खिलाड़ियों से मिल रहे इन्हें जूते चप्पल

किसी ज़माने में एथलीट रहे श्रीयांस भण्डारी और रमेश धामी अभ्यास के लिए साल में चार से पाँच जोड़ी महंगे स्पोर्ट्स शूज ख़रीदा करते थे. लेकिन कुछ दिनों में जूते ख़राब हो जाते और फेंकने पड़ते और ये उन्हें ये मलाल रहता कि इतने मंहगे जूते किसी और के काम भी नहीं आ पाएंगे.

फिर उन्होंने ऐसे ख़राब जूतों को ज़रूरत मंदो को देने का फ़ैसला लिया और आज ये दोनों दोस्त मुंबई में मौजूद बहुत सारे ज़रूरतमंदों को जूते पहना रहे हैं.

दोस्तों का कारनामा

22 साल के मैनजमेंट विद्यार्थी श्रीयांस भण्डारी और मित्र रमेश धामी ने मिलकर 'ग्रीन सोल' के नाम से शूज़ की रिसाईकलिंग की शुरूआत कर दी.

उन्होंने पाया कि विश्व में 25 करोड़ जूते हर साल मामूली से कटने फटने पर फ़ेंक दिए जाते हैं. दूसरी तरफ़ 120 करोड़ लोग बिना जूते-चप्पलों के रहने को मजबूर हैं.

इकोफ़्रेंडली जूते

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श्रीयांस बताते हैं, "स्पोर्ट्स शूज प्राकृतिक रूप से नष्ट नहीं होते और इन्हें बनाने में रासायनिक विधि लगती है ऐसे में इन्हें नष्ट करने के लिए जलाने से पर्यावरण को भी काफ़ी नुकसान होता है."

श्रीयांस ने बताया, "ज़्यादातर स्पोर्ट्स शूज साइड और ऊपर से फट जाते हैं लेकिन इन महंगे जूतों के नीचे का सोल बहुत मजबूत होता हैं और इस लिए हम उस सोल को काट कर अलग कर लेते हैं और फिर उस में एक नया डिज़ाइन करते हैं."

डिज़ाईनिंग का काम करने वाले रमेश कहते हैं, "मैंने जब स्पोर्ट्स शूज का सोल निकाल कर कुछ कारीगिरी करता हूँ और उसे पहन कर लोगों के बीच जाता हूँ तो लोग मुझे देख खूब हँसते, मोची कहते लेकिन वहीं कुछ लोग इन चप्पलों की तारीफ़ भी करते हैं."

शुरूआत में मज़ाक का पात्र बने 'ग्रीन सोल' को अब कई पुरुस्कार मिल चुके हैं और आई आई टी मुंबई द्वारा आयोजित एक प्रतियोगिता में पूरे एशिया से आई 7 हज़ार टीमों में 'ग्रीन सोल' ने पहला स्थान पाया और इनाम में 3 लाख रूपये मिले.

अब आगे

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श्रीयांस ने बताया कि अब मुंबई में लोग उन्हें पहचान रहे हैं और अलग अलग स्कूलों, स्पोर्ट्स क्लब और कॉलेजों के बाहर लगे ग्रीन सोल के बड़े बड़े डिब्बों में लोग अपने फटे जूते डाल देते हैं.

श्रीयांस भण्डारी कहते हैं, "अब हम इस काम के लिए कई जानी मानी हस्तियों को भी जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं. हम अनिल अंबानी, युवराज सिंह, नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा से भी संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि हम इनसे पहले भी मिल चुके हैं और इस बार उनसे उनके जूतों की मांग कर उसे इकोफ्रैंडली चप्पल का रूप देने का हमारा विचार है."

इन हस्तियों कि चप्पलों या जूतों कि 'ग्रीन सोल' बोली लगाना चाहते हैं ताकि जो पैसा आए उससे कई गाँवों में मौजूद ज़रूरतमंद लोगों तक ये इकोफ्रैंडली चप्पल पहुंच सकें.

वैसे सिर्फ़ ज़रूरतमंद ही नहीं कई नौजवान लोग भी इन चप्पल को कूल मानते हैं और उसकी डिमांड कर रहे हैं लेकिन फ़िलहाल 'ग्रीन सोल' का ध्यान ज़रूरतमंदो की ओर है.

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