिन मैं उससे भी हताश होने लगा. क्योंकि सिनेमैटोग्राफ़र के रूप में फ़िल्म पर आपका कोई ज़्यादा नियंत्रण नहीं होता. कैमरामैन के रूप में स्वतंत्र रूप से काम करने के मौके सामने आए लेकिन मैं तय कर चुका था कि मुझे सिनेमैटोग्राफ़र नहीं निर्देशक बनना है"

बॉलीवुड में शॉर्ट फ़िल्म

फ़िल्म निर्देशक बनने का ख़्वाब पालना एक बात है और उसे पूरा करना दूसरी बात. श्रीराम ने निर्देशन की शुरुआत शॉर्ट फ़िल्में बनाने से की.

इस शुरुआत के आरंभिक दौर के बारे में वो कहते हैं, "बिहार के निर्देशक मनीष झा को साल 2002 में कांस में बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म का अवार्ड मिला था. इस फ़िल्म ने इंडस्ट्री में शॉर्ट फ़िल्म को लेकर लोगों का नज़रिया बदल दिया."

वे कहते हैं, "यह वही समय था जब हम लोग शॉर्ट फ़िल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे. मैंने एक कहानी सोची और उसपर शॉर्ट फ़िल्म बनाने का प्लान किया. संगीतकार विजय वर्मा की मदद से फ़िल्म शुरू हुई. आज स्टार बन चुके नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी उस समय ज़्यादा समझे-बूझे बिना मुख्य भूमिका निभाने को तैयार हो गए."

वह फ़िल्म थी, 'ओपी स्टॉप स्मेलिंग योर सॉक्स.' इस फ़िल्म को यूट्यूब पर 80 हज़ार से ज़्यादा बार देखा जा चुका है.

जापानी निर्देशक अकीरा कुरुसावा को अपना पसंदीदा फ़िल्मकार मानने वाले श्रीराम शॉर्ट फ़िल्मों के बारे में कहते हैं, "किसी फ़िल्म को उसकी लंबाई की बजाय उसके मेकिंग और कंटेट के लिहाज़ से देखा जाना चाहिए. आज शॉर्ट फ़िल्म की पूरी दुनिया में अपनी जगह है."

श्रीराम भारतीय निर्देशकों में शेखर कपूर के बड़े प्रशंसक हैं. वो शेखर कपूर की फ़िल्म 'बैंडिट क्वीन' को भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर मानते हैं.

बहुरूपियों का भविष्य

श्रीराम बताते हैं कि 'द लॉस्ट बहुरूपिया' का मूल विचार उनके मित्र रुपेश सहाय का था. वो ये याद दिलाना नहीं भूलते कि इस फ़िल्म को बनाने में रूपेश सहाय का हर पहलू में बराबर योगदान है.

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इस फ़िल्म को पूरा करने में लगभग तीन साल लगे. बहुरूपिया कलाकारों की कला और जीवन को तीन साल देने के वाले श्रीराम से जब हमने इस कला के भविष्य के बारे में पूछा तो उनका जवाब किसी दार्शनिक सरीखा था. उन्होंने कहा, "ख़त्म हो जाना प्रकृति का नियम है. जो कला या संस्कृति अपनी रक्षा नहीं कर पा रही है उसका मतलब है कि उसमें बदलाव की ज़रूरत है. चाहे वो फॉर्म के स्तर पर हो या कंटेट के स्तर पर, किसी तरह के बदलाव की ज़रूरत है."

वो कहते हैं, "मेरे ख़्याल में यह कला अभी ही विलुप्तप्राय की श्रेणी में जा चुकी है. हमारी पीढ़ी शायद वो आख़िरी पीढ़ी है जिसने बहुरूपिये को देखा होगा."

विनोद कुमार शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी और रूसी लेखक फ़्योदोर दोस्तेव्येस्की के मुरीद श्रीराम से जब हमने उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा तो उनका जवाब बड़ा ही तटस्थ सा था.

वो कहते हैं, "मैंने कोर्स की पढ़ाई तो नहीं की है लेकिन ज़िंदगी की पढ़ाई पढ़ी है. ज़िंदगी को जैसा मैंने देखा है उसी को दिखाना है और उसी की लड़ाई चल रही है."

फ़िल्में बनाना तो ठीक है लेकिन कैसी फ़िल्में? जवाब में श्रीराम कहते हैं, "मुझे फैट फ्री फ़िल्में बनानी है. एक बार मेरे दोस्त फ़िल्मकार संजय झा मस्तान ने कहा था कि 'राम, हमें फैट फ्री फ़िल्में बनानी हैं.' मुझे उनकी बात तुरंत समझ में आ गई थी."

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