पाकिस्तान में अमिताभ की दीवानगी

अमिताभ बच्चन, फ़िल्म स्टार, हिन्दी सिनेमा इमेज कॉपीरइट AFP

हिन्दी सिनेमा के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन शनिवार को 72 साल के हो गए.

पिछले चार दशकों में कई पीढ़ियाँ उनकी फ़िल्में देखते हुए पली-बढ़ी, जवान हुईं और ढल गईं.

लेकिन अमिताभ आज भी अपने ख़ास अंदाज में रुपहले पर्दे पर छाए हुए हैं.

हिन्दी सिनेमा के महानायक का जादू जितना हिन्दुस्तान में कारगर था उतना ही पाकिस्तान में.

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बिल्कुल भी आश्चर्यचकित न होइएगा अगर मैं कह दूँ कि मैं और अमिताभ बच्चन और मैं एक साथ बड़े हुए, पर अब मैं बूढ़ा हो रहा हूँ.

मैं आपको समझाता हूँ, जीवन में पहली फ़िल्म आनंद देखी तो पता चला कि फ़िल्म क्या होती है.

आनंद बाबू को ज़िंदा रखने के प्रयास में जुटे एक दुबले पतले लंबे से डॉक्टर को देखा तो पता चला, दोस्ती के क्या मानी हैं.

और जब बाहर निकला तो ये जाना कि अपने ही गाल पर बहते ख़ामोश आँसू इतने नमकीन क्यों होते हैं.

उसके बाद से घर पुराने कपड़े, घिसे-पिटे बर्तन, टूटी लकड़ियाँ ग़ायब होने लगीं.

अब आप ख़ुद ही बताइए कि मेरे जैसा चौथी क्लास का बच्चा, तीन कैसेटों वाले वीसीआर पर चोरी छिपे अमिताभ की नई फ़िल्म ज़ंजीर देखने के लिए आख़िर कैसे 10 रुपए जमा करता और वो भी सत्तर के दशक में.

नमकहराम

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एक दफा क्या हुआ कि वीसीआर वाले ने कान में कहा, आज शाम को नमकहराम लगा रहा हूँ आ जाओ. मैंने कहा, बस पाँच रुपए पड़े हैं गुल्लक में. कहने लगा, कोई बात नहीं, उधार देख लो.

ख़ैर साहब, अम्मा को बताया कि शाम को दोस्त के यहाँ जा रहा हूँ पढ़ाई करने, सुबह टेस्ट है.

अम्मा ने आँखों में आँखे डालकर कहा, पढ़ाई करके आ जाओ तो मुझे भी नमकहराम की कहानी सुना देना. फिर कहने लगी, मुझसे ठीक-ठीक बोलकर जाया कर, नमकहराम, मैंने तुझे पैदा किया है, तूने मुझे नहीं. पैसे हैं क्या...मैंने कहा..नहीं....

उन्होंने मुझे अपने दुपट्टे में गाँठ खोलकर दस रुपए निकालकर हथेली पर धर दिए. उस दिन के बाद से मैंने कम से कम माँ से मैंने झूठ नहीं बोला.

शोले

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शोले देखते हुए पुलिस का छापा पड़ गया क्योंकि उन दिनों वीसीआर पर फ़िल्म देखना, वो भी स्मगल्ड इंडियन फ़िल्म देखना पुलिस की नज़र में कड़ा अपराध था.

अगर उस दिन मुझे मज़ीद अपने कंधे पर चढ़वाकर दीवार न कुदवा देता तो बाप की इज़्ज़त और मुझे छुड़वाने के लिए उनके बहुत से रुपए भाड़ में चले जाते.

अमिताभ की आख़िरी फ़िल्म कुली थी जो मैंने देखी. फिर कई वर्ष किसी की कोई फ़िल्म भी नहीं देखी.

बागबान

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बहुत ज़माने बाद एक दिन बागबान ने फिर मुझे मेरे बचपन का हीरो सफ़ेद बालों में लौटा दिया.

फिर ब्लैक, सरकार, सरकार राज, निशब्द, चीनी कम, पा और भूतनाथ जो मैं अपने छोटे बेटे राफे को दिखाने सिनेमा ले गया.

राफे ने फ़िल्म देखते-देखते कहा, बाबा क्या आप भूतनाथ की तरह ग़ायब हो सकते हैं. मैं उसे कैसे बताऊँ कि भूतनाथ पिछले चालीस-बयालीस वर्षों से मेरे अंदर ही तो रहता है.

बात ये है कि ज़माने के किसी मोड़ पर एक ख़ास लम्हे में कुछ लोग कैमरे को हमेशा पसंद आ जाते हैं. अमिताभ इन्हीं में से हैं.

शनिवार को जब उनका 72वां जन्मदिन चढ़ा तो मैंने ख़ुद से कहा, हैप्पी बर्डे टू यू...बुड्ढा होगा तेरा बाप...

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