'हकलाती हूं, पर हुनरमंद हूं'

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

पहली मुलाक़ात में ही अगर कोई अपने नाम पर अटक जाए तो आगे की कहानी कैसे बढ़ेगी?

आज भी जब हकलाहट होती है तो यही लगता है कि कोई मेरी हकलाहट के कारण मुझे नजरअंदाज कर रहा है, मेरा मजाक उड़ा रहा है

ये कहती हैं बैंक में काम करने वाली गीतिका. वे हकलाती हैं.

Image caption गीतिका कहती है कि समाज इनके प्रति और संवेदनशील हो

ऐसी ही कई गीतिकाएं हैं. हकलाने के कारण ये आम लोगों के बीच डर, शर्म और झिझक महसूस करते हैं.

एक प्लेटफ़ार्म मिला

इसका सामना करने के लिए ऐसे कई लोग हर रविवार एक जगह जुटते हैं, तकलीफें साझा करते हैं और अपनी हकलाहट को सुधारने की कोशिश करते हैं.

और उन्हें ये प्लेटफार्म और मौका दिया ‘दी इंडियन स्टम्मेरिंग एसोसिएशन’ यानी कि टीसा ने.

ये भारत के 25 शहरों में शुरू हो चुका है.

Image caption टीसा की वर्कशॉप में

डॉ सतेंद्र श्रीवास्तव जो खुद भी कभी हकलाते थे, कहते हैं, ''हमारी सबसे बड़ी तकलीफ ये है कि समाज इसके बारे में बात नहीं करता. हम भी खुद को कमतर समझने के कारण खुल नहीं पाते. इसलिए ये समस्या अब तक ढकी-छुपी है.”

टीसा की नींव रखने वाला श्रीवास्तव बताते हैं, “हकलाने की समस्या पर कोई संवाद नहीं है. इससे आगे कई तरह की समस्याएं पैदा होती है. इसलिए मैंने पहले इस विषय पर ब्लॉग लिखा. उसके बाद इस तरह के लोग जुड़ते चले गए.''

'फ़िल्मों में भद्दे तरीके से दिखाते हैं'

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Image caption डॉक्टर श्रीवास्तव कहते हैं कि हकलाना कोई बीमारी नहीं है

इस सोसाइटी में शालिनी कई सालों से आ रही हैं.

अजय देवगन की फिल्म गोलमाल में एक कैरेक्टर है जो हकलाता है और कॉमेडी की कोशिश करता है.

उनको लगता है किं फ़िल्मों में हकलाने को बहुत ही भद्दे तरीके से दिखाया जाता है. शालिनी कहती हैं, "जो हकलाते हैं वो हंसी के पात्र नहीं होते. उनको समझने और इस मुद्दे के प्रति हमारा समाज आज भी संवेदनशील नहीं है.''

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Image caption TISA

एक और सदस्य विकास गुप्ता का कहना है, ''जो हकलाता हो, ज़रूरी नहीं कि उसका दिमाग भी ढीला हो,”

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