ट्रेंड में हैं किताबों के ट्रेलर

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एक वक़्त था जब क़िताब की मार्केटिंग के लिए लेखक के साथ संवाद या फिर क़िताब के कुछ पन्नों का पाठन हुआ करता था.

लेकिन अब किताबों के लिए भी फ़िल्मों की तरह ऑडियो विज़ुअल ट्रेलर बन रहे हैं.

ट्रेलर

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विदेशों बुक ट्रेलर्स का ट्रेंड पुराना है लेकिन भारत में इस ट्रेंड की शुरूआत हुई ‘इममोर्टल्स ऑफ़ मेलूहा’ से.

इस किताब के लेखक अमीश त्रिपाठी ने बीबीसी को बताया, "मेरी क़िताब के लिए बुक ट्रेलर का सुझाव दोस्त अभिजीत पोडवाल ने दिया और कम बजट में बने ट्रेलर को अच्छी प्रतिक्रिया मिली."

अमीश के अनुसार किसी किताब का विषय जितना नाटकीय होगा उतना ही रोमांचक उसका ट्रेलर हो सकता है.

ट्रेलर का बाज़ार

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किताब के विमोचन से पहले इन ट्रेलर को बनाने के लिए लेखक का साथ प्रकाशक भी देते हैं.

हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स की सीनियर मार्केटिंग मैनेजर अमृता तलवार का कहना है, "ट्रेलर क़िताब की एक झलक है और आज अगर पांच क़िताबें प्रकाशित हो रही हैं तो उन में से तीन के ट्रेलर बन रहे हैं."

अमृता के अनुसार, "लेखक का वीडियो, एनिमेटेड ट्रेलर या मूवी जैसे ट्रेलर बनते हैं जिनमें तीस हज़ार से ले कर चार लाख का खर्च हो सकता हैं."

बाज़ार विशेषज्ञों के मुताबिक इस माध्यम से 'नॉन बुक रीडर्स' भी क़िताब के प्रति आकर्षित होंगे.

ब्रांड वैल्यू

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बेस्टसेलर किताब ‘द कृष्णा की’ के लेखक अश्विन सांघी ने बीबीसी को बताया, "मेरी पहली क़िताब रोज़ाबल लाइन को प्रमोट करने के लिए 5-10 हज़ार में बनाए गए ट्रेलर को एक हफ़्ते में ही तीन हज़ार व्यूज़ मिले थे."

इससे प्रेरित होकर अश्विन ने अपनी अगली किताब 'चाणक्याज़ चैंट' के लिए भी ट्रेलर बनाने का सुझाव दिया.

अश्विन के अनुसार, "ट्रेलर से लोगों में दिलचस्पी पैदा होती है और जो लोगों ने देखा है वो उन्हें बुक स्टोर में दिखता है तो ज़ाहिर है कि आपकी किताब की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है."

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वहीं अमीश कहते हैं, "लेखन खत्म होने के बाद मैं क़िताब की मार्केटिंग में रुचि लेता हूं लेकिन हर क़िताब के लिए ट्रेलर हो ऐसा ज़रूरी नहीं है."

वैसे अमीश की आने वाली क़िताब ‘इक्ष्वाकु के वंशज’ का ट्रेलर काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है और ये बात सही है कि सोशल मीडिया के इस दौर में ट्रेलर्स क़िताब की लोकप्रियता बढ़ाते हैं लेकिन इनकी वजह से क़िताबों की बिक्री बढ़ती है ये कहना मुश्किल है.

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