मुंबई के डब्बेवालों के कॉरपोरेट ख़्वाब!

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मुंबई के डब्बेवाले अब जल्द ही अपनी खुद की कंपनी शुरू करने जा रहे हैं और वो खाने के डब्बों के अलावा भी कई चीजों की डिलिवरी करेंगे.

मुंबई के अनेक डब्बेवाले ग्राहकों के घर से गरमा-गरम लंच लेकर ऑफ़िसों और स्कूलों तक पहुँचाते हैं लेकिन अब वे इसके अलावा दूध, किराना, फ़ल और कई अन्य चीज़ों की डिलिवरी भी शुरू करेंगे.

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बीबीसी से बात करते हुए मुंबई डब्बावाला असोसिएशन के प्रवक्त्ता सुभाष तलेकर ने बताया, "मुंबई के डब्बेवाले पिछले कई दशकों से खाने की डिलिवरी लोगों की सेवा समझ कर करते आ रहें हैं लेकिन अब हमें इसे व्यापारिक नज़रिए से भी देखना पड़ेगा."

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वे आगे कहते हैं, "हम दिन में करीब 2 लाख़ से भी ज़्यादा डब्बों को सही समय पर पहुंचाते हैं, और जब हम दूसरों के लिए इतना कर सकते हैं तो क्यों न अब खुद के लिए भी कुछ करें."

सुभाष का मानना है कि इससे हर डब्बेवाली की मासिक आमदनी बढ़ेगी.

उन्होंने डब्बेवालों की औसतन आमदनी पर बात करते हुए कहा, "हर डब्बेवाला महीने के लगभग 11 हज़ार रुपये की आमदनी करता है, अब आप ही सोचीए मुंबई जैसी जगह में भला 11 हज़ार रुपये में कुछ हो सकता हैं."

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पिछले वर्ष भारत की बड़ी ई कॉमर्स कंपनी 'फ्लिपकार्ट' ने भी अपने सामान को पहुंचाने के लिए मुंबई के डब्बेवालों का सहारा लिया था और अब उसी तरह कई और कंपनियां भी इनसे जुड़ना चाहती हैं.

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मुंबई डब्बावाला असोसिएशन के अध्यक्ष अर्जुन सावंत ने बताया, "पिछले वर्ष फ्लिपकार्ट कंपनी के लिए हमारे यहां से करीब 30 से 40 डब्बेवाले गए थे और अब मुंबई की 'आरे मिल्क' कंपनी ने भी हमसे करार किया है."

वे आगे कहते हैं, "योग गुरू बाबा रामदेव की आयुर्वेदिक कंपनी 'पतंजलि' से भी हमारी बात चल रही है."

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वो आगे बताते हैं कि चर्चगेट स्टेशन से गुज़रता हर पर्यटक उनके साथ तस्वीर खिचवाता है और पूछते हैं कि क्या कोई उनकी आर्थिक स्थिती पर ध्यान देगा?

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वो कहते हैं, "हमने पिछले 5 वर्षों से अपनी टिफिन डिलिवरी की फीस नहीं बढ़ाई है लेकिन अगर ग्राहकों को हम कह दें की अगले महीने से हमारी फीस बड़ जाएगी तो वे हम पर ही गुस्सा निकाल देते हैं."

सुभाष का मानना है कि अब ज़रूरी भी हो गया है कि वो कंपनी के तौर पर काम करें.

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वो बताते हैं, "यह कंपनी डिब्बावाला असोसिएशन से अलग रहेगी, डब्बा डिलिवरी का काम ठीक इसी तरह चलता रहेगा जैसा चला आ रहा है. हम टिफ़िन डिलिवरी के बाद दूसरी कंपनी का काम करंगे."

पिछले 15 वर्षों से डब्बों की डिलिवरी कर रहे रमेश राव इस शुरूआत को बड़े ही सकारात्मक रूप से देखते हैं.

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वे मुस्कराते हुए कहते हैं, "इसमें तो हमारी ही भलाई है की हम मासिक आमदनी के अलावा भी कुछ और कमाई कर सकेंगे, नहीं तो मुंबई जैसे महंगे शहर में कैसे गुज़ारा होगा साहब."

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