बॉलीवुड: बौना क़द, मुश्किल सफ़र...

  • 11 मई 2014

अक्सर बौने लोगों का मजाक उड़ाया जाता है. अपने क़द के चलते उनके प्रति लोगों का रवैया सामान्य नहीं रहता. बौना कद रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी मुश्किलें पैदा करता हैं.

लेकिन इन सब बातों को नज़रअंदाज़ कर कुछ जाने-माने बौने कलाकारों ने इस चमचमाती मनोरंजन की दुनिया में अपनी जगह बनाई. पर क्या है उनकी ज़िंदगी का सच, यही जानने की कोशिश में हम पहुंचे ऐसे ही कुछ कलाकारों के पास.

टीवी और फ़िल्में देखने वाले अभिनेता ‘लिलिपुट' के नाम से अंजान नहीं होंगे लेकिन उनका असली नाम एमएम फारूक़ी है. 1975 में मुंबई का रुख़ करने वाले फ़ारूक़ी का नाम किसी और ने नहीं, बल्कि खुद उन्होंने ही लिलिपुट रखा.

लिलिपुट कहते हैं, "1975 में कॉमेडी करने का काम एक्टर ने ही शुरू कर दिया था. महमूद जी का दौर खत्म हो रहा था तो उस वक़्त एक कॉमेडियन के तौर पर आना मुश्किल था. इसलिए मैंने थिएटर से अपने करियर कि शुरुआत कि मेरी ख़ुशनसीबी यही थी कि मुझे सब कुछ हाथोँ हाथ मिला."

वो बताते हैं, "कमल हसन की फिल्म सागर मैं भी काम किया. मैंने आज तक किसी से काम नही मांगा क्योंकि मेरी शक्ल और क़द देख कर कोई सोच नहीं सकता था की ये एक्टर भी हो सक्ता है."

लिलिपुट कहते हैं कि छोटे कद के लोगोँ को मज़ाक के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी कोशिश उनके साथ भी हुई जिसके चलते उन्होने कई रोल छोड़ दिए.

हालांकि लिलिपुट फिर भी यही कहते हैं, ‘‘मैं इस फ़िल्म इंडस्ट्री से खुश हूं और बहुत जल्द मैं एक फ़िल्म डायरेक्ट करने की सोच रहा हूं जो बौने लोगों की मानसिकता को उजागर करेगी.’’

कद ने दिया काम

बौने कलाकार अजय आर नवी कहते हैँ कि एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में आने से पहले वो ऑर्केस्ट्रा लाइन मैं मिमिक्री किया करता था. वो कहते हैं, "मेरे अंकल छोटू दादा खुद एक कलाकार रह चुके हैं. उन्होने मुझे इस इंडस्ट्री में काम करने का मौका दिया. सबसे पहला ब्रेक मुझे शक्तिमान सीरियल से मिला."

अजय कहते हैं, "जब मैं स्कूल में पढ़ता था तो साथ पढ़ने वाले लोग टिंगु बुलाया करते थे. मैं भगवान से हमेशा कहता था क़ि मैं दूसरे बच्चों की तरह लंबा क्यों नहीं हो पाया. लेकिन आगे चल कर मैंने ये सोचा की मेरा कद कम है उसका भी कभी ना कभी कोई फ़ायदा जरूर होगा और वो हो गया मेरे कद क़ी वज़ह से मुझे इंडस्ट्री में काम मिला. हालांकि अब टेलीविज़न पर रिस्पॉन्स बेहतर है.’’

अपना अनुभव बांटते हुए अजय कहते हैं, ‘‘शूटिंग लाइन की वजह से हमें बहुत सम्मान मिलता है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जो चार पांच बौने लोगोँ को खड़ा देख कर ये बोलते हैं की ये लोग सर्कस से आए हैं, जोकर हैं, ये सुन कर अफ़सोस होता है. पहले पहले तो मेरे साथ ऐसा हुआ करता था कि लोग मुझे आर्टिस्ट की तरह देखते ही नहीं थे. ना खाना दिया करते थे और ना ही बैठने को कुर्सी.’’

मज़ाक उड़ाते थे लोग

Image caption संजय नाडेकर अफ़सोस जताते हैं कि बौने कलाकारों को पैसे कम देते हैं.

12 साल से इंडस्ट्री में काम कर रहे संजय कहते हैं, "फ़िलहाल उनके पास बहुत काम है हालांकि वो बताते हैं कि इंडस्ट्री में आने से पहले मुझे बहुत डर लगा. जब बाहर था तो लोग हंसते थे, मज़ाक करते थे, कमेंट करते थे. एक टाइम पर तो बाहर घूमने से भी डर लगता था. लेकिन इस इंडस्ट्री में कदम रखने के बाद मैने देखा की खूबसूरत लोगोँ को ही नहीं हम जैसे लोगों को भी काम मिलता है."

लेकिन संजय ये भी कहते हैं, "दुख है तो बस एक बात का है कि हम बोने कलाकारों को नॉर्मल लोगों के मुकाबले बहुत कम पैसा दिया जाता है. लेकिन आगे चल कर यह समस्या भी दूर होगी."

बौनी महिलाओं की तरफ़ इंडस्ट्री के रुख़ से ख़ुश जूही अपने काम और ज़िंदगी से काफ़ी ख़ुश हैं. जूही कहती हैं कि ‘‘अगर कद को अलग रख कर देखा जाए तो मुझे नही लगता है कि मैं किसी भी तरह से दूसरी अभिनेत्रियों से कम हूं, मेरा अभिनय देखने वाले मुझे कहते हैं कि मैं उन अभिनेत्रियों से भी अच्छा काम कर लेती हूं.’’

Image caption जूही कहती हैं कि कद को छोड़ा जाए तो उनकी अभिनय क्षमता में कोई कमी नहीं है.

जूही कहती हैं, "शुरू-शुरू में जब मुझे लीड रोल मिला तो बहुत तारीफ़ मिली लेकिन जब शो खत्म हो गया तो बहुत कुछ झेलना पड़ा. लोग मुझसे कहते थे कि अब आपके लिए कोई रोल नही लिखेगा आप अपने गांव चले जाओ. ताने सुनने के बाद भी मैंने हार नही मानी और अपना संघर्ष जारी रखा"

इसके बाद उन्हें 'कबूल है' सीरियल में अच्छा किरदार करने को मिला और अब सीरियल 'जोधा अकबर' में बांदी का रोल मिला. वो कहती हैं, "यह शो नंबर 1 पर चल रहा है और लोग मेरा किरदार भी पसंद कर रहे हैं."

बदला रवैया

बिहार के रहने वाले केके गोस्वामी का पूरा नाम कृष्णकांत गोस्वामी है.

गोस्वामी बताते हैं, ‘‘जब में 1995 में आया था तो लोगों की सोच थी कि हम जैसे लोग सिर्फ़ कॉमेडी ही कर सकते हैं और हमे कोई रोल नहीं दिए जाते थे. कभी किसी आइटम गानों में हिरोइन के घाघरे के पास खड़े होकर नचवाया जाता था या किसी फ़ाइट सीन में ड़ाल दिया जाता था. मैंने उनसे कहा था कि मैं भी यहाँ जॉनी लीवर, महमूद साहब की तरह रोल के लिए आय़ा हूं. हीरो के लिए आया हूँ तो लोग हंसते थे मेरी बात सुनकर.’’

गोस्वामी कहते हैं, "एक दुख है कि हम भी हैंडीकैप्ड हैं और जो लोग मूक-बधिर होते हैं वे भी हैंडीकैप होते हैं अगर वो सडक़ पर खड़े हों और उसका कोई मज़ाक उड़ाए तो दस लोग आ जाएंगे उसे समझाने लेकिन हमारा कोइ मजाक़ उड़ा रहा हो तो दस शमिल होकर हंसेगे."

गोस्वामी कहते हैं, "शुरुआत में मेरे बच्चे को मज़ाक सुनना पड़ता लेकिन आज जब मैं इतने सारे सीरियल और भोजपुरी फ़िल्म कर रह हूं तो मेरे बच्चे के साथ पढ़ रहे बच्चे उसका मज़ाक नहीं बनाते, बल्कि उसके सामने मेरी तारीफ़ करते हैं. ये देख कर मुझे ख़ुशी होती है कि इंडस्ट्री ने मुझे पहचान दी."

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