लावारिस लाशों को अब्दुल का सहारा

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मुंबई के शिवडी इलाक़े में मौजूद ट्यूबरक्लोसिस अस्पताल में काम कर रहे डॉक्टर ललित कुमार आनंदे 30 से भी ज़्यादा सालों से मरीज़ों का इलाज़ कर रहे हैं.

डॉक्टर ललित के अनुसार, "कई बार टीबी से मरने वालों के परिजन लाश लेने भी नहीं आते. ऐसे में हमारे सामने बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है."

अक्सर ऐसी लाशों को डॉक्टर ललित और अस्पताल प्रशासन मेडिकल कॉलेजों को दे देते थे ताकि छात्र उन पर अभ्यास कर सकें. ज़्यादा इंफ़ेक्शन वाली लाशों को मिट्टी में दबा दिया जाता था.

लेकिन साल 2008 से यह समस्या ख़त्म हो गई है क्योंकि इन लाशों को सम्मानजनक तरीके से श्मशान या कब्रिस्तान ले जाने का जिम्मा उठाया मुंबई के अब्दुल ग़नी ने.

नेक काम

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रेडिमेड कपड़ों का व्यापार करने वाले 30 वर्षीय अब्दुल मुंबई के इस अस्पताल में लावारिस लाशों को मृतकों के धर्म के अनुसार जलाते या दफ़नाते हैं.

वो कहते हैं, "कुछ लोग भूखों को ख़ाना खिलाते हैं तो कुछ जानवरों को पानी पिलाने का नेक काम करते हैं. मैं लोगों का आख़िरी सफ़र पूरा करवाता हूं और यह मेरा नेक काम करने का तरीक़ा है."

प्रेरणा

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अब्दुल बताते हैं कि इसी अस्पताल में 18 साल की एक लड़की की मौत के बाद से उनका हृदय परिवर्तन हुआ.

वो कहते हैं, "मैं अपने रिश्तेदार से मिलने आता था और वो लड़की साथ के बिस्तर पर थी. एक दिन मुझे पता चला कि उसे उसके घरवालों ने छोड़ दिया है और उसके पास आख़िरी वक़्त में सिर्फ़ 20 रुपए हैं जिससे वो मौत से पहले ब्रेड खाना चाहती है."

उस लड़की की मौत के बाद से अब्दुल ने इस काम को अपना मक़सद बना लिया.

कोशिश

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अब तक 300 से 400 लोगों का अंतिम संस्कार कर चुके अब्दुल ने टीबी अस्पताल के अलावा मुंबई के सायन अस्पताल, के ई एम अस्पताल और नायर अस्पताल से भी बॉडी उठाने का काम किया है.

वो कहते हैं, "लोग बीमारी से डर जाते हैं और अक्सर अपने ही परिजन को आख़िरी वक़्त में पीछे छोड़ जाते हैं जो वाक़ई दिल तोड़ देने वाला होता है."

अब्दुल आगे कहते हैं, "मैं हर तीन महीनों में मरीजों को फल और पकवान बाँटता हूँ जिससे वे ख़ुश रहे. साथ ही मरीज़ों के परिजनों को भी समझाता हूं ताकि आख़िरी कंधा परिवार वाले ही दें."

प्रक्रिया और धर्म

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अब्दुल को लाश को हासिल करने के लिए एक प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है. लाश का कोई दावेदार नहीं होने पर अस्पताल से फ़ोन आता है और फिर पुलिस की मंज़ूरी के बाद ही लाश को शमशान भूमि या कब्रिस्तान ले जाया जाता है.

वो कहते हैं, "कई बार ऐसा भी हुआ है कि प्रक्रिया में देरी के चलते छह महीने तक भी शव का अंतिम संस्कार नहीं हो पाता और फिर शव की हालत बिगड़ने पर वो मुझे सौंपा जाता है."

लेकिन मुस्लिम अब्दुल के लिए क्या हिंदुओं का अंतिम संस्कार करना मुश्किल नहीं होता, वो कहते हैं, "एक हिंदू बॉडी पर हमारा 4000 रुपए का खर्च होता है और मैं यह काम हिंदू रस्मों और रीति रिवाज़ों से करता हूं क्योंकि मेरा मानना है कि सभी धर्म एक और सबका खून एक है. हम सब एक ही नस्ल के इंसान हैं और मैं हर धर्म के लोगों की मदद करना चाहूंगा."

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