फ़िल्म रिव्यू: 'हैदर'

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फ़िल्म: हैदर

निर्देशक: विशाल भारद्वाज

कलाकार: शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, तब्बू

रेटिंग: **

ये एक मुख्यधारा की हिंदी फ़िल्म है.

जिसमें एक मेनस्ट्रीम स्टार (शाहिद कपूर) है. इसमें एक बड़े स्टूडियो (यूटीवी-डिज़नी) ने पैसा लगाया है और उम्मीद की जा रही है कि बॉक्स ऑफ़िस पर इसकी शुरुआत अच्छी होगी.

फ़िल्म की टारगेट ऑडियेंस हैं वो आम दर्शक जो मोहब्बत, राजनीति और धर्म के नाम पर यथास्थिति बहाल करने के पक्षधर हैं और ज़्यादा बदलाव नहीं चाहते.

फ़िल्म में हम जिस इश्क़ की बात कर रहे हैं वो है एक महिला (तब्बू) और उसके देवर (केके मेनन) के बीच.

उस महिला के बेटे हैदर (शाहिद कपूर) को दोनों के इस रिश्ते का इल्म है.

फ़िल्म, हैदर की मां और उसके बीच एक अजीब किस्म के शारीरिक आकर्षण का भी आभास देती है.

कश्मीर की कहानी

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फ़िल्म कहीं कहीं पर पॉलिटिकल ड्रामा भी लगती है.

इसकी कहानी 90 के दशक के कश्मीर पर आधारित है.

मेरे ख़्याल से इतने बड़े पैमाने पर बनाई गई ये पहली हिंदी फ़िल्म होगी जो कश्मीर में भारतीय फ़ौज के रोल की इतनी सूक्ष्मता से पड़ताल करती हुई लगती है.

विचलित करने वाले दृश्य

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फ़िल्म में इंटेरोगेशन के दौरान टॉर्चर करने वाले दृश्य काफ़ी परेशान करते हैं.

इसके अलावा 'पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ' से निपटने के लिए भारत सरकार प्रायोजित चरमपंथ को भी फ़िल्म बड़े बेबाक तरीके से दिखाती है.

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Image caption तब्बू ने अच्छा अभिनय किया है.

लेकिन इससे फ़िल्म को 'एंटी नेशनल' करार देना ग़लत होगा.

अगर सरकार द्वारा किसी राज्य के नागरिकों पर हो रही ज़्यादतियों को दिखाया गया है तो इसे 'एंटी नेशनल' कतई नहीं कहा जा सकता.

हैदर के लिए ये पता करना बेहद मुश्किल है कि देशद्रोह का आरोप झेल रहे उसके पिता ज़िंदा हैं या कश्मीर की किसी जेल में पड़े सड़ रहे हैं.

अभिनय

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फ़िल्म, विलियम शेक्सपियर के प्ले 'हैमलेट' का अडैप्टेशन है.

शाहिद कपूर अपने किरदार में जमे हैं लेकिन उनमें वो क्षमता नहीं कि वो इस फ़िल्म को अपने कंधों पर उठा लें. उस इंटेसिटी की शाहिद में कमी दिखी.

लंबे समय बाद तब्बू फिर से प्रभावशाली तरीके से नज़र आई हैं.

लेकिन इन दोनों अच्छे कलाकारों को साथी कलाकारों का सहयोग नहीं मिल पाया.

फ़िल्म की सपोर्टिंग कास्ट बिलकुल फीकी और बेरंग है.

उबाऊ फ़िल्म

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आप ये फ़िल्म देखने जाएं या नहीं, इसका जवाब मैं नहीं दे पाऊंगा.

इस तरह के फ़ैसले इस बात पर निर्भर करते हैं कि फ़िल्म से आपको कितनी उम्मीदें हैं.

इसकी कुछ बातें सराहनीय हैं. बर्फ़ से ढंका कश्मीर और झेलम बड़ी ख़ूबसूरत नज़र आती है.

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लेकिन इसमें लंबे, बेवजह खींचे गए कई दृश्य इसे तीन घंटे की उबाऊ फ़िल्म बना देते हैं.

कहानी में हैमलेट के ड्रामे को फ़िट करने की कोशिश की गई है लेकिन फ़िल्म दर्शकों को कतई जोड़ नहीं पाती.

आपका तो पता नहीं लेकिन मैं ख़ासा बोर हो गया.

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