रिव्यू: अपको डरा पाएगी 'पिज़्ज़ा-3डी'?

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रेटिंग: *

'पिज़्ज़ा- 3 डी' एक हॉरर फ़िल्म के रूप में प्रचारित की गई. इसलिए मेरी उम्मीदें पहले से ही कम हो गईं.

हॉरर फ़िल्मों में लोग डरने के लिए जाते हैं. इन फ़िल्मों में कहानी की कोई ख़ास अहमियत नहीं होती.

(रिव्यू :'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया')

कई बार घटिया हॉरर फ़िल्में, आपको हंसने पर मजबूर कर देती हैं.

वैसे इस फ़िल्म की शुरुआत बड़े स्टाइलिश तरीके से होती है. ओपनिंग क्रेडिट्स में बेहतरीन ग्राफ़िक्स का इस्तेमाल किया गया है.

बैकग्राउंड म्यूज़िक भी अच्छा है. सेट्स भी अच्छे हैं और बोनस के तौर पर फ़िल्म 3 डी है.

बिलकुल डरावनी नहीं

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लेकिन हॉरर फ़िल्म का मतलब है कि वो दर्शकों को डराए. अगर उसमें डराने वाले तत्व नहीं हैं तो बाकी बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता.

(रिव्यू :'बॉबी जासूस')

हाल फ़िलहाल में मुझे 'द ब्लेयर विच प्रोजेक्ट' और 'पैरानॉर्मल एक्टिविटी' जैसी दो बेहतरीन हॉरर फ़िल्मों के नाम याद आते हैं.

हिंदी में हम राम गोपाल वर्मा की 'भूत' और 'वास्तुशास्त्र' को अच्छी हॉरर फ़िल्म कह सकते हैं.

बेमक़सद फ़िल्म

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'पिज़्ज़ा- 3 डी' के जो दो मुख्य किरदार हैं उनसे दर्शक जुड़ा हुआ महसूस ही नहीं करते.

(रिव्यू :'एक विलेन')

फ़िल्म में बेहद सतही और भौंडे तरीके से भूत दिखाए गए हैं. लगता है कि निर्देशक ख़ुद, दर्शकों को नहीं डराना चाहता. फ़िल्म में हास्य भी नहीं है.

फिर पता नहीं, ऐसी फ़िल्म बनाने का क्या मक़सद है ?

औसत कलाकार

फ़िल्म का हीरो, पिज़्ज़ा डिलीवरी बॉय है. ऐसा लीड एक्टर आपको पॉर्न फ़िल्मों ख़ूब मिलेगा.

फ़िल्म का हीरो, जैकी भागनानी का कमज़ोर संस्करण लगता है (वैसा तो ऐसा मुमकिन ही नहीं है).

हीरो की पत्नी डरावनी कहानियों की लेखिका है.

बेसिर-पैर की कहानी

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एक पिज़्जा की डिलीवरी करने के दौरान हीरो एक बंगले में फंस जाता है.

(रिव्यू :'हमशकल्स')

वो बड़ी खुशी-खुशी भूतों को टॉर्च दिखाता है और एक कमरे से दूसरे कमरे में भटकता रहता है, जबकि वो आसानी से उस घर से भाग सकता है.

फ़िल्म के अंत में एक ट्विस्ट है लेकिन तब तक आपका इस बेस्वाद पिज़्ज़ा से दिल भर चुका होता है.

फ़िल्म का ओरिजिनल तमिल संस्करण बहुत कामयाब रहा था. ऐसे में मैं तो उम्मीद कर रहा था कि मेरी डर के मारे घिग्घी बंध जाएगी. लेकिन मैं बिना डरे, बोर होकर सिनेमाहॉल से बाहर निकला.

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