फ़िल्म रिव्यू: निशब्द कर देगी 'षमिताभ'?

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फ़िल्म: षमिताभ

निर्देशक: आर बाल्कि

कलाकार: अमिताभ बच्चन, धनुष, अक्षरा हासन

रेटिंग: ***1/2

इस फ़िल्म का हीरो या यूं कहे कि फ़िल्म के अंदर की फ़िल्म का हीरो (धनुष) गूंगा है हालांकि वो सब कुछ सुन सकता है.

एक ऐसी तकनीक ईज़ाद की जाती है जिसमें उसके कान से एक डिवाइस जोड़ी जाती है जो किसी दूसरे शख़्स की आवाज़ क़ैद कर सकती है और उस हीरो के दिमाग़ तक वो आवाज़ पहुंचाई जाती है.

अब मुझसे ना पूछें कि ये सब क्या है?

मुझे आपको ये बताने की भी कतई ज़रूरत नहीं है कि फ़िल्म की जो मूल थीम है वो असल ज़िंदगी में संभव ही नहीं है.

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लेकिन फिर एक हीरो का 10-10 गुंडों को मारकर चित करना या बदतमीज़ी कर रहे हीरो से लड़की को प्यार होना जाना भी सिर्फ़ फ़िल्मों में ही मुमकिन होता है.

तो इस पहलू पर बात ना की जाय.

फ़िल्म के निर्देशक आर बाल्कि भारत के बेहतरीन एड फ़िल्म मेकर्स में से एक हैं. फ़िल्म में खुलकर कई उत्पादों को विज्ञापन के ज़रिए प्रमोट करने की कोशिश की गई है.

मैं मानता हूं कि पैसे देकर सिनेमा हॉल गई जनता के साथ ये अन्याय है.

वैसे इस पहलू को भी चलिए नज़रअंदाज़ कर देते हैं.

दिलचस्प आइडिया

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फ़िल्म में धनुष (जिनका स्क्रीन नाम षमिताभ है ) फ़िल्म स्टार हैं जो किसी और की आवाज़ इस्तेमाल करके सुपरस्टार बने हैं.

वैसे असल ज़िंदगी में भी किसी कलाकार का किसी दूसरे की आवाज़ इस्तेमाल करने का चलन नया नहीं है.

कई सुपरहिट अभिनेत्रियों के लिए किसी और के डब करने का इतिहास पुराना है.

कुछ शब्द होते हैं जो किसी एक ख़ास शख़्सियत से जुड़ जाते हैं. जैसे हेड-बट शब्द आप सुनते हो तो मशहूर फ़ुटबॉलर ज़िनेडिन ज़िडान का नाम ज़ेहन में आता है.

फरलो शब्द जैसे संजय दत्त से जुड़ गया है. वैसे ही बैरीटोन शब्द सुनकर अमिताभ बच्चन का ही ख़्याल आता है और किसी का नहीं.

ज़बरदस्त अमिताभ

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जब फ़िल्म में षमिताभ (धनुष) छाने लगता है तब इस बूढ़े शख़्स (अमिताभ बच्चन) को ईर्ष्या होने लगती है क्योंकि उसकी आवाज़ का इस्तेमाल कर षमिताभ बड़ा स्टार बना है.

अमिताभ बच्चन हमेशा की तरह इस फ़िल्म में भी लाजवाब हैं.

लोगों के मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन आज भी फ़िल्में हैं.

फ़िल्मों को ट्रिब्यूट

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आर बाल्कि की ये फ़िल्म 'षमिताभ', पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को एक तरह का ट्रिब्यूट है.

फ़िल्में जो लोगों का मनोरंजन करती हैं. लोगों के रहन सहन, चाल-ढाल पर बड़ा प्रभाव डालती हैं और लोगों के मन में महत्वाकांक्षाएं जगाती हैं.

अमिताभ बच्चन की बेहतरीन आवाज़ को फ़िल्म का आधार बनाना एक दिलचस्प आइडिया है.

फ़िल्म के अतिशय भावुकतापूर्ण क्लाईमेक्स के बावजूद ये एक शानदार फ़िल्म बनी है.

दो घंटे से थोड़ी सी बड़ी ये फ़िल्म मनोरंजक है और अपनी थीम की वजह से बाकी बॉलीवुड फ़िल्मों से बड़ी अलग भी है.

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