शानदार में चला आलिया-शाहिद का जादू ?

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फिल्म: शानदार

निदेशक: विकास बहल

कलाकार: आलिया भट्ट, शाहिद कपूर

रेटिंग: *1/2

इस कथित ‘शानदार’ फिल्म में लगभग हर किरदार को शुरु में ही बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया जाता यदि फिल्म बनाने वालों ने शुरू में ही न बता दिया होता कि ये फिल्म महज एक फंतासी है, जिसके किरदारों का कोई ओर-छोर नहीं है और जो किसी नामालूम जगह पर रहते हैं.

फिल्म में आलिया भट्ट हैं जो काफी हंसमुख और उन्हें नींद न आने की बीमारी है. आलिया की शाहिद से मुलाक़ात होती है जो उसे सुला सकता है.

आलिया के पिता का किरदार अदा किया है पंकज कपूर ने जो इस बात से असहज महसूस करते हैं कि उनकी बिटिया आख़िरकर बड़ी हो रही है और अपने लिए जीवनसाथी खुद तलाश लेगी.

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ऐसा अक्सर होता है कि ज़िंदगी भर आपका वास्ता ऐसे लोगों से पड़ता है जो मूर्ख, ढीठ, असभ्य दिखते हैं- लेकिन अधिकतर लोग और आपके दोस्त अंतत शिकायत करने की जगह आपको इसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं.

फिल्म के मामले में भी ऐसा ही होता है. यदि कोई फिल्म अपने अलग-अलग पहलुओं में लगातार बेतुकी और मूर्ख दिखती हो तो दर्शक भी उसे ज़्यादा परवाह किए बिना बस देख लेता है.

इस हिसाब से ये फिल्म मज़ेदार कही जा सकती है जिसके किरदारों में मूर्खता भरी है. इसमें दिल्ली वाली दो लड़कियां हैं जो शब्दों की शॉर्ट फ़ॉर्म में बात करते हैं, साढ़े आठ पैक वाला दूल्हा है जिसका आईक्यू गड़बड़ है, एक सिंधी भाई है जो संजय कपूर बने हैं.

लेकिन मुश्किल ये है कि आप कब तक एक ही तरह के जोक्स आप बार बार दोहर सकते हैं.

ये एक डेस्टिनेशन वेडिंग फ़िल्म है जिसकी जगह के बारे में आपको जानना ज़रूरी नहीं है. इसमें मोटी दुल्हन है जो अपनी मां (निक्की वालिया) से बहुत घबराती है.

नानी (सुषमा सेठ) और भी 'ख़तरनाक' हैं. आलिया बहन की भूमिका में हैं. शादी दो क़ारोबारी परिवारों में होनी है.

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फिल्म के निदेशक विकास बहल ने इससे पहले ‘क्वीन’ बनाई थी जिसे दर्शकों ने बेहद सराहा था. लोग अब संदेह जता रहे हैं कि क्या क्वीन भी वाकई विकास बहल ने बनाई थी.

वैसे सोशल मीडिया मुझे लगता है कि किसी भी फिल्म को ज़रूरत से ज़्यादा अच्छा या बुरा घोषित कर देता है. जहां तक इस फिल्म की लीड जोड़ी (आलिया-शाहिद) की बात है, तो आप जानते हैं कि बॉलीवुड की रोमांटिक कॉमेडी की दुनिया में उन्हें पसंद किया जा रहा है.

मुझे लगता है कि अगर आप फ़िल्म की इस बेमानी को स्वीकार कर लें तो ये फ़िल्म कभी कभी फ़नी लग सकती है और कुछ बातें आपका ध्यान खींच सकती हैं जैसे कैसे पंकज कपूर बेतुके हाव-भाव वाली फ़िल्मों के भी मास्टर हैं या फिर कैसे संजय कपूर अंडर रेटिड एक्टर हैं ( अनिल कपूर उनके भाई हैं), कैसे आलिया को अपने उम्र के हीरो के साथ काम करने की ज़रूरत है.

देखिए ये फ़िल्म वाकई आपको सोचने पर मजबूर करती है. लेकिन थिएटर में जाना चाहिए या नहीं, ये अलग ही बहस का मुद्दा है.

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