लाइट्स...कैमरा...और तिब्बत!

  • 25 मई 2014
मजनू का टीला

दिल्ली के 'मजनू का टीला' इलाक़े में आपको बहुत से तिब्बती दिखेंगे. ये लोग यूं तो भारत में निर्वासित ज़िंदगी बिता रहे हैं लेकिन अब यही तक़रीबन इनका घर है.

यहां गलियों से गुज़रते हुए आपको नज़र आएंगे कुछ परंपरागत तिब्बती हस्तशिल्प, तिब्बती परंपरागत कपड़े, खाने की दुकानें और लगभग हर दुकान के बाहर तिब्बत का झंडा.

आपको यहां तिब्बती पारंपरिक लोक संगीत भी सुनने को मिलेगा और साथ ही मिल जाएंगी ऐसे कई गानों की सीडी और डीवीडी भी. पूछने पर मालूम हुआ कि कुछ डीवीडी तिब्बती फिल्मों की भी हैं.

कहां बनती हैं ये फिल्में और इन्हें कौन बनाता है? दरअसल इन फिल्मों के पीछे हैं कई तिब्बती युवा, जो चलती-फिरती तस्वीरों के ज़रिए अपनी संस्कृति, जनजीवन और संघर्ष से जुड़े पहलुओं को पर्दे पर उतार रहे हैं.

ये उभरते फ़िल्मकार तिब्बत को एक नई रोशनी में सामने ला रहे हैं और अपने संघर्ष को एक नया दृष्टिकोण दे रहे हैं.

तिब्बत फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव

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भारत में तिब्बत फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव रखने में दो लोगों का सबसे अहम योगदान रहा है. ये हैं भारतीय मूल की ऋतू सरीन और तिब्बती टेनज़िन सोनम.

ऋतु सरीन और टेन्ज़िन सोनम की मुलाक़ात दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुई.

ऋतु सरीन कहती हैं, “हम दिल्ली यूनिवर्सिटी के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया में फिर मिले. टेन्ज़िन पत्रकारिता पढ़ रहे थे और मैं पढ़ रही थी फिल्म मेकिंग. यहीं पर साल 1986 में हमने अपनी पहली फ़िल्म बनाई और उसके बाद साल 1987 में हमने शादी कर ली. उसके बाद हम लंदन चले गए और फिर साल 1991 में हमने वहां शुरुआत की 'वाइट क्रेन फ़िल्मस' की.”

'वाइट क्रेन फ़िल्मस' के साथ इन दोनों ने तिब्बत फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव रखी.

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Image caption ड्रीमिंग ल्हासा फिल्म उन लोगों पर है जो एक तिब्बत लौटना चाहते हैं

उनके प्रोडक्शन हाउस की पहली डॉक्यूमेंट्री आई साल 1991 में ‘दि रिइनकारनेशन ऑफ़ खेनसूर रिंपोचे'. ये फ़िल्म बहुत सारे फ़िल्म समारोहों में गई और अमरीका, ऑस्ट्रिया, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों में प्रदर्शित हुई.

बाद में दोनों भारत आ गए और साल 2005 में उन्होंने बनाई अपनी पहली फीचर फ़िल्म 'ड्रीमिंग ल्हासा', जो टोरोंटो फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गई.

इन फ़िल्मों ने लोगों को तिब्बत को एक नई नज़र से देखने का अवसर दिया. तिब्बती नौजवानों के लिए तो ये एक नया करियर विकल्प भी बन गया है.

वो इन फ़िल्मों के ज़रिए तिब्बती संस्कृति और परंपरा को बचाना चाहते हैं, उसे ज़िंदा रखना चाहते हैं.

बाधाएं

हालांकि बहुत से नौजवान डॉक्यूमेंट्री और फीचर फ़िल्में बना रहे हैं लेकिन इसमें काफ़ी बाधाएं हैं.

इन फ़िल्मों के लिए पैसा जुगाड़ना आसान नहीं होता. फ़िल्ममेकर ऋतु सरीन और टेन्ज़िन सोनम कहते हैं कि सीमित संसाधनों की वजह से मुश्किलें आती है.

टेन्ज़ीन बताते हैं, “हमें मदद तो मिलती है और दुनिया भर से हमें लोग मिलते हैं जो हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं पर फ़िल्म के लिए फंड इकट्ठा करना और फिर उसका वितरण करने में दिक्कतें आती हैं.”

इन मुश्किलों के बावजूद ये इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है. ये दोनों हर साल अंतरराष्ट्रीय धर्मशाला फ़िल्म समारोह का भी आयोजन करते हैं.

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कुछ फ़िल्ममेकर तिब्बत में रहते हैं. कुछ दुनिया के दूसरे देशों मे भी रहते हैं.

वियतनाम के रहने वाले ताशी गाइल्तंग की फ़िल्म ‘टर्टल सूप’ कांस फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई.

अधूरे ख़्वाब

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Image caption फ़िल्म 'टेलो रिम्पोछे' का निर्देशन किया ऋतू सरीन और टेनज़िन सोनम ने.

लद्दाख में रह रहे फ़िल्म निर्माता गेलेक पल्संग कहते हैं कि इन फ़िल्मों के ज़रिए वो अपने ख़्वाबों और उम्मीदों को एक चेहरा देते हैं.

वो कहते हैं, “ये मेरा ख़्वाब है कि हम एक दिन वापस अपने घर यानी तिब्बत लौटेंगे. जब तक हम निर्वासन में हैं तब तक फ़िल्मों के ज़रिए अपनी परंपरा को बचा कर रखेंगे और दुनिया को अपनी आज़ादी की लड़ाई के बारे में बताते रहेंगे.”

दिल्ली में रह रहे युवा फ़िल्म मेकर टेन्ज़िन खेपहक वाइल्ड लाइफ डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं और वो तिब्बती फ़िल्मकारों पर भारतीय प्रभाव की बात स्वीकारते हैं.

टेन्ज़िन कहते हैं, “मैं यहीं भारत मैं पैदा हुआ, इतने सालों से यहां रह रहा हूं और भारतीयों के साथ काम कर रहा हूं. एक तरीके से मैं भारतीय भी हूं. मुझे अजय देवगन और काजोल बहुत पसंद हैं. बहुत सारे तिब्बती भारतीय फ़िल्में देखते हैं. हाल ही में मैने 'शिप ऑफ थीसस' देखी जो मुझे अच्छी लगी.”

चाहे तिब्बती दुनिया के किसी भी कोने में रहें और कुछ भी करें लेकिन इन सबकी आंखों में एक सपना है कि ये सब वापस तिब्बत जाएं.

मजनू का टीला में लगभग हर दुकान के बाहर लगा 'फ्री तिब्बत' का झंडा या पोस्टर उनकी उम्मीदों का प्रतीक है.

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