शरणार्थियों की कला देहरादून से डेनमार्क तक

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देहरादून में तिब्बती शरणार्थियों के एक छोटे से समूह की कांच की कलाकृतियां देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्धि बटोर रही हैं.

तिब्बती शरणार्थी देहरादून के सहस्त्रधारा रोड पर बसी तिब्बती कॉलोनी में एक छोटी सी कार्यशाला चलाते हैं. इसमें तैयार कलाकृतियां विदेशों तक जाती हैं.

यहां काम करने वाले कलाकार कांच के हस्तशिल्प में माहिर हैं. ये सभी कांच से आभूषण और सजावटी सामान बनाते हैं.

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इन कारीगरों में क़रीब 5-6 मूक-बधिर भी हैं, पर वो अपनी कला से अच्छे से अच्छे कारीगर को भी मात दे सकते हैं.

इन कारीगरों से एक तेनज़िंग, जो मूक और बधिर हैं, आठ साल की उम्र में भारत आए थे. तेनज़िंग के अभिभावक नहीं हैं, इसलिए वो मूक बच्चों के एक स्कूल में रहते हैं.

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इनको 'एक्साइल क्रिएशन्स प्राइवेट लिमिटेड' में काम करते हुए क़रीब दो साल हो गए हैं और वह महीने के क़रीब 12,000 रुपए कमा लेते हैं. कार्यशाला में काम करने के कारण उन्हें अपना नाम और पहचान भी मिली.

'एक्साइल क्रिएशन्स प्राइवेट लिमिटेड' के संस्थापक कालदेन चोपहेल और नवांग टसुलटरियम हैं. इस कार्यशाला के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है.

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इसके संस्थापकों में से एक कालदेन को साल 2005 में 'ट्रोलबीड्स' कंपनी के तहत प्रशिक्षण पाने का मौक़ा मिला था. इसके बाद वो इस कला में पारंगत हो गए.

इसके बाद कालदेन ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला शहर में एक कारखाना खोला और 2012 में नवांग के साथ देहरादून में 'एक्साइल क्रिएशन्स प्राइवेट लिमिटेड' की शुरुआत की.

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हालांकि, इसके लिए डेनमार्क की 'ट्रोलबीड्स' कंपनी ने शुरुआत में कुछ फ़ंड भी दिया, पर अब यह पूरी तरह आत्मनिर्भर है.

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इसमें तैयार कलाकृतियों की सबसे बड़ी ख़रीदार डेनमार्क की 'ट्रोललबीड्स' कंपनी ही है.

कालदेन बताते हैं कि जब यह शुरू हुआ, तो इसमें महज़ तीन तिब्बती युवा थे, लेकिन अब तक़रीबन 32 युवक-युवतियां काम करते हैं.

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कालदेन कहते हैं कि इस कंपनी के ज़रिए, वो तिब्बती शरणार्थियों को आय का एक सम्माननीय ज़रिया देना चाहते हैं और साथ ही तिब्बती कलाओं को भी भारत लाना चाहते हैं.

कार्यशाला के सहसंस्थापक नवांग कहते हैं कि वो ख़ुद भी एक तिब्बत शरणार्थी हैं और 1959 में उनके माता-पिता तिब्बत में चीन के कब्ज़े की वजह से दलाई लामा के साथ भारत आ गए थे.

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नवांग ने कहा, ''हम इसमें ज़रूरतमंदों को काम देते हैं, ताकि वो अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकें.''

ऐसे में सवाल यह है कि क्या यहां काम करने के लिए तिब्बती होना ज़रूरी है?

वह कहते हैं, ''नहीं, यहां पर लद्दाख़ और भूटान से आए युवक-युवतियां भी काम करते हैं.''

कार्यशाला में काम करने की शर्त बताते हुए कहते हैं कि यहां काम करने के लिए ज़रूरतमंद होने के साथ मेहनती होना चाहिए.

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नए कर्मचारी को तीन महीने तक निःशुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है. प्रशिक्षण के दौरान तीन हज़ार रूपए भी दिए जाते हैं. जब प्रशिक्षण पूरा हो जाता है, तो उन्हें पांच सौ रुपये प्रतिदिन कमाने का मौक़ा मिलता है.

इन कारीगरों को मुनाफ़े का 40 से 50 फ़ीसदी भी दिया जाता है और बाक़ी मुनाफ़े से कच्चा माल मंगाया जाता है. यहां इस्तेमाल होने वाला कांच इटली का प्रसिद्ध मुरानो ग्लास होता है.

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यहां किया गया 90 फ़ीसदी उत्पाद विदेश भेजा जाता है. नवांग इस कार्यशाला में प्रयोग होने वाले उपकरणों को उम्दा दर्ज़े का बताते हैं.

वह कहते हैं कि यहां की कारीगरी में ऑक्सीजन सिलिंडर और पाइप्स का प्रयोग किया जाता है.

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