धर्म संकट मेंः भाजपा सांसद की सेक्युलर फ़िल्म

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धर्म संकट

निर्देशकः फ़वाद ख़ान

एक्टरः परेश रावल, अन्नू कपूर, नसीरुद्दीन शाह

रेटिंगः ***

यह फ़िल्म अंतरधार्मिक संवेदनाओं या सहानुभूति को लेकर है. मैं धार्मिक सहिष्णुता शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा, क्योंकि यह शब्द घिस चुका है. किसी को यह किसने अधिकार दे दिया कि वह किसी के निजी धार्मिक विश्वासों को बर्दाश्त करे या न करे?

इस फ़िल्म का मुख्य क़िरदार परेश रावल अहमदाबाद में रहता है, जिसे स्थानीय लोग अमदावाद कहने के आदी हैं. 13 साल पहले यहीं पर हाल के दिनों के सबसे भयंकर साम्प्रदायिक दंगे हुए थे.

परेश रावल इसी मुद्दे पर इससे पहले आई फ़िल्म ‘ओ माई गॉड’ में भी काम कर चुके हैं.

वो अब भाजपा के सांसद हैं.

मांसाहारी, व्हिस्की पसंद करने वाला हिंदू ब्राह्मण व्यक्ति धर्मपाल मुसलमानों के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, हालांकि वो खुद बहुत कम धार्मिक है.

गुजराती बिजिनेसमैन

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धर्मपाल जी एक गुजराती बिजिनेसमैन है जो पड़ोसी वकील के साथ रहते हुए अपने पूर्वाग्रहों पर खुलकर बोलता है.

असल में वो चाहता है कि उसका मुस्लिम पड़ोसी यहां की बजाय ‘मुस्लिम मुहल्ले’ में रहे.

इस तरह का धार्मिक अलगाव भारत के बड़े शहरों में भी मौजूद है और इससे अनिवार्य रूप से दोनों समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता है.

एक दूसरे के प्रति इनकी सहानुभूति बहुत कम होती है.

लेकिन क़िस्मत भी कोई चीज होती है, धर्मपाल पैदाईशी मुसलमान जैसा बन जाता है.

अपनी उम्र की ढलान पर उसे एहसास होता है कि वो असल में एक गोद लिया हुआ बच्चा है.

उनके असली पिता मुसलमान हैं.

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अपने पिता से मिलने के लिए उन्हें धार्मिक रीति रिवाज़ों को सीखना पड़ेगा.

उसके मुस्लिम पड़ोसी ने उसे इस्लाम के बारे में सिखाया. एक दर्शक के रूप में मैंने भी वो बातें सीखीं.

लेकिन अपने बेटे के लिए धर्मपाल को हिंदू धर्म के साथ भी इसी तरह की प्रक्रिया दुहरानी पड़ती है.

क्योंकि बेटे की गर्लफ्रेंड का परिवार ‘धार्मिक टाइप’ का है.

धर्मपाल को एक बाबा को मानना पड़ता है. नसीरुद्दीन शाह ने इस बाबा का क़िरदार निभाया है, जिसके हज़ारों भक्त हैं.

मुस्लिम वकील की भूमिका

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अन्नू कपूर ने मुस्लिम वकील की भूमिका निभाई है. अन्नू कपूर ने इतनी सहज एक्टिंग की है, जो कि वो ही कर सकते हैं.

धर्मपाल के क़िरदार में वो बख़ूबी जमे हैं और पूरी फ़िल्म में उन्होंने ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है.

प्रोडक्शन के लिहाज से यह फ़िल्म अपेक्षाकृत कुछ बचकाना सी लगती है.

अंत के कुछ मिनटों में फ़िल्म के लेखक ने उपदेशों का सहारा लिया है, जबकि फ़िल्म पहले ही अपने नतीजे पर पहुंच चुकी होती है.

फिर भी यह बुरा नहीं लगता. फ़िल्म में तीन शीर्ष कलाकार आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं.

‘धर्म संकट में’ नाम इस फ़िल्म की मूल भावना को पूरी तरह दिखाने में सक्षम लगता है.

महत्वपूर्ण फ़िल्म

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यह ग़लत धारणा कि आपका धर्म संकट में हैं, अक्सर भीड़ को इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

धर्मपाल जिस तरह के पूर्वाग्रह पाले हुए है, आम भारतीय मध्यवर्ग उससे कहीं ज़्यादा पूर्वाग्रहित है और अधिकांश तो पहले ही स्वीकार कर लिए होते.

पिछले कुछ सालों में आपने इस पर ध्यान दिया होगा कि इसी तरह के पूर्वाग्रह बड़ी घटनाओं मेंतब्दील हुए हैं और ख़ासकर सोशल मीडिया में खुले तौर पर व्यक्त किए गए हैं.

फूट डालने वाले राजनेताओं को इस अविश्वास से फ़ायदा होता है.

इस तरह की मुख्य धारा फ़िल्म, शायद असहिष्णुता के प्रति हमारा सबसे संभावना सम्पन्न प्रतिरोध है.

यही तथ्य इस बात के लिए काफ़ी है कि यह फ़िल्म बहुत ही बिंदास और महत्वपूर्ण है.

मैं सलाह देता हूं कि आप यह फ़िल्म जरूर देखें.

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