फिर ज़िंदा हुईं मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर

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शुभा मुदगल, शांति हीरानंद, रीता गांगुली, पंडित अरविंद पारेख, अनीश प्रधान, भूपिंदर सिंह जैसे संगीत की दुनिया के दिग्गज जब एक मंच पर आ कर बेगम अख़्तर को याद करतें हैं तब जैसे मलिका-ए-ग़ज़ल फिर ज़िंदा हो उठती हैं.

साल 2014-2015 को बेग़म अख़्तर के जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है.

इसी की कड़ी में मुंबई के नेशनल सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स (एनसीपीए) में जाने-माने फ़नकारों और उनके करीबियों ने अपनी यादें साझा कीं.

'जितना प्रसार हो अच्छा'

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कार्यक्रम की आयोजक एनसीपीए की प्रोग्रामिंग हेड (भारतीय संगीत) डॉ. सुवर्णलता राव ने कहा, "बेगम अख़्तर के बारे में कोई एक व्यक्ति बात नहीं कर सकता, इसीलिए ऐसे लोगों का पैनल तय किया गया जो उनके जीवन, अंदाज़, संगीत को जानते हों."

शुभा मुद्गल ने कार्यक्रम की रूपरेखा खींचते हुए उन्होंने कहा, "कोई भी कलाकार अपने काम से ही जाना जाता है, बेगम अख़्तर ठुमरी, दादरा के लिए तो प्रसिद्ध हैं लेकिन उनकी ग़ज़ल गायकी का स्तर बहुत ख़ास रहा है. उनकी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम का ग़ज़लों पर प्रभाव था."

उन्होंने कहा, "इस प्रकार के कार्यक्रम के ज़रिए हम बेगम अख़्तर के जीवन के हर पहलू को लोगों तक पहुंचा सकेंगे. इंटरनेट के ज़माने में उनके संगीत का जितना प्रसार हो सके उतना अच्छा."

'मर्ज़ी की मालिक'

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लंबे अरसे तक बेगम अख़्तर से तालीम लेने वाली शांति हीरानंद ने कहा, "बँटवारे के बाद लखनऊ आना हुआ तो मैं आकाशवाणी में गाना गाने लगी. मुझे किसी ने कहा मुझे बेगम अख़्तर से गाना सीखना चाहिए. वह स्टूडियो में अक्सर आती थी लेकिन मैं उन्हें जानती नहीं थी. जब पहली बार गई उनके घर गईं तो उन्होंने पलंग के नीचे से हार्मोनियम निकाल कर मुझे कुछ गा कर सुनाने को कहा."

"मेरा भजन सुनने के बाद उन्होंने कहा अच्छा तो गाती हो, लेकिन सीखना है तो कल आ जाना. वह अपनी मर्ज़ी की मालिक थीं. जब गाना होता था गाती रहती थीं और वही प्रैक्टिस करने के लिए बोल देती थीं."

रीता गांगुली ने बताया कि वह सिद्धेश्वरी देवी के साथ संगत के लिए जाया करती थीं.

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हालांकि बेगम अख़्तर और सिद्धेश्वरी देवी के बीच कोई दोस्ताना नहीं था लेकिन बेगम अख़्तर ने उन्हें अपने साथ ग़ज़ल गाने के लिए मना ही लिया.

रीता ने ऐसे कई किस्से बताए जहां अचानक से प्रोग्राम से उठ जाने वाली बातें थीं तो अचानक गायकी की रेन्ज बदलने की यादें भी.

राजदरबार की महफ़िलें

पंडित अरविंद पारिख ने वो दिन याद किए जब बेगम अख़्तर उनके पास सितार सीखने आती थीं.

ग़ज़लकार भूपिंदर सिंह और घनशाम वासवानी ने कहा कि बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल गायकी को सरल रखा और उनकी अदायगी की विशेषताओं की चर्चा की.

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कार्यक्रम के दूसरे दौर में जावेद अख़्तर ने ग़ज़ल के मत्ले, रदीफ़ और काफ़िए की तकनीकी बारीकियों के बारे में बात की.

अपने पिता जां निसार अख़्तर और शायर कैफ़ी आज़मी की बेगम अख़्तर के साथ जुड़ी यादें भी जावेद अख़्तर ने साझा कीं.

यहीं मालूम चला कि बेगम अख़्तर की मौसिकी के कुछ पन्ने अयोध्या राजदरबार की महफ़िलों से जुड़े हैं. उन पर रोशनी डालने के लिए अयोध्या के राजसी परिवार के यतीन्द्र मिश्रा वहाँ पर मौजूद थे.

कार्यक्रम के अंत में बेगम अख़्तर पर दस्तावेजी फ़िल्म और उनकी पुराने रिकॉर्डिंग्स दिखाई गई.

मुंबई के खटाऊ वल्लभदास परिवार ने 1942 में बेगम अख़्तर की बैठक रखी थी जिनमें गाए गए 18 रिकार्डिंग्स एनसीपीए को दी गई हैं. इसकी घोषणा भी इस कार्यक्रम में की गई.

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