फ़िल्म रिव्यू : कैसी है वरुण-श्रद्धा की एबीसीडी 2

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फ़िल्म: एबीसीडी 2

निर्देशक: रेमो

कलाकार: वरुण धवन, श्रद्धा कपूर

रेटिंग: *1/2

2013 में आई फ़िल्म एबीसीडी ने लोगों ने काफ़ी हैरान किया था और ये काफ़ी पसंद भी की गई थी. वो भी डांस पर आधारित फ़िल्म थी.

वैसे तो बॉलीवुड की ज़्यादातर फ़िल्में एक तरह से म्यूज़िकल ही होती हैं. डांस की बात करें तो मिथुनदा, गोविंदा जैसे नाम ज़हन में आते हैं...इन्हीं हीरो के गानों पर आपको अकसर 30 प्लस के पुरुष बारातों में नाचते दिख जाएँगे.

एबीसीडी में वाकई बेहतरीन डांस था. इस फ़िल्म में प्रभुदेवा डांस इंस्ट्रक्टर बने थे. बाकी कलाकार इसमें कमोबेश नए थे. लीड रोल में टीवी पर आने वाले रिएलिटी शो के डांसर थे. ये सामान्य सी कहानी थी पर मनोरंजक थी.

वरुण की मेहनत

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हैरतअंगेज़ डांस स्टेप्स और बेहतरीन गाने ‘बेज़ुबान’ के दाम पर एबीसीडी ने अच्छा प्रदर्शन किया था. अब इस फ़िल्म के सीक्वेल एबीसीडी 2 में भी बेज़ुबान ही एकमात्र ठीक-ठाक गाना है और बाकी सब गाने ठंडे हैं.

एबीसीडी से एबीसीडी 2 कई मायनों में अलग है. पहले तो ये कि एबीसीडी 2 में बॉलीवुड का बड़ा नाम है- सिक्स पैक वाले वरुण धवन.

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वैसे देखा जाओ तो वरुण धवन ने प्रोफ़ेशनल डांसर का रोल करने के लिए काफ़ी मेहनत की है (शाहिद कपूर, ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ़ को छोड़कर बाकी अभिनेताओं के बारे में ऐसी बात नहीं कही जा सकती. शाहिद और ऋतिक दोनों वरुण से बड़े हैं तो टाइगर ने अभी अभी पारी शुरु की है.)

डांस ग्रुप का काम

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वरुण धवन और कोरियोग्राफ़र-निर्देशक रेमो ने सुनिश्चित किया है कि फिल्म में डांस ग्रुप को अपना काम दिखाने का पूरा मौका मिले और वे पर्दे पर उम्दा दिखे.

ये फ़िल्म सिर्फ़ हीरो की कहानी नहीं है.. वो मुंबई स्टनर्स या इंडियन स्टनर्स नाम के ग्रुप का हिस्सा है.

ग्रुप पर आरोप लगता है कि टीवी पर उन्होंने फ़िलीपींस के एक ग्रुप के डांस स्टेप्स की नकल की है.

जेब से खाली सही पर ख़ुद को सही साबित करने की धुन लिए, ये लोग वर्ल्ड हिप हॉप डांस चैंपियनशिप में हिस्सा लेने की ठानते हैं.

श्रद्धा कपूर इस ग्रुप में एक मात्र महिला सदस्य है जो दुर्भाग्यपूर्ण है. क्योंकि महिलाएँ डांस करते हुए कहीं ज़्यादा गरिमामय दिखती हैं- फिर चाहे पुरुष आपको कितना भी प्रभावित करने की कोशिश करें. ख़ैर वो अलग ही बहस है.

स्पेशल इफेक्ट हैं टॉप क्लास

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फ़िल्म में दो बड़े फ़िल्मी सितारे हैं जिस वजह से फ़िल्म को अलग तरह के पैमाने पर दिखाया जा सका है. कुछ 3 डी स्पेशल इफेक्ट टॉप क्लास हैं.

डांस चैंपियनशिप लास वेगास में होती है जहाँ विशाल मंच रचा गया है. शहर को भी ख़ूबसूरती से कैमरे में कैद किया गया है.

हैप्पी न्य ईयर से तुलना होना यहाँ लाज़मी है.

करीब एक घंटे बाद फ़िल्म में आपको लगेगा कि कहानी तो है ही नहीं. मेलोड्रामा डालने के लिए फ़िल्म में मेलोड्रामा डाला गया है.

लेकिन कुछ कहानी बनती नहीं दिखती और भावनाओं तो मानो है ही नहीं.

लचर कहानी

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फ़िल्म केवल आइटम नंबरों की अंतहीन सिलसिला सा बनकर रह जाती है. शुरु में ये अच्छा लगता है पर बाद में पूरा मामला ठंडा पड़ जाता है.

सीक्वेल में ऐसी क्या बात होती है कि इनकी स्क्रिप्ट इतनी कमज़ोर होती हैं? शायद ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास.

हालांकि यहाँ फ़िल्म बनाने वालों का आत्मविश्वास गलत नज़र नहीं आता क्योंकि आपको पता है कि फ़िल्मकार अपने दर्शकों को लुभाने में सफल रहेंगे.

ये और बात है कि दर्शक एबीसीडी 3 देखने आएँगे या नहीं (अगर ऐसी फ़िल्म बनती है तो).

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