फ़िल्म समीक्षाः वेलकम टू कराची

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फ़िल्मः वेलकम 2 कराची

डायरेक्टरः आशीष आर मोहन

अभिनेताः अरशद वारसी, जैकी भगनानी

रेटिंगः *1/2

जब मैं थिएटर जा रहा था तो रास्ते में मैंने विकीपीडिया पर देखा कि ये फ़िल्म हॉलीवुड की फ़िल्म 'डम्ब एंड डम्बर' का रीमेक है. विकीपीडिया पर बहुत ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन आजकल हमारे प्राइमरी रिसर्च का जरिया यही है.

आपके दिमाग़ को सुन्न कर देने वाली ये फ़िल्म इसी हद तक डम्ब एंड डम्बर से मिलती है कि इसके दो लीड कैरेक्टरों में से एक(जैकी भगनानी) कुछ ऐसा बरताव करता है कि वो दूसरे(अरशद वारसी) से ज़्यादा ठस दिमाग़ नज़र आता है. ये फ़िल्म ख़ुद भी बेहद ठस है, जैसी कि इसकी मंशा रही होगी.

गुजरात से कराची

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फ़िल्म के दोनों हीरो शादी के लिए किराए पर लिए गए एक आलीशान यॉट को बचाने में लगे हैं. उम्मीद के मुताबिक वो इसका प्रयोग बिकनी पहनी हुई गोरियों के संग 'आयटम सॉन्ग' के लिए करते हैं.

तभी एक तूफ़ान आता है. सभी लड़कियाँ अचानक गायब हो जाती हैं. सटीक जानकारी देनी हो तो कहा जा सकता है कि दोनों हीरो गुजरात के जामनगर में एक लाइनर पर सवार होते हैं और कराची के एक समुद्र तट पर पहुँच जाते हैं.

दिली इच्छा के बावजूद मैं कभी कराची नहीं जा सका हूँ. मैंने सुना है कि वो कुछ-कुछ मुंबई जैसा है. समुद्र के किनारे बसा विरोधाभासों वाला कारोबारी शहर.

कुछ वैसे ही जैसे लाहौर कुछ-कुछ दिल्ली जैसा है, चारों तरफ़ ज़मीन से घिर हुआ, बड़ी संख्या में पंजाबियों की मौजूदगी और परतदार सत्ता केंद्रों वाला शहर.

आलू के भाव गोलियाँ

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फ़िल्म के प्रोड्यूसर वासू भगनानी सिंधी हैं. उनके बेटे जैकी फ़िल्म में हीरो हैं.

फ़िल्म निर्माता की कल्पना है कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत की राजधानी कराची में किसी विश्व युद्ध की बिसात बिछी हुई है जहाँ इसराइली, फ़लस्तीनी, रूसी, यूक्रेनी, अमरीकी, इराक़ी और चीनी एक-दूसरे पर गोलियाँ बरसा रहे हैं.

जाहिर है यहाँ गोलियाँ 'आलू के भाव' बिकती हैं. इसी गोलीबारी के बीच हमारे दो गुजराती हीरो जा फंसे हैं.

दोनों हीरो पाकिस्तान में तालिबान, आईएसआई, पाकिस्तानी सरकार और अमरीकी फ़ौजों के बीच चल रहे सत्ता के खेल में शामिल हो जाते हैं. ये कैसे होता है ये जानने के लिए आपको इस फ़िल्म को ख़ुद बर्दाश्त करना होगा.

कुछ इसी तरह की कहानी पर ज़्यादा विश्वनीय कॉमेडी फ़िल्म थी कबीर ख़ान की 'काबुल एक्सप्रेस' जिसमें अरशद वारसी ही हीरो थे.

इस फ़िल्म की तुलना कुछ हद तक 'ट्रापिक थंडर' या 'द इंटरव्यू' से की जा सकती है.

वो जमाना और था

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इस फ़िल्म में एक-दो सीन ऐसे हैं जिन्हें पैसा-वसूल कहा जा सकता है.

बाकी अमीर बाप की दो नालायक औलादों टाइप इस कॉमेडी में आपको गोविंदा जैसे विलक्षण अभिनेता की कमी महसूस होगी, जो ऐसी कहानियों को पागलपन की एक अलग सीमा तक ले जाते थे.

ये महज संयोग ही है कि गोविंदा की कूली नंबर-1, हीरो नंबर-1, बीवी नंबर-1 जैसी फ़िल्मों के प्रोड्यूसर वासू भगनानी ही थे. ख़ैर, वो कुछ और ही दिन थे.

यहाँ तक कि मैंने हाल ही में 'डम्ब एंड डम्बर टू' देखी थी लेकिन इसमें भी जिम कैरी के होने के बावजूद ये पहली वाली जैसी नहीं थी.

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