अख़बार के दफ़्तरों के बाहर खड़े रहते थे मंटो

मनी शंकर अय्यर और आकार पटेल इमेज कॉपीरइट westland limited

सआदत हसन मंटो अख़बार के दफ़्तर के बाहर खड़े रहते थे और फ़टाफ़ट निबंध लिखकर अपना पैसा लेते थे और निकल जाया करते थे.

इसलिए उनके बहुत सारे निबंधों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है. ये निबंध काफ़ी छोटे हैं और अख़बारों के लिए लिखे गए थे.

इन्हीं लेखों के संकलन का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है आकार पटेल ने.

इस क़िताब 'व्हॉय आई राइट?' का बीते हफ़्ते दिल्ली में अनावरण हुआ.

मंटो पर यह क़िताब लिखने का इरादा उन्होंने कब और क्यों किया, पढ़िए ख़ुद आकार पटेल के शब्दों में.

बॉलीवुड और मंटो

मेरी दोस्त सुपर्णा एक क़िताब लिख रही थीं बॉलीवुड पत्रकार दिव्यानी चौबल पर. उन्होंने मुझसे पूछा कि मंटो ने 50, 60 या फिर 70 के दशक में बॉलीवुड के लिए कुछ लिखा था या नहीं?

मुझे इतना तो यक़ीन था कि मंटो ने बाबू राव पटेल के बारे में लिखा था और उन्होंने और क्या लिखा था यह जानने के लिए मैंने उनके काम के बारे में पढ़ना शुरू किया.

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लेकिन उससे पहले मुझे उसका अनुवाद करना पड़ा और इस तरह से मैंने कुछ चुनिंदा निबंधों से यह किताब बनाई.

इस किताब में जितने भी निबंध हैं वह काफ़ी छोटे हैं और अख़बारों के लिए लिखे गए थे.

मंटो अख़बार के दफ़्तर के बाहर खड़े रहते थे और फ़टाफ़ट एक निबंध लिखकर अपना पैसा लेते थे और निकल जाया करते थे.

क्यों हुए प्रभावित?

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मंटो किसी फ़िरके के नहीं थे, उनकी अपनी सोच थी और ये सब मैंने उनके लिखे का तर्जुमा करने के बाद जाना.

मैं नहीं जानता कि उपमहाद्वीप में ऐसा कोई लेखक हो, ख़ासतौर पर उस वक़्त में, जब सारे लेखक बंटे हुए थे.

उनका जो हाथ है वो बहुत हल्का है. यह दूसरी बात है कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में जो लोग हमारी ज़ुबानों में लिखते हैं, उनमें ये गुण बहुत कम देखने को मिलता है.

मंटो इस सोच से लिखते थे कि जो भी वह लिखें, वह लोगों तक पहुंचे.

(बीबीसी संवाददाता विदित मेहरा से बातचीत पर आधारित)

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