'पीकू पर आपका दिल आ जाएगा ...'

अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण, इरफ़ान ख़ान इमेज कॉपीरइट Raindrop Media

पीकू

निर्देशकः शूजित सरकार

कलाकारः दीपिका पादुकोण, अमिताभ बच्चन, इरफ़ान ख़ान

रेटिंगः ****

ये फ़िल्म पारिवारिक गड़बड़ झालों पर बनी सच्ची कॉमेडी है. अमरीका में अप्रचलित विषयों पर इस तरह की कटाक्ष करने वाली फ़िल्में अक्सर बनती हैं.

आप में से बहुतों ने 'लिटिल मिस सनशाइन' या 'माई बिग फ़ैट गीक वेडिंग' जैसी फ़िल्में देखी होंगी.

आप आम भद्रलोकनुमा बंगाली परिवार या उस जैसे किसी भारतीय परिवार के बारे में जो सोचते होंगे, ये फ़िल्म उससे काफ़ी अलग है.

ये दक्षिणी दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहने वाले एक प्रवासी बंगाली परिवार की कहानी है.

ख़ुद्दार लेकिन थोड़ा लिजलिजा पिता (अमिताभ बच्चन) नहीं चाहता कि उसकी 30 साल की बेटी (दीपिका पादुकोण) कभी शादी करे. उसकी इस सोच के पीछे जो भी कारण हैं उनसे वो कुछ ज़्यााद ही स्वार्थी प्रतीत होता है. वो चाहता है कि उसकी बेटी बस उसके साथ रहे.

वो अपनी बेटी के संभावित ब्वॉयफ्रेंड को भड़काने के लिए उससे यहाँ तक कह देता है कि उसकी बेटी अब वर्जिन (कुंवारी) नहीं है.

बंगाली समाज का चित्रण

इमेज कॉपीरइट Every Media PR

लड़की की माँ की मौत हो चुकी है. ये बताने के लिए फ़िल्म में किसी परपंरागत मातम या श्रद्धाजंलि का सहारा लेने की बजाय हल्के-फुल्के ढंग से ज़ाहिर किया गया है. परिवार में आने वाले अंकल-आंटियों और फेमली फ्रेंडों का अपना-अपना ख़ास रंग-ढंग है.

फ़िल्म का नाम बेटी के नाम पर ही रखा गया है. जी हाँ, इस फ़िल्म में ख़ूबसूरत दीपिका पादुकोण का नाम 'पीकू' है. ये कोई हैरान होने वाली बात नहीं है.

पंजाबियों की तरह बंगाली भी अपने बच्चों के जन्म के समय उनके घरेलू नाम (जैसे पूपू, बाबला, किनकिनी आदि) रखने के लिए जाने जाते हैं. ये अजीबो ग़रीब नाम इन बच्चों से जीवन भर चिपके रहते हैं.

इस फ़िल्म में बंगाली समाज की आदतों को अपने अंदाज़ में चित्रित करने की कोशिश की गई है. वो आदत है, पेट साफ़ होने को लेकर कुछ ज़्यादा ही चिंतित रहना. 'टॉयलेट ह्यूमर' यानी शौच से जुड़ी हुए हंसी मज़ाक़ पर भी फ़िल्म में ज़ोर है.

रोड मूवी

इमेज कॉपीरइट Every Media PR

बहुत से बंगालियों का अंग्रेजों के रहन-सहन से गहरा प्यार जगजाहिर है. पेट साफ होने के ऑब्सेशन पर मज़ाक इस फ़िल्म के केंद्र में है, कई बार तो लगता है कि कुछ ज़्यादा ही हो रहा है.

फ़िल्म में पिता का पेट साफ होगा या नहीं उसका पूरा दिन इसी बात पर निर्भर होता है. उसे हमेशा भ्रम रहता है कि उसे कब्ज़ है.

इस बुज़ुर्ग की दूसरी समस्या है कि वो ट्रेन या हवाईजहाज़ से सफ़र नहीं कर पाते. उसे अपने होमटाउन कोलकाता की बहुत याद आती है. यानी वो कोलकाता बस सड़क के रास्ते से जा सकते हैं.

इस तरह ये एक रोड मूवी है जो दिल्ली और कोलकाता जाने के 1500 किलोमीटर के सफ़र के दौरान भारत के नेशनल हाईवे पर घटित होती है.

इस सफ़र में पिता और बेटी के साथ हैं उनके घरेलू नौकर और टैक्सी कंपनी का मालिक (इरफ़ान ख़ान) जो इस बात पर हैरान है कि वो इस लफड़े में फंसा कैसे?

कमाल का लेखन

इमेज कॉपीरइट Every Media PR

रुपहले पर्दे पर इससे पहले कुछ चरित्रों को प्यार की तलाश में रोड ट्रिप पर निकलते हुए मैंने होमी अदजानिया की फ़िल्म फाइंडिंग फ़ैनी (2014) में देखा था.

इस फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह और पंकज कपूर मुख्य भूमिका में थे और उनके साथ थीं दीपिका पादुकोण जो इस फ़िल्म में भी हैं.

फ़ाइंडिंग फ़ैनी अंग्रेजी में थी और ऐसा लगता है कि पीकू बांग्ला में बनती तो बेहतर होता. अपने चुटकुलों, खिलंदड़पने और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की छोटी-छोटी ख़ुशियों के मामले में एक जैसी होती हुई भी पीकू, फाइंडिंग फ़ैनी से काफ़ी अलग है.

बतौर लेखक जूही चतुर्वेदी की यह दूसरी फ़िल्म है. उनकी पहली फ़िल्म थी अपनी तरह की अलग जबरदस्त कॉमेडी फ़िल्म विक्की डोनर. फ़िल्म के निर्देशक शूजित सरकार भी अपने सहज और सरल निर्देशन के लिए बधाई के पात्र हैं.

इमेज कॉपीरइट Every Media PR

फ़िल्म क्राफ्ट पर शूजित की पकड़ काफ़ी मज़बूत है. वो फ़िल्म की कहानी और पात्रों को दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करने देते हैं.

निर्देशक के रूप में ये उनकी चौथी फ़िल्म है. इससे पहले वो यहाँ (कश्मीर में चरमपंथ पर), मद्रास कैफ़ै (राजीव गांधी की हत्या पर) और विक्की डोनर (स्पर्म डोनेशन पर) बना चुके हैं.

अमिताभ की उम्र

इस फ़िल्म के साथ ही शूजित ने ख़ुद को एक बहुआयामी निर्देशक के रूप में मज़बूती से स्थापित कर लिया है.

मैंने अभी तक फ़िल्म के मुख्य चरित्र भास्कर की भूमिका निभाने वाले अमिताभ बच्चन के बारे में कुछ कहा ही नहीं. उनकी पिछली फ़िल्म आर बाल्की की 'शमिताभ' एक मौलिक फ़िल्म थी लेकिन उसकी उतनी तारीफ़ नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी.

72 साल की उम्र में वो अपने करियर के सबसे रचनात्मक दौर से गुज़र रहे हैं. फ़िल्म से इसी एक विषय पर मुझे शिकायत है. फ़िल्म के मुख्य चरित्र की उम्र भी लगभग उतनी ही है जितनी अमिताभ की. हालांकि फ़िल्म में वो थोड़ा थकाऊ, तोंदू, सठियाया हुआ, कमज़ोर और स्वार्थी है.

इमेज कॉपीरइट Raindrop media

70 को अब नया 50 माना जाने लगा है. ख़ुद बच्चन इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं. उनकी उम्र फ़ि्ल्म में थोड़ी ज़्यादा दिखाई जाती तो बेहतर होता.

दीपिका का टूथपेस्ट वाला सीन

अमिताभ बच्चन ने हृषिकेश मुखर्जी की क्लासिक फ़िल्म आनंद (1971) में भी भास्कर नामक बंगाली चरित्र की भूमिका निभाई थी. कुछ साल पहले उन्होंने रितुपर्णो घोष की शेक्सपियर के नाटक पर आधारित फ़िल्म द लास्ट लियर (2007) में भी एक बंगाली चरित्र निभाया था.

मुझे किसी ने बताया कि वो चरित्र कुछ कुछ प्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त पर आधारित था. हालांकि बच्चन के स्तर को देखते हुए वो भूमिका उतनी संतोषजनक नहीं रही थी.

लेकिन इस बार उन्होंने एक खिसियाए हुए बंगाली बुज़ूर्ग के चरित्र को बखूबी पकड़ा है. उनका बड़बोला चरित्र, दीपिका और इरफ़ान के शांत किरदार के उलट कहानी को सटीक संतुलन देता है. और आँखों से अभिनय करने के मामले में बच्चन से बेहतर भला कौन हो सकता है.

इमेज कॉपीरइट Raindrop Media

अगर दीपिका की बात की जाए तो उनके हाथों में टूथपेस्ट और होंठों पर उसकी झाग मेरा दिल ले गए.

मैं जो कह रहा हूँ उसे समझने के लिए आपको फ़िल्म में वो सीन देखना होगा जब इरफ़ान ख़ान आधी रात को उनके घर आते हैं और वो कुछ इस हालत में दरवाज़ा खोलती हैं.

मेरी दो टूक राय तो ये है कि आप फ़िल्म ज़रूर देखें. इस कॉमेडी फ़िल्म को देखकर मैं थोड़ा भावुक भी हो गया कि हम अपने रोज़मर्रा के जीवन में अपने बड़े-बूढ़ों की कैसे उपेक्षा करते हैं. उन्हें वाजिब तवज्जो नहीं देते.

बढ़ती उम्र से उपजी उनकी अजीब आदतों के संग कितनी असहनशील और अधैर्य होकर पेश आते हैं. भगवान जाने वो कब हमारे बीच से चले जाएँ और हम उनकी कमी हमेशा खलती रहे!

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार