रिव्यू: बांध पाएगी 'सोनाली केबल'?

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फ़िल्म: सोनाली केबल

निर्देशक: चारुदत्त आचार्य

कलाकार: रेहा चक्रवर्ती, अली फ़ज़ल

रेटिंग: *

बॉलीवुड के शायद सबसे नामचीन किस्सागो जावेद अख़्तर ने एक दफ़ा कहा था कि एक हिंदी फ़िल्म बनाने के लिए दो चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है. एक तो कच्चा माल और दूसरा अनुपम खेर.

जावेद अख़्तर ने ये बात दस साल पहले कही थी. तब से अब तक स्थितियां काफ़ी बदल चुकी हैं.

अब आपको फ़िल्म बनाने के लिए कच्चे माल की ज़रूरत शायद ना पड़े क्योंकि आप उसे डिजिटली शूट कर सकते हो. लेकिन अब भी आप अनुपम खेर के बिना हिंदी फ़िल्म नहीं बना सकते.

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कम से कम मुझे तो यही महसूस हुआ जब पिछले हफ़्ते मैंने दीवारों पर 'इक्कीस तोपों की सलामी' फ़िल्म का पोस्टर देखा.

फिर टीवी पर आने वाली फ़िल्म 'शौकीन' का ट्रेलर देखा. 'सोनाली केबल' में भी अनुपम खेर के दर्शन होते हैं.

वो एक ज़बरदस्त ऐक्टर हैं इस बात में कोई शक़ नहीं लेकिन इतनी फ़िल्मों में वो एक साथ काम करते हैं कि ऐसा लगता है जैसे उन्होंने अपने कई क्लोन बनाकर उन्हें काम करने के लिए भेज दिए हों.

कहानी

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अनुपम खेर इस फ़िल्म में एक अमीर उद्योगपति बने हैं. उनकी कंपनी पैकेज्ड पानी से लेकर ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन जैसी सब चीज़ों का व्यापार करती है.

फ़िल्म की मुख्य किरदार है सोनाली (रेहा चक्रबर्ती) जो एक केबल सर्विस चलाती हैं और मुंबई के वर्ली इलाके में लोगों के घरों में ब्रॉडबैंड नेटवर्क मुहैया कराती हैं.

इसी वजह से उन्हें सोनाली केबल कहा जाता है. उनके ग्राहक उनकी सेवाओं से बड़े संतुष्ट हैं.

अनुपम खेर की कंपनी सोनाली के व्यापार को ठप करना चाहती है. इसके लिए वो गुंडो और पुलिस की मदद लेती है.

अपने मनमाफ़िक तबादले कराती है. महाराष्ट्र और दिल्ली की राजनीति में उथल-पुथल मच जाती है. क्यों ? महज़ तीन हज़ार घरों में इंटरनेट कनेक्शन हासिल करने के लिए.

उबाऊ फ़िल्म

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हाल के दिनों में बॉलीवुड में एक अच्छा चलन शुरू हुआ है. जब एक महिला किरदार फ़िल्म की हीरो होती है और खलनायकों को सबक सिखाती है. (जैसे मर्दानी, मेरी कॉम, बॉबी जासूस वगैरह).

फ़िल्म में अली फ़ज़ल भी हैं जिन्होंने सोनाली केबल के पार्टनर का रोल निभाया है.

फ़िल्म की हीरोइन रेहा चक्रबर्ती मराठी शैली में ऐसी ज़बान बोलती हैं जो मुंबई का आम आदमी कतई नहीं बोलता.

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फ़िल्म एक लो बजट है जिसे 'शोले' के रमेश सिप्पी ने प्रोड्यूस किया है.

फ़िल्म में ना तो कॉमेडी है ना ही ये रियलिस्टिक है.

निर्देशक चारुदत्त आचार्य को ना तो ये पता था कि बड़े कॉर्पोरेट हाउस कैसे काम करते है और ना ही ये पता था कि मनोरंजक फ़िल्म कैसे बनाते हैं.

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