मधुबाला की वो अधूरी ख़्वाहिश ?

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मधुबाला बिमल रॉय की फ़िल्म 'बिराज बहू' में काम करना चाहती थीं. उन्होंने बिमल रॉय के दफ़्तर के कई चक्कर लगाए लेकिन बिमल उन्हें कास्ट नहीं कर पाए.

मधुबाला को अंतिम वक़्त तक इस बात का अफ़सोस था.

12 जुलाई को बिमल रॉय की 105वीं जयंती है.

इस मौक़े पर 'दो बीघा ज़मीन', 'बंदिनी', 'मधुमती', 'देवदास' जैसी क्लासिक फ़िल्मों के इस निर्देशक के बारे में ऐसी ही कई दिलचस्प बातें बताईं उनकी बेटी रिंकी भट्टाचार्य ने जो एक पत्रकार भी हैं. पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश.

(दिलीप कुमार की आत्मकथा)

'इंदिरा गांधी भी प्रशंसक थीं'

‘अरे बिमल दा आपके हाथों में तो जादू है. आपने तो मुझे अप्सरा बना दिया.’ ये शब्द थे दादा साहब फाल्के सम्मान पाने वाली मशहूर बंगाली अभिनेत्री कानन देवी के.

बिमल रॉय, फ़िल्मकार बनने से पहले एक फ़ोटोग्राफ़र थे. तस्वीरों की ग़ज़ब समझ थी उनमें.

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कलकत्ता में उनके स्टूडियो के बाहर लंबी लाइन लगी होती थी. हीरो, हीरोइन तो छोड़िए इंदिरा गांधी भी उनकी तस्वीरों की प्रशंसक थी. सब चाहते थे कि वो बिमल दा से तस्वीरें खिंचाएं.

कैमरे के प्रति इसी प्यार ने उन्हें फ़िल्मकार बना गया.

'मधुमती की कई नकल बनीं'

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Image caption रिंकी भट्टाचार्य ने अपने पिता बिमल रॉय पर किताब भी लिखी.

रिंकी बताती हैं, ''पिताजी की सोच समय से आगे की थी. मधुमती से प्रेरित होकर आज तक फ़िल्में बन रही हैं. ऋषि कपूर की कर्ज़ और फ़राह ख़ान की ओम शांति ओम उसी पर आधारित थीं.

पिताजी ने दिलीप कुमार को लेकर देवदास बनाई.''

वह कहती हैं कि बाद में संजय लीला भंसाली ने भी देवदास बनाई, लेकिन वो 'देवदास' की ट्रेजेडी नहीं समझ पाए. शाहरुख़ ख़ान तो इस किरदार के दर्द को समझ ही नहीं सके.

'सिगरेट के धुएं सा शांत'

रिंकी कहती हैं, ''बिमल रॉय ज़्यादा बोलते नहीं थे. फ़िल्म हिट होने पर भी कोई पार्टी वगैरह नहीं रखते थे. वो फ़िल्मकार थे लेकिन अपने बच्चों को फ़िल्म से दूर रखते थे.

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Image caption (बिमल रॉय की बेटी रिंकी भट्टाचार्य ने बीबीसी से उनकी यादें बांटीं)

वह बहुत सिगरेट पीते थे और इसी वजह से सिर्फ़ 56 साल की उम्र में कैंसर से उनकी मौत हो गई.

सिगरेट ने एक महान फ़िल्मकार को हमसे हमेशा के लिए छीन लिया.''

'ऑस्कर लाते भारत के लिए'

Image caption (मुंबई में बिमल रॉय पर आधारित एक प्रदर्शनी का आयोजन हुआ)

बीबीसी से बातचीत में रिंकी ने बताया, ''अपने अंतिम दिनों में बाबूजी एक फ़िल्म पर काम कर रहे थे. जो कुंभ मेले पर आधारित थी. फ़िल्म की शूटिंग भी हुई. गुलज़ार इसका हिस्सा थे. अगर यह फ़िल्म बनती, तो भारत का पहला ऑस्कर भी बिमल रॉय ही लाते.''

''पर बाबूजी का सम्मान भारत सरकार कभी नहीं किया. उन्हें कोई सम्मान नहीं मिला. उनको जो प्यार और सत्कार मिला वो उनके दर्शकों से ही मिला.''

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