डरते हैं भारतीय फ़िल्मकार: निशा पाहूजा

  • 16 जुलाई 2014
Image caption (बाएं से: निशा पाहूजा, अनुराग कश्यप और अभिनेत्री पूजा चोपड़ा)

"भारतीय फ़िल्मकार डरपोक होते हैं. वो सच दिखाने से डरते हैं जो बड़े अफ़सोस की बात है."

ये कहना है निशा पाहूजा का, जिनकी इंडो-कैनेडियन डॉक्यूमेंट्री 'द वर्ल्ड बिफ़ोर हर' ख़ासी चर्चा बटोर रही है.

(मैं एंटी फ़ेमिनिस्ट हूं: अनुराग कश्यप)

निशा की ये डॉक्यूमेंट्री कई अवॉर्ड जीत चुकी है. भारत में पिछले महीने रिलीज़ हुई यह डॉक्यूमेंट्री समीक्षकों से काफ़ी तारीफ़ बटोर चुकी है.

बीबीसी से ख़ास बातचीत करते हुए निशा कहती हैं, "भारतीय सिनेमा की समाज के प्रति बहुत ज़िम्मेदारी है. लेकिन यहां के फ़िल्मकार इसे ठीक तरह से नहीं निभा रहे हैं. लोग सच दिखाकर विवाद में पड़ने से डरते हैं."

'द वर्ल्ड बिफ़ोर हर'

Image copyright Nisha Pahuja

निशा की ये डॉक्यूमेंट्री दो लड़कियों के नज़रिए से कही गई है. एक लड़की विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा दुर्गा वाहिनी की सदस्य है और दूसरी मिस इंडिया में हिस्सा ले रही एक प्रतियोगी है.

दुर्गा वाहिनी कैंप में क्या-क्या गतिविधियां होती हैं और दूसरी ओर एक सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही लड़की को किस परिस्थिति से गुज़रना पड़ता है, यही इस डॉक्यूमेंट्री का विषय है.

(कान: फ़िल्म समारोह या 'तमाशा')

निशा ने ये फ़िल्म दुर्गा वाहिनी कैंप के अंदर ही शूट की. वहां उन्होंने क्या पाया.

निशा का जवाब था, "जिस तरह से छोटी-छोटी बच्चियों के मन में दूसरे समुदायों के प्रति नफ़रत की भावना भरी जा रही है. एक तरह से ब्रेन वॉश किया जा रहा है. इतिहास को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर उन्हें सिखाया जा रहा है वो काफ़ी तकलीफ़देह रहा."

परेशानी

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निशा ने बताया कि फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से पास होने के बाद भी भारत में रिलीज़ करने में दिक़्क़तें पेश आईं और विश्व हिंदू परिषद ने इसका विरोध भी किया था.

फ़िल्म को भारत में अनुराग कश्यप ने प्रस्तुत किया है. निशा के मुताबिक़, "भारत में अनुराग कश्यप जैसे साहसी फ़िल्मकार बहुत कम हैं."

मोदी सरकार से चिंता

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निशा, भारत में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद से चिंतित हैं.

निशा कहती हैं, "वो एक ख़ास किस्म की विचारधारा से आते हैं. आरएसएस से जुड़े रहे हैं. तो उनके आने के बाद महिलाओं के प्रति लोगों का क्या रवैया होता है, अल्पसंख्यकों के प्रति किस तरह का बर्ताव आगे होगा, ये सारी चिंताएं लाज़मी हैं."

लेकिन साथ ही निशा मानती हैं कि भारत का मौजूदा माहौल थोड़ी उम्मीद देता है. लोग अब यहां कम से कम औरतों के अधिकार की बात तो करने लगे हैं जो आशाजनक बात है.

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