'छोटे शहर के चरित्रों पर आधारित है मसान'

फ़िल्म की नायिका ऋचा चड्ढा

फ़िल्म: मसान

निर्देशक: नीरज घयवन

कलाकार: रिचा चढ्ढा, विकी कौशल

रेटिंग: ****

ऐसा कभी नहीं होता है कि फ़िल्म के साथ साथ फ़िल्म देखते हुए चेहरे पर आने वाले भाव भी याद हों. ‘मसान’ देखते हुए मैं बिल्कुल गंभीर था, हंसी मज़ाक के हल्के-फुल्के क्षण या गानों के दौरान भी मेरे चेहरे पर परेशानी के ही भाव थे.

यह फ़िल्म अपनी नाटकीय शुरुआत के बाद ज़िंदगी की कहानी कहती है, यह प्रेम और नुक़सान दोनों के बारे में बताती है. फ़िल्म छोटे शहर पर आधारित है, इसका हर कलाकार इसकी पृष्ठभूमि की सच्चाई को साबित करता है.

नाटकीय शुरुआत

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फ़िल्म की शुरुआत ही नाटकीय है और एक छोटे से होटल के कमरे में सेक्स का दृश्य है. आधुनिक सभ्यता सहमति से होने वाले इस तरह के प्राकृतिक प्रेम या वासना, जैसा आप सोचें, पर उत्सव मनाता है.

पर ठीक किशोर वय से बाहर निकले इस जोड़े को इसके बेहद गंभीर नतीजे भुगतने पड़े. पुलिस उन्हें पकड़ती है. लड़का ख़ुदकुशी कर लेता है. लड़की (ऋचा चड्ढा) हमेशा के लिए डर जाती है.

फ़िल्म का नाम ‘मसान’ श्मशान का अपभ्रंश है. यह फ़िल्म की दूसरी कहानी से ज़्यादा जुड़ा हुआ है. ये कहानी एक लड़के (विक्की कौशल) की है, जो एक लड़की (श्वेता त्रिपाठी) से प्रेम करता है.

वह फ़ेसबुक के ज़रिए उसके नज़दीक पंहुचता है. इस रिश्ते में पेंच यह है कि लड़का डोम है, जो कथित अछूत जाति का है जिसका काम मृतकों की अंत्येष्टि करना है. लड़की देवी गुप्ता ऊंची जाति की है.

दो प्लॉट एक साथ

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दो अलग-अलग प्लॉट को एक साथ बुनने की शुरुआत मेक्सिको के निर्देशक अलेजांद्रो इनेरीतू की फ़िल्म ‘पेरोज’ से हुई. इसे मुंबई में भी काफ़ी पसंद किया गया, ‘युवा’ और ‘शिप ऑफ़ थीसियस’ में भी ऐसी कोशिश की गई है.

सिनेमेटोग्राफ़र अविनाश अरुण ने गंगा और इसके घाटों की गंदगी और भव्यता को सही ढंग से दिखाया है.

पर यह बनारस उस बनारस से अलग है, जिसे पश्चिम के लिए और पश्चिम के द्वारा दिखाया जाता है. यह ख़ासकर शहर में रहने और जीने वालों के विचार हैं. पर स्क्रिप्ट से साफ़ है कि यदि यह किसी दूसरे शहर की कहानी होती तो भी यह ऐसी ही होती और इतनी ही जीवंत होती.

मीडिया और तकनीक

ऐसा लगता है कि फ़िल्म की थीम मीडिया और तकनीक है. किशोर लड़की देवी (ऋचा चड्ढा) पर यह ख़तरा मंडरा रहा है कि उसे यूट्यूब और टेलीविज़न स्क्रीन पर शर्मिंदा किया जाएगा. दूसरी ओर, यह सोशल मीडिया और तकनीक ही है, जिसकी वजह से अलग थलग पड़े और बंद समाज में प्रेम करना इतना आसान हो गया है.

बनारस जैसे शहर में कम उम्र के लोगों को आधुनिक तकनीक मिलने का क्या मतलब है? यदि आप ऐसी जगह रहते हैं जहां अपराधबोध, शर्म, सेक्स, जाति, लिंग और समुदाय के मूल्य पुराने जमाने के हैं तो निश्चिय ही आप उससे बाहर निकल जाना चाहेंगे.

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मेरा पसंदीदा दृश्य वह है जब रेलवे के टिकट काउंटर पर काम करने वाली मुख्य पात्र देवी एक अत्याधुनिक युवा जोड़े को सीट खाली रहते हुए भी टिकट देने से इंकार कर देती है.

मुझे लगता है कि वह शहर में रहने वाले इस तरह के आज़ाद लोगों, ख़ासकर लड़कियों से ईर्ष्या करती है.

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मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह एक काफ़ी अवसाद पैदा करने वाली, दुखमय किस्म की फ़िल्म है. यह वाकई ऐसी फ़िल्म नहीं है. यह फ़िल्म प्रेम, नुक़सान और किसी को हासिल करने की इच्छा वाली फ़िल्म है.

विलाप कर रहा एक चरित्र अपन दुख के चरम बिंदु पर चीखता है कि आख़िर दुख कम क्यों नहीं होता है? दुख कम होगा पर उसक मन एक जगह रुका हुआ है और आगे बढ़ने से इंकार करता है. यह वाकई सरल और प्रभावी दृश्य है.

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