फिल्म मांझी का रिव्यू

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किसी कहानी पर बनाई गई पूरी फ़िल्म से दर्शकों को बांधने की शुरुआत कैसे करें, सबसे अहम बात ये कि कहानी भी एक आदमी और उसके पहाड़ तोड़ने के तन्हा अनुभव की हो, जो अकेले अपने दम पर, बस अपने साथ लगातार 22 साल तक पहाड़ तोड़ता रहा हो.

पहली बात तो ये कि ये कहानी एकदम सच्ची है. मुझे शक़ है कि अगर दर्शकों से ज़ोर देकर न कहा जाए तो वो शायद ही इस पर यक़ीन करें. हाँ, मैं जानता हूँ कि कभी-कभी सच कल्पना से भी रोचक होता है.

इस मामले में, यानी दशरथ माँझी जैसी कहानी में रचनात्मक स्वतंत्रता की गुंजाइश बहुत ज़्यादा नहीं है.

इस कहानी के अधिकतर हिस्से सार्वजनिक हैं. फ़िल्म के ट्रेलर में ही वो सब पता चल जाता है जो माँझी ने किया.

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पिछड़ा बिहार

मांझी गया के ग़रीबी, जात-पात और सूखे का दंश झेल रहे गहलौर गांव से थे.

राजनीतिक रूप से ये गांव बिहार में है लेकिन भौगोलिक रूप से ये भारत का सबसे स्याह कोना है.

मैं पत्रकारिता के दौरान एक बरा गया जा चुका हूँ. शाम पाँच बजे ही लोग अपनी जान के डर से ख़ुद को घरों में क़ैद कर लेते हैं.

पुलिस वाले आम लोगों के मुक़ाबले ये सलाह ज़्यादा गंभीरता से लेते हैं और ज़्यादा डरे हुए लगते हैं.

ये 2005 की बात है जब इस इलाक़े में नक्सलियों का प्रभाव था.

आप ये जानना नहीं चाहेंगे कि गया के अंदरुनी इलाक़े में तीस-चालीस साल पहले कोई गांव कैसा था.

लेकिन यदि आप इसे जानने के इच्छुक हैं, तो ये फ़िल्म इसका अच्छा संदर्भ देती है.

साफ़ कहा जाए तो ज़्यादा कुछ नहीं बदला है. इसलिए ही भारत में बड़े शहरों के बाहर समयकाल पर आधारित फ़िल्म बनाना इतना मुश्किल काम नहीं है, कम से कम फ़िल्म प्रोडक्शन के नज़रिए से तो बिलकुल भी नहीं.

निश्चित रूप से ये एक ग्रामीण फ़िल्म है. 90 के दशक के बाद से बॉलीवुड फ़िल्में शहरी अमीरों पर आधारित रही हैं और लिबरल लोग ऐसी फ़िल्मों की कमी का रोना रोते रहे हैं.

शोले, जो सबसे ज़्यादा देखी गई फ़िल्म है, ये भी ग्रामीण फ़िल्म ही थी. आप पुरानी फ़िल्मों के प्रशंसकों को ये पूछते सुन सकते हैं कि “ठाकुर कहां चले गए?”

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दमनकारी मुखिया

लीजिए, एक ठाकुर हाज़िर है, मुखिया या गांव का उच्च जाति का सरपंच. उसके चेले भी हैं और राजनीतिक संपर्क भी. इन सबके बीच मांझी एक दलित व्यक्ति है, नीच जाति का अछूत है. भले ही तकनीकी रूप से छुआछूत ख़त्म हो गया हो.

बिहारी ज़मीन पर मंझे हुए कलाकारों को एक दूसरे के आमने-सामने अभिनय करते हुए देखकर लगता है कि ये फ़िल्म एक ख़ास रूप में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर का अगला भाग है. अभिनय के लिहाज़ से ये लगभग ऐसी ही है, या शायद इसलिए कि स्टारकास्ट भी लगभग वही है.

तिगमांशू धूलिया मुखिया बने हैं. एक बड़ा पहाड़ उनके गाँव और बाक़ी दुनिया के बीच में खड़ा है. पहाड़ के बीच से अगर छोटा सा रास्ता निकल जाए तो दूरी में बड़ी कमी आ जाए. उनके गांव और नज़दीक़ी कस्बे के बीच दूरी एक चौथाई रह जाए.

लेकिन मुखिया को इसकी कोई परवाह नहीं है.

छा गए नवाज़ुद्दीन

प्रकृति प्राणघातक और दमनकारी हो सकती है. लेकिन प्रकृति के सामने सभी इंसान एक समान, एक बराबर भी होते हैं.

दूसरी ओर मानवीय उत्पीड़न दिमाग़ी खेल से चलता है. भारतीय समाज में जात-धर्म और लिंगभेद जैसी काल्पनिक हीनताओं को मानवीय उत्पीड़न और अपमान का आधार बनाया जाता रहा है. आपको इस फ़िल्म में ये बीमार प्रथाएं ख़ूब दिखेंगी.

नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी मांझी की भूमिका में हैं. पहाड़ पर एक हादसे में वो अपनी पत्नी को खो देते हैं और पहाड़ तोड़ने का फ़ैसला कर लेते हैं.

कहानी उन्हीं के कंधों पर टिकी है. वे भले ही अपने दम पर पहाड़ तोड़कर सड़क न निकाल पाएं लेकिन फ़िल्म को बना या बिगाड़ ज़रूर सकते हैं. और निश्चित तौर पर वो इस फ़िल्म को अपनी फ़िल्म बना लेते हैं.

परम आनंद और निराशा, हताश पागलपन और ईमानदार दृढ़ संकल्प के बीच झूलते दो घंटों में नवाज़ ही हैं. वे पूरी तरह छा जाते हैं.

केतन की तीसरी बॉयोपिक

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ये निर्देशक केतन मेहता की लगातार तीसरी बॉयोपिक यानी किसी व्यक्ति के जीवन पर आधारित फ़िल्म है. वे इससे पहले मंगल पांडे- द राइज़िंग (2005), राजा रवि वर्मा पर बनी रंग रसिया (2014) बना चुके हैं.

एक अच्छे फ़िल्मी करियर के बावजूद केतन मेहता को फ़िल्म 1987 में आई नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल की मिर्च मसाला के लिए याद किया जाता है. ये महिलावादी फ़िल्म भी ग्रामीण भारत में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर आधारित थी.

दशरथ मांझी पर फ़िल्म बनाना केतन मेहता का सही फ़ैसला है, हालांकि वास्तविक जीवन के हीरो रहे माँझी का निधन 2007 में ही हो गया था और उन पर अन्य डाक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बन चुकी हैं.

मनीश झा भी इस कहानी पर काम कर रहे हैं. झा इस फ़िल्म को लेकर केतन मेहता के ख़िलाफ़ अदालत भी गए लेकिन अदालत ने मेहता के पक्ष में फ़ैसला दिया.

जज का फ़ैसला

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अपने फ़ैसले में बांबे हाई कोर्ट ने कहा, “मेहता और उनकी टीम अपने काम में कामयाब हुए हैं या नहीं, इसे फ़िल्म समीक्षकों और प्रशंसकों पर छोड़ देना चाहिए लेकिन यह निश्चित तौर पर नकल का काम नहीं है.”

फ़ैसले के बारे में पढ़ते हुए मैं सोच रहा था कि हमारे कुछ जज (ख़ासतौर पर जस्टिस गौतम पटेल) बहुत अच्छे फ़िल्म समीक्षक हो सकते हैं.

जस्टिस गौतम ने ये फ़िल्म देखी है और वो इसकी तुलना डेविड और गोलियाथ के बीच हुए चर्चित युद्ध से करते हुए कहते हैं, “मांझी का पहाड़ के प्रति पागलपन अपने आप में एक किवदंती है, जो मज़ाक, अपमान, नौकरशाहों के बेशर्म रवैए, शर्म, पराजय, वक्त के उलटफ़ेर, अपने बच्चों की देखभाल न कर पाने के दर्द और बाक़ी सभी कुछ सहते हुए भी बचा रहता है. एक अनूठा बल है जो बार-बार एक अचल पहाड़ से टकाराता है. फ़िल्म जातपात की राजनीति, ज़मीनदारी व्यवस्था, राजनीतिक बदलाव, जटिल नौकरशही और यहाँ तक कि सत्ता और प्रभुत्तव के लिए बलात्कार किए जाने तक को दर्शाती है.”

मैं वापस मूल सवाल पर लौटता हूँ. क्या मांझी जैसी सरल कहानी पर सिनेमा बनाना मुमकिन है?

अगर आप इधर-उधर से बहुत कुछ डालने में कामयाब हो जाते हैं तो बिलकुल मुमकिन है. यह फ़िल्म भी तो अंत में यही करती है. बस आप प्रेरित होने के बजाए निराश रह जाते हैं. लेकिन फिर जीवन भी तो ऐसा ही है.

फ़िल्म: मांझी- द माउंटेन मैन

निर्देशक: केतन मेहता

कलाकार: नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, राधिका आप्टे

रेटिंग: ***

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