मंटो पर काम, और नंदिता से एक मुलाक़ात

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मुंबई के शोरगुल वाले इलाके में भी शोरगुल से दूर समुद्र के बिल्कुल किनारे सटे एक अपार्टमेंट में रहती हैं नंदिता दास.

आसपास इतनी शांति है कि आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि आप मुंबई में हैं या भारत के किसी दूसरे कोस्टल इलाक़े में.

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नंदिता को शोर से दूर रहना पसंद है क्योंकि उनके मुताबिक़ कला के सृजन के लिए आपको सोचने का एक कोना चाहिए.

बतौर निर्देशक अपनी आगामी फ़िल्म, जो लेखक मंटो के जीवन पर आधारित है, को लेकर बीबीसी से जब नंदिता मिली तो वो एक अलग अवतार में थी.

किसी सितारे के घर में घुसते ही आप उम्मीद करते हैं कि वो थोड़ी देर में आपके सामने आएगा या वो तैयार होकर बैठा मिलेगा, लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं था.

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घर में घुसते ही सामना होता है फ़ायर, फ़िराक़ और 1947 अर्थ जैसी फ़िल्मों की अभिनेत्री नंदिता दास से.

पीले कुर्ते में नज़र का चश्मा लगाए, इधर उधर बिखरे कुछ पन्ने, दवाईयां और कुछ फ़ाईलों के बीच गर्म पानी का गिलास थामे, लैपटॉप पर नज़रे गड़ाए नंदिता हंसते हुए आपका स्वागत करती हैं, “माफ़ कीजिएगा मैं ज्यादा तैयार नहीं हो सकी, आज कुछ लिख रही थी.”

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वो कहती है वो कहती हैं, “फ़िल्म शूट आसान है लेकिन तभी जब उससे पहले स्क्रिप्ट पर पूरी मेहनत की गई हो और इस वक़्त वही मेहनत जारी है.”

मंटो के उपर फ़िल्म बनाने का विचार नंदिता को तब आया जब वो हाल में भारत पाकिस्तान के एक साझा कार्यक्रम में गई थीं.

वो कहती हैं, “मंटो एक अलहदा लेखक तो हैं लेकिन इन दोनों देशो के बीच की कड़ी भी हैं. एक ऐसा लेखक जिसने हिंदुस्तान तो छोड़ा लेकिन उसका नाता हिंदुस्तान से ताउम्र रहा.”

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लेकिन मंटो की कहानियों को तो कुछ लोग विवादित बनाते हैं और उनकी कहानियों को वो कैसे फ़िल्म में उतार पाएंगी इसपर वो हँस देती हैं, “मैं जानती हूं आप क्या कहना चाहते हैं और बिना किसी का नाम लिए मैं कह देती हूं कि मुझे मालूम है इसे रीलीज़ करते समय परेशानी आएगी लेकिन हम इस फ़िल्म को पूरी करेंगे.”

सेक्स, समलैंगिकता, सत्ता विद्रोह जैसी चीज़ों पर खुल कर बात करने वाले मंटो को सिने पर्दे पर उतारने के लिए कई बदलाव वो स्क्रिप्ट में कर रही हैं.

वो कहती हैं, “ये बॉलीवुड है और यहां अपनी फ़िल्म को रीलीज़ करने के लिए आपको फ़िल्म में मसाला डालना पड़ता है साथ ही कंटेंट ‘स्वीकार्य’ भी बनाना पड़ता है, इसके लिए हम काम कर रहे हैं.”

हालांकि मंटो की इस कहानी में बदलाव वो खुशी से नहीं कर रही, “अभी एक सीन को फ़िल्म से निकाले जाने को लेकर मेरी और प्रोडक्शन टीम की काफ़ी बहस हुई. मैं उस सीन को रखना चाहती थी लेकिन लंबाई और दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए मजबूरन मुझे उस दृश्य को काटना पड़ा.”

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नंदिता ने माना की बॉलीवुड में फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस हिट बनाने के लिए कहानियों में बदलाव करना पड़ता है.

फ़िल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ में भी क्लाईमैक्स दृश्य को मार्मिक बना देने के लिए फ़रहान को अंतिम दृश्य में पीछे एक घोड़ा दौड़ता दिखाई पड़ता है जिससे वो मुड़ जाता है और रिकॉर्ड से चूक जाता है लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं था.

नंदिता मानती हैं, “लोग दो घंटे से ज्यादा लंबी और बहुत ज्यादा ज्ञान की बातें सुनने हॉल में नहीं आते और इसी वजह से हमें कहानी को ‘क्रिएटिव कट’ के नाम पर बदलना पड़ता है.”

नंदिता ने यह भी कहा कि उनके बॉलीवुड में बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं रहने का कारण भी यही था कि वो क्रिएटिविटी के नाम पर कंटेट को बदलते नहीं देख पातीं.

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हालांकि ऐसे किसी फ़िल्म या बॉलीवुड हस्ती का उदाहरण देने से मना करते हुए वो कहती हैं, “आप मेरे दुश्मन बनाना चाहते हैं? मुझसे ज्यादा आपको ज्ञान है बॉलीवुड का, मुझे कहां आप इस मुश्किल में डाल रहे हैं.”

वो आगे कहती हैं, “अभी किसी का नाम ले दूंगी तो कल मुझे फ़ोन आने शुरु हो जाएंगे तुमने उसका नाम क्यों नहीं लिया. लोगों को और फ़िल्मों को उनके हाल पर ही छोड़ दीजिए.”

बॉलीवुड में कम नज़र आने की बात पर नंदिता बस इतना कहती हैं कि सिनेमा सिर्फ़ हिंदी नहीं होता, मैं भारतीय (रीजनल) सिनेमा में सक्रिय रुप से काम करती हूं क्योंकि वहां आप प्रोडक्शन कॉस्ट और बॉक्स ऑफ़िस की शर्तों में नहीं बंधे होते, वहां आपका काम देखा जाता है हीरोईन की सुंदरता नहीं !

नंदिता को उम्मीद है कि इस साल वो मंटो की शूटिंग का काम शुरु कर देंगी और जल्द ही फ़िल्म दर्शकों के सामने होंगी.

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