फ़ारूक़ शेख की याद में

फ़ारूक़ शेख़ इमेज कॉपीरइट CHASHME BADDOOR

एक साल हो गया हिंदी फ़िल्मों के काबिल-ए-दाद अभिनेता फ़ारूक़ शेख़ को इस दुनिया से विदा हुए.

उनका दायरा बहुत बड़ा था और इसी वजह से उनके उम्दा व्यक्तित्व का परिचय और अनुभव काफ़ी लोगों को मिला.

27 दिसंबर 2013 के दिन जब फ़ारूक़ ने इस दुनिया को अलविदा कहा तब उन तमाम लोगों की दुनिया कुछ थम सी गई जिनकी ज़िंदगियों को उन्होंने छुआ था. उनमें मैं भी एक थी.

इमेज कॉपीरइट CHASHME BADDOOR

उनके जैसे व्यक्तित्व को लफ़्ज़ों मे बांधना आसान नहीं है. एक पत्रकार के तौर पर मेरा भी उनसे मिलना हुआ था.

दस साल पहले की वह मुलाकात कई किताबों की भेंट और एसएमएस पर बातों के ज़रिए लंबी दोस्ती में बदल गई.

पिछले साल दिसंबर में उनके घर जाने की बात और क्रिसमस की शुभकामना देते उनके वो आख़िरी मैसेज आज भी मेरे फ़ोन में सेव हैं.

फ़ारूक़ की पहली पुण्यतिथि पर कई हस्तियों ने उन्हें यूं याद किया.

दीप्ति नवल (अभिनेत्री)

इमेज कॉपीरइट CHASHME BADDOOR

फ़ारूक़ से बेहतर सह अभिनेता मिलना मुश्किल है. शूटिंग पर लगता था जैसे कोई पिकनिक मनाने आए हैं. लोगों के लिए वो शायद बहुत किताबी किस्म के इंसान रहे होंगे लेकिन उन्हें खिंचाई करने के लिए कोई मिल जाए वही बहुत था.

वो बेहद स्वाभाविक, विश्वसनीय और गंभीर किस्म के अभिनेता थे. हम दोनों कज़न्स की साथ में बड़े हुए.

वो मेरी टांग खींचा करते.

अब लगता है जैसे कोई रहा ही नहीं मेरा मज़ाक उड़ाने के लिए.

‘लिसन अमाया’ फ़िल्म में हम 20-22 बरस के बाद किसी फ़िल्मी सेट पर मिले लेकिन लगा जैसे दो हफ्तों के बाद ही मिल रहें हो.

साथ-साथ फ़िल्म में हमें बेहद गंभीर डायलॉग बोलने थे और हम उससे पहले बस हंसे जा रहे थे.

लेकिन जब वो सीन हुआ तो लगा ही नहीं कि ये वही फ़ारूक़ हैं जो थोड़ी देर पहले एकदम मज़ाकिया मूड में थे.

अनंत महादेवन (अभिनेता और निर्देशक)

इमेज कॉपीरइट CHASHME BADDOOR

मैंने, फ़ारूक़ को 'अलविदा डार्लिंग’ और ‘चमत्कार’ नाम के दो धारावाहिक में निर्देशित किया. हमने पहले साथ काम किया नहीं था लेकिन शूट के पहले दिन से ही उन्होंने मेरा बड़ा उत्साह बढ़ाया. उस दिन से लेकर आज तक हमारी दोस्ती जारी है, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि वो हमें छोड़ कर चले गए हैं.

कभी कोई सीन में वो हंसना शुरु कर देते थे तो रुकते नहीं थे. और मैं उन्हें रोकता नहीं था क्योंकि वो हंसते हुए बड़े शानदार लगते थे.

शूटिंग में कई बार लंच ब्रेक नहीं होता था तो मुझे कहते कि यार हमें ऑस्कर तो मिलने वाला नहीं फिर इतना काम क्यों कराते हो.

उन्हें खाने का बहुत शौक था. सबका निजी तौर पर ख़्याल रखते थे.

इंडस्ट्री में होने के बावजूद वह बहुत अलग थे.

उन्हें कोई दिखावे में रुचि नहीं थी. इंडस्ट्री के बाक़ी लोगों की तरह वह 'अनरियल' नहीं थे.

आज भी उनका न होना मुझे सच नहीं लगता.

अगर उन्होंने अपनी सेहत पर ज़्यादा ध्यान दिया होता तो शायद वो हमारे बीच आज भी होते.

अविनाश कुमार सिंह (निर्देशक)

इमेज कॉपीरइट pr

मेरी पहली फ़िल्म ‘लिसन अमाया’ में फ़ारूक़ साहब थे.

शुरु के पांच दिन तक शूट में वह हर सीन का लॉजिक पूछा करते थे. छोटी फ़िल्म थी और वक्त भी कम था तो तब कभी डर भी लगता था कि आधा घंटा अब समझाना पडेगा. लेकिन छठे दिन कोई सवाल नहीं आया.

बाद में उन्होंने बताया कि वो जानना चाहते थे कि हम हमारी स्क्रिप्ट के प्रति कितने प्रतिबद्ध समर्पित थे.

उनके लिए हर कोई एक समान थे. दीप्ति जी और मुझसे जिस तरह से वो बात करते उसी तरह से एक स्पॉट बॉय से भी करते.

इमेज कॉपीरइट CLUB 60

उन्हें कोई घमंड नहीं था. वह कहीं भी ऑटो में चले जाते थे.

फ़ारूक़ को शायद उन पर ही फ़िल्माए गीत 'तुमको देखा तो ये ख़्याल आया, ज़िंदगी धूम तुम घना साया' से बेहतर तरीके से याद नहीं किया जा सकता.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार