हमारी अधूरी कहानी: दर्द भरी पुरानी कहानी

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फ़िल्म: हमारी अधूरी कहानी

निर्देशक: मोहित सूरी

कलाकार: इमरान हाशमी, विद्या बालन, राजकुमार राव

रेटिंग: *1/2

कहानी एकतरफ़ा प्यार की है, जो बहुत से लोगों को जोड़ती है (महिला हो या पुरुष). ये शायद ज़्यादातर रूढ़िवादी समाजों में जीवन को दिखाती है. आप समझ सकते हैं कि क्यों हमारी '"मुख्यधारा" की फ़िल्मों में ये विषय दिखाई देता है. हमारे गानों के बोल में भी.

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इस फ़िल्म में हर भाव बेदम और बेस्वाद है, शायद इसलिए क्योंकि इसमें लंबे-लंबे डायलॉग हैं. एक समय के बाद इतनी ज़्यादा बातें झेलना मुश्किल हो जाता है. जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है वो “दूरदर्शन वाली” (नेशनल नेटवर्क और उर्दू, दोनों) है. सीन इतने शांत से हैं इसलिए बहुत ज़्यादा ड्रामा कर्कश लगता है.

कहानी

फ़िल्म का टोन लगातार उदास बना रहता है. हीरो (इमरान हाशमी) भी उदास ही रहता है. उसे होटल की फ़्लोरिस्ट (विद्या बालन) से प्यार हो जाता है. वो भी प्यार जताती है. अब मुझे तो कभी अपने होटल की फ़्लोरिस्ट नहीं दिखाई दी, उससे बातचीत तो दूर की बात है. सच कहूं तो, मैं आज तक किसी होटल के प्रेज़िडेंशियल सूइट में नहीं ठहरा.

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हीरो बड़ा उद्योगपति है. उसकी कहानी फ़र्श से अर्श तक पहुंचने की है. वो हमेशा सफ़र करता रहता है. आपको इस बात पर कभी कभार हंसी आ सकती है कि उसका सूटबूट पहना साथी हमेशा उसे अगली फ़्लाइट की याद दिलाता रहता है

हीरोइन की शादी हो चुकी है, एक बच्चा भी है. हालांकि उसका पति (राजकुमार राव) ज़्यादातर समय गायब ही रहता है. वो एक संदिग्ध “आतंकवादी” है.

संगीत पर ज़ोर

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कुल मिलाकर ये पुरानी तरह की “दर्द भरी दास्तान” किस्म की फ़िल्म है जिसके गाने आप सिगरेट पीते हुए गुनगुना सकते हैं. कुछ वैसी ही जैसी मोहित सूरी की आशिकी-2 थी, उसे भी महेश/मुकेश भट्ट ने प्रोड्यूस किया था.

आशिकी-2 साल 2013 की सबसे बड़ी हिट थी. मुझे उनकी 'वो लम्हे' पसंद आई थी हालांकि बताते हैं कि बॉक्स ऑफ़िस पर उसका हाल उतना अच्छा नहीं रहा था.

उनकी आख़िरी फ़िल्म 'एक विलेन' को बड़ी कामयाबी मिली थी.

इस बार भी उनका एक तीर निशाने पर लगा है: कम से कम एक भावुक कर देने वाला गाना है, जो जनता को पसंद आए (फ़िल्म का टाइटल ट्रैक - हमारी अधूरी कहानी). मुझे वो गाना यूट्यूब पर बार-बार सुनना पसंद है.

फ़िल्म कैसी है?

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इस फ़िल्म का असली ड्रामा शायद दूसरे हाफ़ में ही शुरू होता है, जब आधी से ज़्यादा फ़िल्म से आप बोर हो चुके होते हैं.

गायब पति लौट आता है. लव ट्राएंगल पूरा होता है. हालांकि ग्रे शेड्स नहीं हैं. पितृसत्तात्मक रवैया भी है. धर्म दूसरे कोने में दिखता है.…

जो लोग बॉक्स ऑफ़िस पर नज़र रखते हैं वो जानते हैं कि फ़िल्म किन्हें ध्यान में रखकर बनाई गई है: छोटे शहर, सिंगल स्क्रीन सिनेमा, तीस पार की महिलाएं, आशिकी-2 पसंद करने वाली जनता….

आप हिसाब लगा लीजिए. मुझे तो ये फ़िल्म बेशक नहीं छू सकी.

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