वर्ल्ड जैज़ डे: बॉलीवुड से भी जुड़े हैं जैज़ के तार

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1960 की फ़िल्म दिल अपना और प्रीत परायी का गाना "अजीब दास्तां है ये", 1954 की फ़िल्म आर पार का गाना "बाबूजी धीरे चलना" और 1952 में आई भागम भाग फ़िल्म का गाना "छोड़ चले झूठी दुनिया को" इन तीनो गानों में एक समानता थी और वो ये कि ये तीनों ही गीत " जैज़ " संगीत पर आधारित थे

आज अंतराष्ट्रीय जैज़ दिवस के मौके पर बीबीसी लाया है जैज़ संगीत से जुड़े कुछ रोचक पहलू

जैज़ का जन्म

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जैज़ पर खास किताब लिखने वाले भारतीय लेखक नरेश फर्नांडिस ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में बताया की बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अमेरिका के न्यू ओर्लिन शहर में जैज़ संगीत का जन्म हुआ.

उस दौर में अमरीका के अंदर अफ्रीका से कई मज़दूर लाए गए थे जिनका ढोलक बजाने का अनोखे तरीके ने पारंपरिक कैरिबियन संगीत जैज़ को जन्म दिया.

जैज़" ग्रामोफ़ोन के इजाद के समय आया और पूरे विश्व में फ़ैल गया. भारत में जैज़" 1920 के करीब आया.

नागेश फर्नांडिस बताते हैं, "भारतीय हमेशा से ही अलग अलग संगीत के चाहने वाले रहे हैं और जब जैज़" दुनिया में छा रहा था उसी वक़्त भारत में जैज़ " संगीतकार आकर अपनी कला प्रदर्शन करने लगे."

बॉलीवुड में जैज़"

बॉलीवुड संगीत की खासियत ये है की हर दौर के हिसाब से बदलते संगीत को बॉलीवुड अपने अंदर ढाल लेता है फिर चाहे आज के दौर का हिप हॉप संगीत हो या 1960 का जैज़" संगीत.

संगीतकार शंकर जयकिशन, ओ पी नय्यर, आर डी बर्मन ने अपने फिल्मों में जैज़" संगीत का बखूबी इस्तेमाल किया.

गीतकार मोहम्मद रफ़ी एक जैज़" गायक थे और कोंकणी में जैज़" गीत गाते थे.

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संगीत समीक्षक राजीव विजयकर ने बताया की "उस दौर के जितने भी फ़िल्मो में क्लब गाने होते थे वो जैज़" गाने ही होते थे. शम्मी कपूर साहब संगीत के ज्ञानी थे और जैज़" बहुत सुना करते थे और अपने फ़िल्मो के संगीतकरो से जैज़" संगीत की मांग किया करते थे."

लेखक नरेश फर्नांडिस ने बताया की उस दौर के कई संगीतकार शाम के समय बॉम्बे के होटलों में और दिन के समय फ़िल्मो में जैज़" बजाया करते थे. अपने ज़माने की मशहूर डांसर हेलन के कई क्लब गाने के पीछे गाने बजाने वाले अक्सर जैज़" संगीतकार ही हुआ करते थे.

भारतीय जैज़" संगीतकार

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ग्रैमी अवॉर्ड और कई अंतराष्ट्रीय अवॉर्ड के विजेता रह चुके जैज़" तलवादक त्रिलोक गुर्टू ने 12 साल की उम्र से अपने करियर की शुरूआत कर संगीत को अपने 40 से भी अधिक साल दिए है.

जर्मनी में बसे त्रिलोक गुर्टू ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में अपने सफर को ब्यान करते हुए कहा " जैज़ संगीत उस समय पारसी और ईसाई बहुत सुनते थे. जैज़" अमीरों का शौक माना जाता था. हम जैसो के लिए जैज़" रिकार्ड्स सुनने के लिए बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ता था. संगीत का वैसे कोई नाम नहीं होता जैज़" नाम तो सिर्फ बेचने के लिए है."

त्रिलोक गुर्टू आगे कहते हैं की उनके संगीत को हिंदुस्तानी समझ नहीं पाते थे और सिर्फ पंचम दा यानि आर डी बर्मन ने उनके संगीत को समझा.

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अंतरष्ट्रीय मंच पर भारत के पश्चिमी संगीत के संगीतकार गेरी लॉयर ने जैज़" संगीत में भारत की ओर से अपना योगदान किया है. 1980 के दशक से गेरी ने अब तक सफल पांच एल्बम बनाये है जिनमे कई जैज़" गाने शामिल है.

अपनी अगली एल्बम "हेवेन्स चाइल्ड" पर काम कर रहे गेरी लॉयर ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में अफसोस जताया की "पश्चिमी संगीत भारत में हमेशा से ही उपेक्षित रहा है पर मुझे इस बात की ख़ुशी है की आज भी कई दर्शक है जिन्हे हमारे संगीत दिलचस्पी है"

जैज़" का पतन

लेखक नरेश फर्नांडिस कहते हैं, "लोग वही सुनते है जो लोकप्रिय होता है. 50 के दशक में जैज़ बहुत लोकप्रिय था फिर रॉक एंड रॉल ने जैज़ की जगह ले ली."

जैज़ गायिका सोनिया सैगल का कहना है की विश्व के विभिन्न संगीतों को भारत के शिक्षा प्रणाली में जगह देनी चाहिए, इससे आने वाली पीढ़ी हर तरह के संगीत के बारे में जानेगी और समझेगी.

60 के दशक की फ़िल्म लेकर अनुराग कश्यप अपनी नयी फ़िल्म "बॉम्बे वेलवेट" में जैज़ संगीत को बॉलीवुड में दोबारा जीवित करने की कोशिश कर रहे है.

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