अनंत संघर्ष की कहानी: गौर हरी दास्तान

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गौर हरी दास को ख़ुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में तीस से अधिक साल लग गए थे.

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए साल 1976 में आवेदन दिया था जो उन्हें 33 साल बाद 2009 में मिला.

इन 33 सालों में वे जिन संघर्षों से गुज़रे निर्देशक अनंत महादेवन ने उन्हें "गौर हरी दास्तान- द फ़्रीडम फ़ाइल" फ़िल्म की शक्ल में ढाला है.

ये फिल्म अगस्त में सिनेमाघरों में होगी.

मूक संघर्ष

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"गौर हरी दास्तान- द फ़्रीडम फ़ाइल" में अभिनय किया है विनय पाठक और कोंकणा सेन शर्मा ने.

फ़िल्म समारोहों में प्रशंसा बटोर रही इस फ़िल्म के लिए पेरिस फ़िल्म उत्सव में विनय पाठक को अवॉर्ड भी मिला है.

गौर हरी के संघर्ष के बारे में निर्देशक अनंत महादेवन कहते हैं, "उन्होंने तीस साल तक अपने सिद्धांतों को क़ायम रखते हुए मौन युद्ध जारी रखा."

महादेवन बताते हैं, " फ़िल्म में हमने सरकारी दफ़्तरों में फ़ाइलें भेजने की उनकी जद्दोजहद को दिखाया है. इसीलिए इसे फ़्रीडम फ़ाइल नाम दिया गया है."

स्वतंत्रता संग्राम

85 साल के गौर हरी दास पांच साल तक स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहे.

वे छिपकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े साहित्य और संदेशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे.

ओडिशा में पैदा हुए गौर हरि दास तेरह भाई-बहनों में दूसरे बेटे थे. उनके पिता भी गाँधीवादी थे और उनसे ही उन्हें आंदोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली.

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साल 1945 में उन्होंने अंग्रेज़ों के आदेश के ख़िलाफ़ भारत का झंडा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े.

गांधी विचारधारा से जुड़े रहे गौर हरी ने 'ख़ादी ग्रामोद्योग आयोग' में लंबे अरसे तक काम किया.

प्रमाण पत्र की कहानी

दरअसल गौर हरी के बेटे को इंजीनियरिंग में दाख़िला चाहिए था. पिता के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमाण पत्र से बेटे को सीट मिल जाती.

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बेटे के दाख़िले में ज़रूरत पड़ने पर उन्होंने प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दिया जो तीन दशक लंबे संघर्ष में बदल गया.

बेटे को तो प्रतिभा के आधार पर आईआईटी मुंबई में प्रवेश मिल गया लेकिन गौर हरि अपनी पहचान से वंचित रह गए.

वे तीन दशकों तक ज़िलाधिकारी से लेकर मंत्रालयों तक के चक्कर काटते रहे.

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न कोई नारेबाज़ी की ना कोई धरना दिया, बस अपनी फ़ाइलें लिए एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर भटकते रहे. आखिर में उन्हें साल 2009 में प्रमाण पत्र मिला.

लेकिन इस दौरान वो बुढ़ापा जो उन्हें अपने बच्चों के साथ काटना चाहिए था संघर्ष में बदल गया.

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