फ़िल्म रिव्यू: कितनी ख़ूबसूरत है ये 'ख़ूबसूरत'

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फ़िल्म: ख़ूबसूरत

निर्देशक: शशांक घोष

कलाकार: सोनम कपूर, फ़वाद ख़ान

रेटिंग: *1/2

एक चंचल, बिंदास और स्मार्ट लड़की एक अनुशासित घर में प्रवेश करती है और वहां के लोगों को मौज मस्ती और हंसी-मज़ाक से जीना सिखाती है.

ये थीं 1980 में आईं ऋषिकेश मुखर्जी की 'ख़ूबसूरत' रेखा.

एक ज़बरदस्ती दोस्ताना और बिंदास दिखने की कोशिश करने वाली लड़की, जो कई बार बेवकूफ़ाना हरकतें करती है और अपनी मां (किरण खेर) को उसके नाम मंजू से बुलाती है.

ये हैं साल 2014 की 'ख़ूबसूरत' सोनम कपूर.

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सोनम ने एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट का रोल अदा किया है. उसे राजस्थान के एक राजसी खानदान के मुखिया के इलाज की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है.

इस रोल को मशहूर थिएटर कलाकार और निर्देशक आमिर रज़ा हुसैन ने अदा किया है.

आमिर रज़ा हुसैन को पर्दे पर देखना सुखद लगता है. वो बिलकुल राजसी लगते भी हैं.

हां, लेकिन उनके बोलने के लहज़े में उत्तर प्रदेश की स्थानीय बोली का पुट आता है जो फ़िल्म में उनके किरदार से ज़्यादा मेल नहीं खाता.

अपने पिता और मां (रत्ना पाठक शाह) के साथ इसी महल में रहते हैं बेहद धीर गंभीर और ना जाने किस काम में बेहद व्यस्त रहने वाले साहबज़ादे (फ़वाद ख़ान).

ये परिवार जिस महल में रहता है वो शहरी सभ्यता से कोसों दूर नज़र आता है.

फ़वाद का बेमकसद रोल

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हद दर्जे के औपचारिक बंद गले वाले कपड़े पहनकर फ़वाद अपने इस महल में बस टहलते हुए नज़र आते हैं.

ड्राइंग रूम से बेडरूम, बेडरूम से स्टडी रूम, स्टडी रूम से बाथरूम. ना जाने किस वजह से वो इधर से उधर चक्कर लगाते रहते हैं.

फ़वाद, पाकिस्तानी गायक और अभिनेता हैं. वो भारत में टीवी सीरियल 'ज़िंदगी गुलज़ार' है से मशहूर हुए हैं.

भारत में उनकी अच्छी ख़ासी महिला प्रशंसक बन चुकी हैं और इस फ़िल्म के बाद से उनकी संख्या में इज़ाफ़ा ही होगा. क्योंकि वो अच्छे लगे हैं.

निर्देशन

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कलाकारों के हो हंगामे के बीच मुझे सिर्फ़ एक शख़्स हमदर्दी का पात्र लगा. वह हैं फ़िल्म के निर्देशक शशांक घोष.

शशांक इससे पहले 'वैसा भी होता है पार्ट-2' (2003) और 'क्विक गन मुरुगन' (2009) का निर्देशन कर चुके हैं. आपने इन फ़िल्मों को भले ही पसंद ना किया हो लेकिन ये अपने ही अंदाज़ की अलग फ़िल्में थीं.

इस पकाऊ फ़िल्म में सिर्फ़ एक अच्छी बात है और वो है स्नेहा खानवल्कर का स्फूर्तिदायक संगीत.

सोनम की ओवरएक्टिंग

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वैसे ईमानदारी से मैं इस तरह की फ़िल्में देखने वाला आदमी हूं नहीं.

ये फ़िल्म शायद 14-15 साल के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई है.

किस बात ने मुझे ज़्यादा तंग किया?

सोनम कपूर की ओवर एक्टिंग ने या फ़िल्म की बेहद कमज़ोर कहानी ने. कहना मुश्किल है.

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