कितना जज़्बा दिखा पाईं ऐश्वर्या ?

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फिल्म: जज़्बा

निर्देशक:संजय गुप्ता

कलाकार: ऐश्वर्या राय बच्चन, इरफ़ान

रेटिंग: *1/2

थिएटर में दाख़िल होने पर मेरी नज़र अपनी सीट के साथ-साथ स्क्रीन पर ऐश्वर्या राय बच्चन पर भी थी. वजह बड़ी स्वाभाविक थी- वे भले ही बहुत उम्दा अभिनेत्री न हों लेकिन ऐश्वर्या बीते दो दशकों से लोगों के ज़हन में छाई रही हैं और पिछले पाँच साल से पर्दे से दूर थीं.

41 साल की हो चुकी ऐश्वर्या ने इस फिल्म में एक हॉटशॉट वकील के रोल के लिए काफ़ी पसीना बहाया है. वे किसी भी उत्पाद के प्रचार के लिए पहले से ज्यादा फिट नज़र आ रही हैं.

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इस फिल्म में उनकी भूमिका भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है. फिल्म में गहराई बहुत कम है और ऐश्वर्या को लोगों को ये यकीन दिलाने में काफ़ी मेहनत करनी पड़ती है कि उनकी बेटी का अपहरण हो गया है.

फ़िरौती के बदले अपहरणकर्ता ऐश्वर्या राय के ज़रिए बलात्कार के एक अभियुक्त (चंदन रॉय सान्याल) को छुड़वाना चाहते हैं जिसे मौत की सज़ा मिलने वाली है. लेकिन ऐशर्या शांत नज़र आती हैं क्योंकि उन्हें यह केस लड़ना है. पूरी फिल्म उन्हीं के इर्दगिर्द है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि बाकी कलाकार फ़िज़ूल हैं. हर कलाकार की अपनी भूमिका है जो अच्छी बात है.

इरफ़ान के मुहावरे और शायरी

फिल्म में इरफ़ान पुलिस वाले की भूमिका में हैं जिन्हें निलंबित किया गया है. उनके अपने साथी भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें गिरफ्तार करते हैं. लेकिन उनकी एंट्री पुलिसवालों के साथ एक गाड़ी में होती है. ये अजीबोगरीब लगता है. शायद इरफ़ान को भी लगा हो.

इरफ़ान पहली झलक में डार्क रूम में डार्क ग्लासेस पहने नज़र आते हैं जहां किवाड़ों से सूरज की किरणें दाख़िल हो रही हैं.

इरफ़ान सिर्फ़ मुहावरों-कहावतों, शायरी और प्रतीकात्मक शब्दों में बात करते हैं. इसके बाद हम उन्हें कभी उनींदा कभी हड़बड़ी जैसी अलग-अलग भाव-भंगिमाओं में देखते हैं मानो अपनी ही पैरोडी कर रहे हों.

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फिल्म में शबाना आज़मी भी ख़ास भूमिका में नज़र आती हैं. फिल्म के दृश्य मुंबई के मरीन ड्राइव, बांद्रा-वर्ली सी-लिंक, चेम्बूर और बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट रोड पर फिल्माए गए हैं. फिल्मांकन थोड़ा अलग एंगल से किया गया है जिसकी वजह से ये दक्षिण भारतीय फिल्मों की तरह प्रतीत होती है.

अब सवाल ये है कि इस फिल्म में बलात्कार के केस का वकील की नन्हीं बेटी के अपहरण से क्या संबंध है? शायद उसी तरह जैसे इस फ़िल्म का संबंध वर्ष 1997 के पूर्वी एशियाई आर्थिक संकट से है.

कोरियाई फिल्मों का असर

यह बहुत दूर का संबंध है लेकिन कैसे मैं बताता हूं. आर्थिक मंदी की चपेट में आने के बाद दक्षिण कोरिया की सरकार ने फिल्म, पॉप बैंड्स और पॉप कल्चर पर भारी निवेश करने का फैसला किया ताकि देश और अर्थव्यवस्था की छवि चमकाई जा सके.

इसका असर ये हुआ कि कुछ आलसी या प्रतिभाहीन बॉलीवुड राइटर्स ने कोरियाई फिल्मों से स्क्रिप्ट उठाना शुरू कर दिया.

फिल्म के निर्देशक संजय गुप्ता कई बार ऐसा कर चुके हैं. पार्क चेन-वूक की साल 2003 में आई 'ओल्ड ब्याय' से प्रेरित होकर उन्होंने वर्ष 2006 में ज़िंदा बनाई थी.

जज़्बा इसी तरह वर्ष 2007 में आई पार्क ही सून की क्राइम थ्रिलर 'सेवन डेज़' का रीमेक है. पिछले हफ्ते अक्षय कुमार की रिलीज़ हुई फिल्म 'सिंग इस ब्लिंग' के बारे में मुझे बताया गया है कि ये वर्ष 2006 की जिंग यू चो की फिल्म 'माय वाइफ इज़ ए गैंगस्टर' से मिलती-जुलती है.

कोरियाई फिल्मों की इस नकल में एक दिक्कत है. ये फिल्में बहुत तेज़ पेस की होती हैं और सांस्कृतिक रूप से भारत से मेल नहीं खाती हैं. भारतीय फ़िल्मोें का मेलोड्रामा भी इस कमी को पूरा नहीं कर पाता.

वैसे आपको ये भी बता दूँ कि इस फिल्म में एक ट्विस्ट है. फिल्म देखते हुए अगर आपको झपकी ना आए तो आप इसे पकड़ लेगें.

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