सिनेमा में नई जान फूंकते फ़िल्म उत्सव

भारतीय फ़िल्मों का मतलब अक्सर बॉलीवुड समझ लिया जाता है और स्वतंत्र फ़िल्में कई बार मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाती. लेकिन छोटे-छोटे शहरों में आयोजित हो रहे फ़िल्म उत्सव इस कमी को पूरा कर रहे हैं.

स्वतंत्र पत्रकार एलिस फ़्रांसिस के मुताबिक ये फ़िल्में प्रतिभा और अलग सामग्री को दर्शकों तक पहुंचा रही हैं और इसमें माध्यम बन रहे हैं फ़िल्म उत्सव.

पढ़िए एलिस फ़्रांसिस की पूरी रिपोर्ट

राम रमेश शर्मा मंच पर एक माइक लहराते हैं, उनकी आंखों में चमक है, वो बोल नहीं सकते.

तीन दिन पहले ही 26 साल के लेखक-निर्देशक राम रमेश शर्मा मुंबई से एक उड़ान से हिमालय की गोद में बसे लेह पहुंचे थे.

उनकी फ़िल्म 'क़ाफ़िरों की नमाज़' यहां तीसरे लद्दाख अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में प्रतियोगिता में शामिल है. इस शहर में कोई सिनेमाघर नहीं है.

राम रमेश शर्मा ने 2011 में फ़िल्म स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी. उन्होंने भारत प्रशासित कश्मीर में तैनात एक सैनिक का साक्षात्कार लेने वाले पत्रकार की कहानी पर फ़िल्म बनाने के लिए क़र्ज़ लिया था.

राम रमेश शर्मा अपनी फ़िल्म पर बड़े डायरेक्टरों की प्रतिक्रिया जानने के लिए पोस्टरों और डीवीडी के साथ पहुंचे हैं.

उनकी फ़िल्म को चार अवॉर्ड मिले. फ़िल्म के प्रोड्यूसर गौरव सैकिया कहते हैं, "हमें अंदाज़ा ही नहीं था कि हम जीतने वाले हैं."

बात सिनेमा की हो तो बॉलीवुड निर्विवाद रूप से भारत का हीरो है. लाखों लोग इसके तड़क-भड़क वाले डांस और आसान कहानियों को पसंद करते हैं.

'विचारोत्तेजक सामग्री'

लेकिन बीते एक दशक में फ़िल्म उत्सवों की संख्या में आई बढ़ोतरी से लोगों का ध्यान राम रमेश शर्मा जैसे स्वतंत्र फ़िल्मकारों की फ़िल्मों पर जा रहा है.

स्वतंत्र फ़िल्मों ने असल ज़िंदगी की घटनाओं और रूढ़िवादी सांस्कृतिक परंपराओं को चुनौती देते कश्मकश भरे चित्रण से हलचल पैदा की है.

बीते साल 'बीए पास' में पुरुष देह-व्यापार पर पड़ताल को लेकर लोगों की भौहैं तन गई थी, जबकि जून में 'द वर्ल्ड बिफ़ोर हर' सबसे सफल डॉक्यूमेंट्री बनी.

इस फ़िल्म में युवा महिलाओं के लिए हिंदू विचारधारा के एक शिविर और मिस इंडिया के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम की समानता दिखाते हुए दोनों की तुलना की गई थी.

इन फ़िल्मों की विचारोत्तेजक सामग्री से कई बार मुश्किलें भी हुई हैं.

सस्ती तकनीक

अनुराग कश्यप की फ़िल्म ब्लैक फ़्राइडे पर दो साल तक पाबंदी लगी हुई थी क्योंकि इसमें मुंबई में हुए बम धमाकों और हिंदू-मुस्लिम दुश्मनी का जो चित्रण हुआ था वो काफ़ी विवादास्पद समझा गया.

इस फ़िल्म को आख़िर 2007 में रिलीज़ की मंज़ूरी मिली.

भारत में ऐतिहासिक रूप से फ़िल्म फ़ेस्टिवल सरकारें आयोजित करती थीं लेकिन सस्ती तकनीक ने हालात बदल दिए हैं.

फ़िल्म पत्रकार अरुणा वासुदेव कहती हैं, "1990 के दशक के अंत में ये छोटे शहरों में छोटे स्तर पर शुरू हो चुका था क्योंकि जैसे ही आप डीवीडी पर फ़िल्म दिखाते थे, लोग कहते थे 'चलो फ़िल्म देखते हैं' और ये छोटा-मोटा फ़िल्म उत्सव बन जाता था."

अरुणा ने 1990 में भारत का पहला स्वतंत्र फ़िल्म उत्सव सिनेफ़ैन शुरू किया था.

2000 के दशक के मध्य में डिजिटल तकनीक आने से फ़िल्में बनाना और आसान हो गया जिससे फ़िल्म उत्सवों की संख्या बढ़ी.

डॉक्यूमेंट्री में नई जान

अचानक ही वहां विचारोत्तेजक डॉक्यूमेंट्री और स्वतंत्र फ़िल्मों की बाढ़ आ गई.

हिमाचल प्रदेश में तीन साल पहले दो स्वतंत्र फ़िल्मकारों ने धर्मशाला अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल (डीआईएफ़एफ़) शुरू किया था ताकि भारत के "समानांतर" सिनेमा को एक मंच मिल सके.

डीआईएफ़एफ़ के सह निदेशक तेनज़िंग सोनम कहते हैं, "स्वतंत्र फ़िल्मकार हमारे जैसे फ़िल्म उत्सव में ही अपनी फ़िल्में दिखा सकते हैं."

सोनम कहते हैं कि यहां दिखाई गई फ़िल्में सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित हुई हैं और सफल भी रही हैं. इनमें निष्ठा जैन की डॉक्यूमेंट्री गुलाबी गैंग भी है जो उत्तर प्रदेश में महिलाओं के एक समूह पर आधारित है.

उनका मानना है कि समानांतर सिनेमा सांस्कृतिक नियमों को चुनौती देता है और उन मुद्दों को उठाता है जिनसे मुख्यधारा का सिनेमा बचता है, इससे नया दर्शक-वर्ग जुड़ रहा है.

अरुणा वासुदेव कहती हैं कि फ़िल्म उत्सवों ने भारतीय डॉक्यूमेंट्री में नई जान फूंकी. वो कहती हैं, "लोगों की डॉक्यूमेंट्री में रुचि बढ़ी है, बीते पांच साल में इसने नई ऊंचाई को छुआ है."

'पर्याप्त प्रतिभा नहीं'

हालांकि कई लोग शिकायत करते हैं कि इन फ़िल्म उत्सवों से पर्याप्त प्रतिभा सामने नहीं आ रही.

देश के आला निर्देशकों में से एक अनुराग कश्यप कहते हैं, "छोटे फ़िल्म उत्सव हमें अभी अपनी फ़िल्म देखने की संस्कृति को विकसित करने में मदद कर रहे हैं."

वो आगे कहते हैं, "लेकिन अब भी हमारे ज़्यादातर फ़िल्म उत्सव लोकप्रिय फ़िल्मों की ओर झुकाव रखते हैं, अलग-अलग भाषाओं में कई दिलचस्प फ़िल्में बनती हैं लेकिन उन्हें जगह नहीं मिलती."

गौरव सैकिया की शिकायत है कि मुख्यधारा के फ़िल्म उत्सव नए फ़िल्मकारों को नज़रंदाज़ करते हैं.

वो कहते हैं, "अगर आपकी फ़िल्म में कोई जाना-पहचाना अभिनेता नहीं है तो कुछ फ़िल्म उत्सवों में आपकी फ़िल्मों को चयन के लिए देखा भी नहीं जाता."

हालांकि स्वतंत्र फ़िल्मों की ये उड़ान अनदेखी नहीं गई है.

एमटीवी ने छोटे पर्दे पर समानांतर फ़िल्मों को जगह देना शुरू किया है वहीं सिनेमा चेन पीवीआर स्वतंत्र फ़िल्मों के लिए 'डायरेक्टर्स रेयर' शो आयोजित करता है.

'व्यावसायिक मौका'

डायरेक्टर्स रेयर के प्रोग्रामिंग हेड शिलादित्य बोरा कहते हैं कि पहली फ़िल्म के सिर्फ़ 1,600 टिकट बिके थे लेकिन अब हर हफ़्ते नई फ़िल्मों के औसतन 10,000 टिकट बिक जाते हैं.

वो बताते हैं, "एक व्यावसायिक मौका है लेकिन इसमें थोड़ा समय लगेगा क्योंकि भारतीय स्वतंत्र सिनेमा की गुणवत्ता स्तरीय नहीं है."

फ़िल्म निर्माताओं को विदेशी बाज़ार में वीडियो ऑन डिमांड से मुनाफ़ा हो रहा है. ऐसे में फ़िल्म उद्योग के लोग कहते हैं कि स्वतंत्र फ़िल्मों का भविष्य ऑनलाइन है.

लेकिन भारत में वीडियो ऑन डिमांड शुरुआती दौर में है क्योंकि इंटरनेट की स्पीड कम है और पहुंच भी.

ऐसे में तब तक फ़िल्म उत्सव स्वतंत्र फ़िल्मों को जगह देने में अहम भूमिका निभाते रहेंगे.

(एलिस फ़्रांसिस स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं)

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