मनोरंजन की शतरंज पर जीत जाता है ये 'वज़ीर'

वज़ीर फ़िल्म

वज़ीर

निर्देशकः बिजॉय नाम्बियार

अभिनय: अभिताभ बच्चन, फ़रहान अख्तर

रेटिंग: ***

मुझे लगता है कि यदि आप उन सारे दृथ्यों को एक साथ गूंथ दें, जिसमें अमिताभ बच्चन पी रहे हैं, पीते हुए खुश हैं, दुखी हैं, निष्प्राण हैं, तो अपनी तरह का पांच से अधिक घंटे का बेहद मनोरंजक वीडियो बनकर तैयार हो जाएगा.

मेरी तरह कई लोग बच्चन की फिल्म देखते हुए बड़े हुए हैं, उन्होंने उन्हें स्क्रीन पर देखते हुए पहली बार जाना कि दिमाग में किसी चरित्र का बस जाना क्या होता है. और फिर इस फिल्म में एक शराबी बच्चन दिखता है. तो कैसे आपके होठों पर एक परिचित मुस्कान नहीं तैर जाएगी?

और पहचान के भाव एक पल में सामने हैं. “रूस में रूसी लड़की के साथ वोदका पीने का मज़ा ही कुछ और है.” “आप रूस गए हैं?” “नहीं.”

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अमिताभ बच्चन के सामने एक शतरंज है. इसके सारे मोहरे वोदका से भरे हुए छोटे गिलास में रखे हुए हैं. खेल में जब भी किसी का मोहरा मात खाता है वो एक घूंट लेता है.

इस दृश्य में जहां बच्चन अपने अनोखे अंदाज में चाल चलते हैं, उनके साथ खेल रहे फ़रहान अख़्तर, बिलकुल उनसे उलट अंदाज़ में, बिलुकल शांत और धीमे अंदाज में खेलते हैं, हालांकि वे पूरी तरह से नशे में भी हैं.

यहां तक कि फिल्मकार भी सितारों वाली फिल्म के अर्थशास्त्र से वाकिफ हैं. बड़े-बड़े सितारों की अदाकारी ने आधा काम कर दिया है. शुरुआत काफी अच्छी है.

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देखा जाए तो ऐसी कम ही फिल्में हैं जिसमें बेहतरीन कलाकार होते हैं और इतने सहज अंदाज में एक दूसरे से भिड़ सकते हैं. हालांकि यह अलग बात है कि दोनों अभिनेता पूरी तरह से मौलिक अभिनेता हैं और उनकी आवाजें पूरी तरह से भिन्न हैं.

अमिताभ बच्चन और फ़रहान अख्तर के अलावा फिल्म में जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश जैसे कई जाने माने कलाकार हैं. प्रकाश बेलावड़ी जैसे एक्टर भी हैं जो एक या दो सीन करके ही खुश हैं. अकेली अदिति राव हैदरी (फ़रहान की पत्नी) हैं जो जितनी दिलकश दिखती उतनी ही सहज रूप से बेहद संवेदनशील भी.

यह फ़िल्म मुख्य रूप से उदास, गूढ़ और सोचने पर विवश कर देने वाली फ़िल्म है, हालांकि ये 'नोआरिश' बिलकुल नहीं है. नोआरिश का मतलब अपराध और सस्पेंस से भरपूर होना.

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हर दृश्य बढ़िया तरीके से बुना हुआ है, खासकर मुठभेड़ और भीड़ वाले दृश्य. एकदम कट-टू-कट और पूरी तरह से कसे हुए. एडवरटाइजिंग फोटोग्राफी बेहतरीन बन पड़ी है. आप आसानी से फिल्म से आंखें नही हटा नहीं सकते.

सेटिंग दिल्ली की है. बच्चन ने एक ऐसे शतरंज खिलाड़ी का किरदार अदा किया है जो एक कार दुर्घटना में अपनी पत्नी और शरीर का एक हिस्सा खो देता है. कश्मीर के आतंकवाद में घर खत्म हो जाता है, एक दुर्घटना, जिसकी शायद साज़िश रची गई थी, में इकलौती बेटी को खो देता है.

फ़रहान अख्तर एक सख्त एटीस (एंटी-टेरर स्क्वायड) ऑफिसर हैं जिसकी इकलौती बेटी आतंकवादी हमले में मारी गई है. ये अलग बात है कि वो खुद इसके लिए कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं. वे कार की पिछली सीट पर एक बच्चे को बिठाकर क्रूर चरमपंथी का पीछा कर रहे हैं.

अब चलिए शतरंज की ओर चलते हैं. आखिर इसमें ख़ास बात क्या है?

फिल्म की कहानी शतरंज की चाल को बढ़ाने के लिए एक तरह से रूपक के रूप में इस्तेमाल की जाती है. यहां बादशाह या किंग केंद्रीय मंत्री (मानव कौल) है जिस पर दोनों का निशाना है. बच्चन और फरहान के पात्र दोनों अलग छोर के हिस्से हैं.

आखिर उन्हें एक मोर्चे पर कौन सी चीज लेकर आती है? क्या वो हक़ीकत कि उन दोनों ने ही अपने बच्चे खोए हैं, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि दोनों मुख्य किरदार शतरंज पर एक ही स्थान पर हैं.

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आप आगे की कहानी समझ सकते हैं. लेकिन ख़तरा यह है कि जो कहा जाना है उससे ज़्यादा ही आप समझ लें. बहरहाल कुछ भी हो विभिन्न किरदारों को उनकी स्थितियों में, शतरंज के बोर्ड पर घूमते देखने का विचार ही काफ़ी दिलचस्प है.

मौलिक कहानी, पटकथा, एडिटिंग आदि के लिए फ़िल्म के शुरू और अंत में विधु विनोद चोपड़ा को क्रेडिट दिया गया है- जो थोड़ा अजीब लगता है क्योंकि वह ही फ़िल्म के प्रोड्यूसर हैं.

सच कहूं तो, मुझे कम से कम 12 साल पहले चोपड़ा की कमाल की शतरंज पर आधारित स्क्रिप्ट याद आती है, दि फ़िफ़्थ मूव. इसमें संभवतः वह हॉलीवुड एक्टर्स डस्टिन हॉफ़मैन, पॉल न्यूमैन, रॉबिन विलियम्स को मुख्य भूमिकाओं के लिए ले रहे थे. तब उन्होंने कथित रूप से बोला था, "एक औसत (भारतीय) फ़िल्म देखने वाले का परिपक्वता का स्तर बहुत कम है. इस तरह के विषय को उन्हें समझाना बहुत मुश्किल है."

अब ये कहना कठिन है कि उन्होंने फिल्म देखने जाने वाले आम भारतीयों को ध्यान में रखकर मूल स्क्रिप्ट को हल्का किया है या नहीं. और आपके जेहन में भी ज़रूर कुछ सवाल उठ रहे होंगे. ऐसा होना लाज़िमी है, जब फ़िल्म के मुख्य किरदार के बारे में इतना कम बताया गया हो (खासकर अमिताभ बच्चन के किरदार के बारे में, जिसके बारे में दुर्घटना के सिवा कुछ नहीं पता).

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मूल रूप से 10 लोगों की दुनिया में तीन किरदार तस्वीर में हैं, और राष्ट्रीय राजनीति को चार आदमी चला रहे हैं, ये सभी मौकों और संयोगों की भूल-भूलैया में घूम रहे हैं, यहां चीजों के बेहद बनावटी और अवास्तविक दिखने का खतरा होता है. होता है क्या? थोड़ा सा. होता है.

बस आप अपनी उम्मीदों के शह मात पर नज़र रखिए. जहां तक मेरी बात है, फ़िल्म देखकर थिएटर से निकलते हुए मैं काफी संतुष्ट था.

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