'रोष दिखाएँ, गालियां दोहराना ज़रूरी नहीं'

ओम पुरी

फ़िल्म अभिनेता ओम पुरी मानते हैं कि हिन्दी फ़िल्म जगत में हमेशा ही कलाकार से ज़्यादा स्टार को प्रसिद्धि मिलती रही है.

स्टार और कलाकार की तुलना पर बीबीसी से ख़ास बात में ओम पुरी ने कहा, ''यह तो शुरू से होता आया है. मोतीलाल से ज़्यादा राजेंद्र कुमार मशहूर थे. बलराज साहनी से ज़्यादा राजेश खन्ना को तरजीह मिली.''

प्रसिद्ध अभिनेता ओम पुरी इस वक़्त अपनी नई फ़िल्म 'जय हो डेमोक्रेसी' के प्रमोशन में व्यस्त हैं.

अपने अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके ओम पुरी की पिछली कुछ फ़िल्मों में कोई बड़ा स्टार नहीं था. उनकी पिछली फ़िल्म 'डर्टी पॉलिटिक्स' में जो बड़े सितारे थे वो बीते ज़माने के थे.

इस पर ओम पुरी कहते हैं, "मैं मानता हूं कि ये फ़िल्म बिना स्टार्स की है लेकिन जो लोग इसमें काम कर रहे हैं वो कलाकार अच्छे हैं."

विश्प पटल पर किया काम

इमेज कॉपीरइट K C BOKADIA

ओम पुरी ने आगे कहा, ''इस फ़िल्म में दर्शकों के मनोरंजन का पूरा ख़याल रखा गया है. बेहतरीन कलाकार हैं, लेकिन फ़िल्म बिना स्टार्स के है. अच्छे कलाकार और स्टार्स को लेकर शुरू से ही मतभेद रहा है."

भारतीय दर्शकों की अच्छे अभिनेताओं के प्रति उदासीनता पर वो बोले, ''हमारा दर्शक वर्ग ही अलग है. मैंने और इरफ़ान ने विश्व पटल पर भारत का क़द बड़ा किया है, लेकिन हमें कॉलेज जाने वाले युवा पसंद नहीं करते. उन्हें पर्दे पर स्टार्स को देखने की आदत है.''

टीवी पर फ़िल्मी सितारों का आना अब काफ़ी होने लगा है लेकिन ओम पुरी दशकों पहले कई हिट सीरियल कर चुके हैं.

इमेज कॉपीरइट Salim Rizvi

टीवी पर वापसी के बारे में वो कहते हैं, ''इन दिनों जो चलन छोटे पर्दे का है, मैं उसका हिस्सा नहीं बन सकता. मैंने 'भारत एक खोज', 'कक्का जी कहिन' और ' तमस' जैसे धारावाहिक किए हैं. इस तरह के प्रस्ताव मिलें तो मैं अभी भी तैयार हूँ.''

अपशब्द नहीं पसंद

राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम (एनएफडीसी) के पूर्व अध्यक्ष रहे ओम पुरी फ़िल्मों में अपशब्दों के इस्तेमाल को भी सही नहीं मानते हैं.

ओम पुरी कहते हैं, "गालियों से कोई भी फ़िल्म अच्छी नहीं बन जाती. माँ-बहन की गालियां देना बिल्कुल भी जायज़ नहीं है. माना कि समाज का एक ऐसा तबका है , जो गलियां देता है. यह उसका रोष है, जो वाजिब है. लेकिन उस किरदार को निभाने वाला गलियों को दोहराए ये ज़रूरी नहीं."

ओम पुरी नहीं मानते कि अच्छी फ़िल्मों के दर्शक कम हैं. वो कहते हैं, "यदि ऐसा होता, तो 'तारे ज़मीन पर',' चक दे' और 'वेन्सडे' जैसी फ़िल्में सफल नहीं होतीं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार