खो गई है असली आलम आरा

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भारतीय सिनेमा का इतिहास 19वीं सदी से चला आ रहा है और तब से अब तक 37 भाषाओं में कई फ़िल्मों का निर्माण भारत भर में हो चुका है.

लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास की शुरुआती कुछ फ़िल्मों को, जिन्हें आप सिनेमा की धरोहर मान सकते हैं, सहेज कर नहीं रखा जा सका है.

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हाल ही में यह बात सामने आई कि भारत की पहली बोलती फ़िल्म 'आलम आरा' का प्रिंट अब मौजूद नहीं है.

ऐसी कई फ़िल्में हैं, जिनके नाम इतिहास में दर्ज तो हैं, लेकिन उन्हें अब हम देख नहीं पाएंगे.

फ़िल्म निर्माता और संग्रहकर्ता शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर इस दिशा में काफ़ी गंभीरता से काम कर रहे हैं और साल 2014 में उन्होनें फ़िल्म हेरिटेज फ़ाउंडेशन की स्थापना भी की.

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साल 2012 में नेशनल फ़िल्म आर्काइव ऑफ़ इंडिया के संस्थापक निदेशक पीके नायर की ज़िंदगी पर ‘सेलुलॉयड मैन’ जैसी चर्चित फ़िल्म बनाने वाले शिवेंद्र कहते हैं, "सिनेमा हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है. ये हमें भाषा, जाति से परे एक दूसरे से भावनाओं के ज़रिए जुड़ना सिखाती हैं, लेकिन अफ़सोस कि ऐसे सिनेमा की शुरुआती धरोहरों को हमने खो दिया है."

शिवेंद्र बताते हैं, ''साल 1931 में आई 'आलम आरा' से पहले भारत में 1700 मूक फ़िल्में बनी थी, लेकिन दुर्भाग्यवश इन फ़िल्मों में से सिर्फ़ 5 से 6 फ़िल्मों के ही प्रिंट आज मौजूद है.''

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भारत में फ़िल्म आर्काइव की स्थापना ही साल 1964 में हुई थी, लेकिन तब तक काफ़ी फ़िल्में खो चुकी थीं और 'आलम आरा' के निर्देशक आर्देशिर ईरानी अपनी एक अन्य इरानी फ़िल्म को पर्शिया ले गए, जहां उसे संरक्षित कर लिया गया.

शिवेंद्र फ़िल्मों के प्रिंट्स के संरक्षण की विधि पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, “आमतौर पर भारत में कमर्शियल तौर पर हिट रहने वाली फ़िल्मों को सरंक्षित कर लिया जाता है बल्कि सरंक्षण फ़िल्मों के बनने की तिथि के आधार पर होना चाहिए.”

वो आगे कहते हैं, “कई बार ऐसा होता है कि आज जिस फ़िल्म को दर्शक नकार देते हैं, उसे कुछ समय बाद लोग समझने लगते हैं और वे फ़िल्में हिट हो जाती हैं.”

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इसका एक ज्वलंत उदाहरण है राजकुमार संतोषी निर्देशित 'अंदाज़ अपना अपना' आज एक कल्ट कॉमेडी है, लेकिन ये फ़िल्म रिलीज़ के समय डूब गई थी.

सरंक्षण की तकनीक पर बात करते हुए शिवेंद्र ने बताया कि किसी फ़िल्म के सरंक्षण का पूरा काम कभी-कभी फ़िल्म की लागत से भी ज़्यादा महंगा हो जाता है.

वो कहते हैं कि रिस्टोरेशन करते वक़्त फ़िल्म के फ़्रेम दर फ़्रेम को देखा जाता है फिर साफ़ किया जाता है. वहीं डिजीटाईज़ेशन के दौरान पुराने नेगेटिव्स को स्कैन किया जाता है.

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इस पूरे काम के दौरान फ़िल्म से जुड़े लोग या फिर उस काल में मौजूद रहे रिसर्चर जुड़े रहते हैं और यह पूरी प्रक्रिया 6 महीने से लेकर एक साल तक भी जा सकती है.

'आलम आरा' के अलावा जिन फ़िल्मों के ओरिजनल प्रिंट्स अब खो चुके हैं उनमें प्रमुख हैं 'राहगीर' (1969), 'क़यामत से क़यामत तक' (1988), 'परिंदा' (1989) और 'ख़ामोशी'(1996) जैसी फ़िल्में.

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नेशनल फ़िल्म आर्काइव्स, पुणे के निदेशक प्रकाश मगदूम ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में फ़िल्मों के सरंक्षण में आने वाली एक ख़ास तकनीकी दिक्कत बताते हैं कि ज़्यादातर फ़िल्में सैलुलाइड फ़ॉर्मेट पर बनती हैं.

फ़िल्मों के सरंक्षण को लोग डिजिटलाइज़ेशन से जोड़ कर देखते हैं, लेकिन यह दो अलग बातें हैं.

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प्रकाश बताते हैं, “डिजिटाइजेशन का अर्थ होता है कि फ़िल्म अब प्रिंट के अलावा वीडियो फ़ॉर्मेट में भी उपलब्ध है, लेकिन रिस्टोरेशन के दौरान हम एक फ़िल्म के प्रिंट्स को सुधारते हैं, जैसे उन पर आ चुके स्क्रैच या उन पर जमी काई को हटाना.”

प्रकाश ने यह भी बताया कि कुछ फ़िल्म निर्माताओं ने तो अपनी फ़िल्मों की रील में से सिल्वर को अलग कर बेच दिया क्योंकि उनको लगा कि अब उनकी फ़िल्में काम की नहीं रही.

प्रकाश एक दिलचस्प बात बताते हैं कि अपनी फ़िल्म के प्रिंट्स को संजो के रख सकने में अक्षम फ़िल्म निर्माताओं ने कई बार अपनी फ़िल्मों को फेंकने की बजाय उन पर ग़लत पते लिख कर रेलवे के ज़रिए किसी ग़लत जगह पर भेज दिया.

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डिलीवर नहीं हो पाने के कारण रेलवे को नियमों के चलते उन प्रिंट्स को लापता सामान के तौर पर मालखाने में रखना पड़ा और फिर सालों बाद एनएफ़एआई ने इन प्रिंट्स को ढूंढा.

राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फ़िल्म 'अक्स' के प्रिंट्स ऐसे ही मिले थे.

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वर्तमान में राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय ने 565 फ़िल्मों का डिजीटलीकरण और क़रीब 325 फ़िल्मों के प्रिंट्स का सरंक्षण किया है जिनमें गुरू दत्त की 'प्यासा' और 'काग़ज़ के फूल' जैसी फ़िल्में प्रमुख हैं.

वहीं अगले 5 से 6 सालों में भारत सरकार के साथ मिलकर ‘राष्ट्रीय धरोहर मिशन’ के तहत 1000 फ़िल्मों और 1500 लघु फ़िल्मों को भी संरक्षित किया जाएगा.

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